नालंदा के 66 मौजों का कैडस्ट्रल सर्वे खतियान गायब, जमीन संबंधी रिकॉर्ड जुटाने में सरकार ने लोगों से सहयोग मांगा

नालंदा में 66 मौजों के कैडस्ट्रल सर्वे खतियान गायब हैं। राजस्व विभाग ने लोगों से पुराने भूमि रिकॉर्ड जमा करने की अपील की है ताकि डिजिटलीकरण पूरा हो सके।
Land Records : बिहार में जमीन से जुड़े मामलों को पारदर्शी बनाने के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग लगातार बड़े फैसले ले रहा है. जमीन की हेराफेरी, फर्जीवाड़ा और पुराने रिकॉर्ड की गड़बड़ी को खत्म करने के लिए सरकार अब सभी भूमि अभिलेखों को डिजिटल करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. इसी कड़ी में कई जिलों से गायब मौजा और खतियान के रिकॉर्ड को दोबारा जुटाने की पहल शुरू की गई है. इसका असर अब बिहारशरीफ समेत नालंदा जिले में भी साफ दिख रहा है, जहां दर्जनों मौजों के पुराने अभिलेख विभाग के पास उपलब्ध नहीं हैं.
नालंदा जिले के हजारों भू-स्वामियों के लिए यह अहम खबर है. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अनुसार जिले के 66 मौजों यानी राजस्व गांवों का कैडस्ट्रल सर्वे (सीएस) खतियान विभागीय अभिलेखों में मौजूद नहीं है. इन दस्तावेजों के अभाव में पुराने जमीन रिकॉर्ड के सत्यापन और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. ऐसे में विभाग ने लोगों से अपील की है कि जिनके पास इन मौजों का मूल या प्रमाणित खतियान हो, वे उसकी प्रति संबंधित अंचल कार्यालय या जिला अभिलेखागार में जमा कराएं.
डिजिटल रिकॉर्ड बनाने की दिशा में बड़ा अभियान
राज्य सरकार इन दिनों पुराने भूमि अभिलेखों को सुरक्षित रखने और उन्हें ऑनलाइन उपलब्ध कराने के लिए विशेष अभियान चला रही है. विभाग का मानना है कि समय के साथ कई महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो क्षतिग्रस्त हो गए हैं या फिर पूरी तरह गायब हो चुके हैं. ऐसे रिकॉर्ड को दोबारा जुटाने के लिए अब आम लोगों की मदद ली जा रही है, ताकि उन्हें सत्यापित कर डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल किया जा सके.
राज्य के हजारों मौजों का रिकॉर्ड अभी भी अधूरा
विभाग के आंकड़ों के अनुसार बिहार के कुल 45,858 मौजों में से अब तक 36,524 मौजों के कैडस्ट्रल सर्वे खतियान को स्कैन कर भू-अभिलेख पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है. हालांकि अभी भी 9,334 मौजों के रिकॉर्ड विभिन्न कारणों से उपलब्ध नहीं हैं या खराब स्थिति में हैं. इन अभिलेखों की खोज और डिजिटलीकरण का काम जारी है.
नालंदा की स्थिति कई जिलों से बेहतर
अगर जिलों की तुलना की जाए तो नालंदा की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही है. यहां केवल 66 मौजों के खतियान गायब हैं. वहीं मधुबनी में 92, गोपालगंज में 68 और नालंदा में 66 मौजों के रिकॉर्ड नहीं मिल पाए हैं. दूसरी ओर कुछ जिलों में स्थिति ज्यादा गंभीर है. कटिहार में 1,570, भागलपुर में 1,004 और जमुई में 942 मौजों के अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं.
लोगों के सहयोग से पूरा होगा डिजिटल मिशन
विभाग का कहना है कि कई परिवारों के पास पीढ़ियों से पुराने जमीन से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखे हुए हैं. यदि ऐसे खतियान उपलब्ध कराए जाते हैं तो उन्हें जांच कर सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया जाएगा. इससे भविष्य में जमीन विवादों के समाधान, स्वामित्व की पुष्टि और ऑनलाइन सेवाओं को मजबूत करने में काफी मदद मिलेगी.
ऐसे कर सकते हैं सहयोग
अगर किसी व्यक्ति के पास अपने गांव या मौजा का पुराना कैडस्ट्रल सर्वे खतियान है, तो वह उसकी प्रति संबंधित अंचल कार्यालय या जिला अभिलेखागार में जमा कर सकता है. विभाग इन दस्तावेजों का सत्यापन करने के बाद उन्हें डिजिटलीकरण प्रक्रिया में शामिल करेगा.
घर बैठे भी देख सकते हैं अपने मौजे की स्थिति
राजस्व विभाग ने अनुपलब्ध मौजों की अंचलवार सूची भी जारी की है. नागरिक क्यूआर कोड के माध्यम से यह पता कर सकते हैं कि उनका गांव इस सूची में शामिल है या नहीं. इसके अलावा जिन मौजों के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, उन्हें भू-अभिलेख पोर्टल पर ऑनलाइन भी देखा जा सकता है. किसी प्रकार की त्रुटि या शिकायत होने पर बिहार भूमि पोर्टल के जरिए विभाग से संपर्क किया जा सकता है.
क्यों जरूरी है कैडस्ट्रल सर्वे खतियान
कैडस्ट्रल सर्वे यानी सीएस खतियान किसी भी जमीन का सबसे पुराना और भरोसेमंद रिकॉर्ड माना जाता है. इसमें खाता, खेसरा, रकबा, जमीन के मालिक और उसकी प्रकृति जैसी अहम जानकारी दर्ज होती है. जमीन विवादों के निपटारे से लेकर सर्वे और रिकॉर्ड अपडेट तक में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. यही वजह है कि सरकार अब इन पुराने दस्तावेजों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने पर जोर दे रही है, ताकि आने वाले समय में जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ सके.
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