नालंदा में वज्रपात का बढ़ा कहर, जानें अबतक कितनी गई जान..

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Nalaanda News: Lightning wreaks havoc

मौसम की तस्वीर

Nalaanda News : नालंदा जिले में जलवायु परिवर्तन और तेजी से घटती हरियाली का असर अब साफ दिखाई देने लगा है. पिछले 20 वर्षों में बेमौसम बारिश, वज्रपात, आंधी-तूफान और तड़ित-झंझावात की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है. इन प्राकृतिक आपदाओं ने न केवल लोगों की जान ली है.

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(नालंदा से कंचन की रिपोर्ट)

Nalaanda News : नालंदा जिले में जलवायु परिवर्तन और तेजी से घटती हरियाली का असर अब साफ दिखाई देने लगा है. पिछले 20 वर्षों में बेमौसम बारिश, वज्रपात, आंधी-तूफान और तड़ित-झंझावात की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है. इन प्राकृतिक आपदाओं ने न केवल लोगों की जान ली है, बल्कि फसलों और संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है.

20 वर्षों में 49 मौतें, 82 प्रतिशत घटनाएं वज्रपात से जुड़ी

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2006 से 2025 के बीच मौसम जनित आपदाओं में जिले में कम से कम 49 लोगों की मौत हुई है. इनमें करीब 40 लोगों की मौत सीधे वज्रपात, तड़ित-झंझावात और बेमौसम बारिश से जुड़ी घटनाओं में हुई. यह कुल मौतों का लगभग 82 प्रतिशत है. विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़ा बदलते मौसम के बढ़ते खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करता है.

2025 बना सबसे घातक साल, एक झटके में गई 22 जानें

वर्ष 2025 नालंदा के लिए सबसे भयावह साबित हुआ. अप्रैल महीने में आए भीषण तड़ित-झंझावात ने जिले को झकझोर कर रख दिया. इस एक घटना में ही 22 लोगों की मौत हो गई, जो पिछले 20 वर्षों में हुई कुल मौतों का लगभग 45 प्रतिशत है. इस त्रासदी ने प्रशासन और आम लोगों दोनों को चिंता में डाल दिया.

हर साल बढ़ती गई मौसमीय तबाही

वर्ष 2006 में असामयिक बारिश और वज्रपात से तीन लोगों की मौत हुई थी. वर्ष 2008 में कालबैशाखी तूफान के दौरान चार लोगों ने जान गंवाई. वर्ष 2010 में भारी बारिश और नदियों के उफान से छह लोगों की मौत हुई तथा सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि जलमग्न हो गई. इसके बाद भी मौसमीय आपदाओं का सिलसिला लगातार जारी रहा.

आंधी, ओलावृष्टि और वज्रपात ने किसानों की कमर तोड़ी

वर्ष 2013 में आंधी, तूफान और ओलावृष्टि से तीन लोगों की मौत हुई जबकि गेहूं और मूंग की फसलें बर्बाद हो गईं. वर्ष 2015 में वज्रपात और तेज हवाओं से पांच लोगों की जान गई. वर्ष 2017 में तीन लोगों की मौत हुई और धान की रोपनी प्रभावित हुई. इन घटनाओं ने किसानों को आर्थिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया.

2019 के बाद और भयावह हुआ मौसम का मिजाज

वर्ष 2019 में तड़ित-झंझावात से सैकड़ों पेड़ उखड़ गए और मक्का-मूंग की फसलें तबाह हो गईं. वर्ष 2021 में चक्रवात यास के प्रभाव से ग्रामीण इलाकों में जलभराव और मकानों को नुकसान पहुंचा. वर्ष 2022 में वज्रपात से तीन लोगों की मौत हुई, जबकि वर्ष 2024 में सूखे जैसी स्थिति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी.

ताड़ और खजूर के पेड़ों की कटाई बनी नई मुसीबत

पर्यावरणविदों का मानना है कि पहले गांवों और खेतों की मेड़ों पर बड़ी संख्या में ताड़, खजूर, बबूल और बेर जैसे ऊंचे पेड़ मौजूद रहते थे. ये पेड़ प्राकृतिक तड़ित चालक की तरह काम करते थे और आकाशीय बिजली को अपनी ओर आकर्षित कर मानव बस्तियों को सुरक्षित रखते थे. लगातार कटाई और शहरीकरण के कारण इन पेड़ों की संख्या घटने से अब वज्रपात का खतरा सीधे लोगों और मवेशियों पर बढ़ गया है.

फसलों से लेकर संपत्ति तक को भारी नुकसान

पिछले दो दशकों में हजारों एकड़ धान, गेहूं, मक्का और मूंग की फसलें बेमौसम बारिश, सूखा और वज्रपात की भेंट चढ़ चुकी हैं. कई कच्चे मकान ढह गए, बिजली के खंभे उखड़ गए और ग्रामीण सड़कें क्षतिग्रस्त हो गईं. मौसम की अनिश्चितता ने किसानों की लागत बढ़ा दी है और उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है.

विशेषज्ञों ने बताए बचाव के रास्ते

मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ताड़, खजूर और अन्य ऊंचे पेड़ों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाना चाहिए. इसके साथ ही गांवों में लाइटनिंग अरेस्टर लगाने, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने और मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता है. उनका मानना है कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाकर ही भविष्य में जनहानि और आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है.

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विवेक सिंह

लेखक के बारे में

By विवेक सिंह

विवेक सिंह की डिजिटल मीडिया और जनसरोकारों से जुड़े विषयों में विशेष रुचि रही है. वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कार्यरत हैं. वे बिहार के मिथिला क्षेत्र के निवासी हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं.

उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई की है. शिक्षा के दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, जनसंचार, फोटो जर्नलिज्म, मोबाइल जर्नलिज्म (MOJO) और मीडिया रिसर्च की गहन समझ विकसित की है. अध्ययन के दौरान उन्होंने दूरदर्शन (Doordarshan) में इंटर्नशिप भी की, जहां उन्हें न्यूजरूम की कार्यप्रणाली, टीवी समाचार निर्माण, स्क्रिप्ट लेखन, विजुअल चयन, फील्ड रिपोर्टिग और प्रसारण प्रक्रिया को नजदीक से समझने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ.

पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने मीडिया प्लेटफॉर्म The Newsdharma के माध्यम से ग्राउंड रिपोर्टिंग, जनमत संग्रह (Public Opinion), सामाजिक मुद्दों की कवरेज और स्थानीय समाचारों के संकलन का व्यापक अनुभव प्राप्त किया. उन्होंने विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और जनहित से जुड़े विषयों पर जमीनी स्तर से रिपोर्टिंग करते हुए आम लोगों की आवाज को प्रमुखता से सामने लाने का कार्य किया है.

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वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में कार्यरत विवेक सिंह राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, खेल, अपराध, रियल-टाइम समाचारों, सामाजिक सरोकारों और समसामयिक विषयों से जुड़ी खबरों पर लेखन करते हैं. डिजिटल पत्रकारिता के साथ-साथ उन्हें SEO (Search Engine Optimization), कंटेंट प्लानिंग और ट्रेंड-आधारित समाचार लेखन की अच्छी समझ है. ब्रेकिंग न्यूज की पहचान, त्वरित कवरेज और कम समय में तथ्यपरक समाचार तैयार करना उनकी प्रमुख कार्यक्षमताओं में शामिल है.

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