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Bhojpuri गायिका चंदन तिवारी ने बताया छठ गीत का महत्व, कहा- गीत नहीं आस्था का है राग

Updated at : 29 Oct 2022 6:51 AM (IST)
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Bhojpuri गायिका चंदन तिवारी ने बताया छठ गीत का महत्व, कहा- गीत नहीं आस्था का है राग

छठ महापर्व हर किसी के लिए खास महत्व रखता है. दीवाली के बाद से ही जिन घरों में छठ पूजा होती है उनके घरों में छठ के गीत बजने लगते हैं. पहले के गीतों में और आज के गीतों में बहुत विस्तार आया है और आज छठ महिमा सिर्फ यूपी, बिहार, झारखंड नहीं बल्कि पूरे विश्व के पटल पर मनाया जा रहा है.

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छठ महापर्व हर किसी के लिए खास महत्व रखता है. दीवाली के बाद से ही जिन घरों में छठ पूजा होती है उनके घरों में छठ के गीत बजने लगते हैं. पहले के गीतों में और आज के गीतों में बहुत विस्तार आया है और आज छठ महिमा सिर्फ यूपी, बिहार, झारखंड नहीं बल्कि पूरे विश्व के पटल पर मनाया जा रहा है. ऐसे में हाल के दिनों में छठ के गीतों पर कितना परस्पर विस्तार हुआ है,विभिन्न भाषाओं में इसकी लोकप्रियता कबसे बढ़ी और अभी इसकी क्या स्थिति है और छठ के यह पारंपरिक गीत कबसे चले आ रहे है इसके बारे में गायिका चंदन तिवारी कई पहलुओं पर बताया है. वे बताती हैं कि छठ के यह पारंपरिक गीत तब से चल आ रहे है जब से छठ मनाया जा रहा है. छठ कर्मकांड,शास्त्र और मंत्र विहीन पर्व है. यह पर्व बिना गीत के आप सोच नहीं सकते. इसलिए जब से छठ मनाया जा रहा है, तब से ये गीत चल रहे हैं.

बिगड़ाव के रास्ते पर चल पड़ा छठ गीत

चंदन बताती हैं कि छठ के गीतों का निरंतर विस्तार हो रहा है. हर साल छठ में दर्जनों नये गीत आते हैं. बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तरप्रदेश के लगभग लोक गायक कलाकार छठ में गीत गाते हैं. यह एक अच्छी बात है, क्योंकि छठ बिहार,झारखंड,पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए पहचान का पर्व है, लेकिन यह विस्तार धीरे धीरे बनाव, बदलाव के नाम पर बिगड़ाव के रास्ते भी चल रहा है. अभी कम दिख रहा है, जल्द ही ज्यादा दिखेगा. मैं यह मानती हूं कि छठ गीतों को समकालीन बनाने की बहुत जरूरत नहीं क्योंकि छठ के गीत दूसरी विधाओं के लोकगीत की तरह सिर्फ गीत नहीं होते बल्कि छठ के पर्व के आधार होते हैं.

छठ के गीत ही शास्त्र और मंत्र

छठ के पर्व में छठ के गीत ही शास्त्र और मंत्र, दोनों भूमिका में होते हैं. क्या किसी पूजा पाठ के मंत्र में आप छेड़ छाड़ कर सकते हैं. बिल्कुल हर कलाकार हर साल नये गीत गायें लेकिन छठ के मूल गीतों के करीब ही गीतों को रहने दे. जैसे छठ के गीतों को देखने पर मालूम चलेगा कि मोटे तौर पर इसमें सौ तत्व होते हैं. सृष्टि,प्रकृति के तत्व. जगत कल्याण, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य, धन—संतान आदि की बात. छठ गीतों के धुनों को भी देखें दो दर्जन भर धुन ही लोकप्रिय रहे हैं .आम जनमानस में, लोक परंपरा में इन धुनों को रखकर, इन तत्वों को रखकर अनेक गीत रचे जाये हर साल,यह अच्छा ही होगा. लेकिन अब छठ के गीतों में भी समकालीन विषय को लाया जाता है. समकालीन विषयों को लोकगीत में लाने के लिए अनेक विधाएं हैं. कजरी में लाइये, फाग में लाइये. ऐसी अनेक विधाएं तो हैं पहले से जिसमें समकालीन विषय आते रहे हैं. जनगीत गाइये. पर, छठ के गीतों को छोड़ दीजिए. आप इसे समकालनीता से जोड़ेंगे तो दूसरे गायक इसे ढोढ़ी के धुन से जोड़कर गायेंगे. इस साल ऐसा हुआ भी है. फिर आप कहेंगे कि अरे ढोढ़ी पर छठ गीत गा रहा है, ऐसा गाया जाता है क्या? तो उनका जवाब होगा कि आप जो समकालीन विषय पर गा रहे हैं तो क्या जाता है क्या? छठ के गीतों को हमेशा शास्त्र और मंत्र की दृष्टि से देखें. श्रद्धा और आदर की भावना से. क्योंकि इन गीतों पर पर्व आगे बढ़ता है, चलता है, पीढ़ियों से मनाया जाता है.

छठ के गीत तीन ही भाषा में होंगे

छठ के गीतों के बारे में यह जान लेना चाहिए कि यह जब भी होंगे तो तीन ही भाषा में होंगे. भोजपुरी, मगही, मैथिली में या इनकी उपभाषाओं में, क्योंकि मूल रूप से यह पर्व बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ इलाके का है. जिन इलाकों का पर्व है, उन इलाके की भाषाएं यही हैं. छठ के गीत को अप हिंदी में नहीं गा सकते. यह लोक पर्व है, इसलिए लोक भाषा में ही अराधान की परंपरा रही है. इसलिए छठ गीत जब से गाये जाते हैं, इन भाषाओं में ही गाये जाते हैं, आगे भी गाये जाएंगे. हां, अब कोई किसी भाषा में गाये और उसे विस्तार कहे, प्रयोग कहे तो वह बनावटीपन ही होगा. हर राज्य या इलाके के ऐसे लोक पर्व को देखें, वहां की भाषा में ही गाये जाते हैं. झारखंड में सरहुल या कर्मा में वहीं की भाषा में गीत चलते हैं. असम के बिहू में के वहीं की भाषा में गीत चलते हैं. बंगाल में बांग्ला भाषा में ही गीत चलते हैं. दशकों पहले छठ के कुछ गीतों हिंदी में गाने-लाने की कोशिश हुई थी पर वे गीत चले नहीं. कोई सुना ही नहीं. कहीं बजा ही नहीं. यह चल भी नहीं सकता.

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