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Bihar: सरकारी मदद से शुरू की गयी जैविक खेती की हकीकत, 3 साल में किसानों को 16 करोड़ से अधिक का नुकसान

भागलपुर जिले के सात प्रखंडों में दियारा क्षेत्र अंतर्गत 2000 एकड़ भूमि पर 2028 किसानों ने कृषि विभाग की मदद से जैविक खेती शुरू की. लेकिन तीन साल के बाद भी किसानों को बाजार नहीं मिला और करोड़ों का नुकसान हुआ.

By Prabhat Khabar Print Desk
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सरकारी मदद से शुरू की गयी जैविक खेती की हकीकत
सरकारी मदद से शुरू की गयी जैविक खेती की हकीकत
प्रभात खबर

दीपक राव,भागलपुर: वर्ष 2019-20 में जिले के सात प्रखंडों में दियारा क्षेत्र अंतर्गत 2000 एकड़ भूमि पर 2028 किसानों ने कृषि विभाग की मदद से जैविक खेती शुरू की. इन तीन वर्षों में जैविक उत्पादों को बेचने के लिए किसानों को वैसा बाजार नहीं मिला, जहां उन्हें उसकी उचित कीमत मिले.

जैविक खेती करने से मेहनत व खर्च तो बढ़ गये, पर उत्पादन घट गया. यदि सरकार की ओर से निर्धारित बाजार व रेट मिल जाता, तो किसानों को तीन साल में 16.20 करोड़ की अधिक आमदनी होती. किसान अभी भी यह उम्मीद लगाये बैठे हैं कि कृषि विभाग उन्हें बाजार देगा और उनके जैविक फसलों को उचित कीमत मिल पायेगी.

किसानों को किस तरह हो रही क्षति

किसानों से बातचीत करने पर पता चला कि पूरे एक साल में तीन सीजन में हरी सब्जियां उगायी जाती हैं. तीन सीजन में एक एकड़ की फसल लगाने से उपजाने तक लगभग 45 हजार रुपये खर्च आता है. इसे बेच कर किसानों को लगभग एक लाख 35 हजार रुपये मिलता है. यानी किसानों को वर्तमान में सामान्य सब्जियों की कीमत मिलने के कारण 90 हजार का सालाना फायदा होता है.

इसी जैविक सब्जियों को जैविक सब्जियों की कीमत मिली होती, तो 20 प्रतिशत अधिक लाभ होता. यानी एक एकड़ में उपजी सब्जियां एक लाख 35 हजार की जगह एक लाख 62 हजार में बिकती और 90 हजार की जगह एक लाख 17 हजार का फायदा होता. इस तरह देखें, तो एक एकड़ में हर साल 27 हजार रुपये कम आमदनी हो रही है. पिछले तीन साल से किसान 2000 एकड़ में जैविक खेती कर रहे हैं. तीन साल का हिसाब जोड़ें, तो किसानों को 16 करोड़ 20 लाख की क्षति हो चुकी है.

जैविक उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए अब तक क्या हुआ

जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण के लिए सिंचाई का पानी, मिट्टी का नमूना, जैविक उत्पाद का नमूना पटना के बसोका, बिहार स्टेट सीड एंड ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन एजेंसी को भेजा गया. सभी समूह को सी-वन, सी-टू (सर्टिफिकेट) दो वर्षों में मिल चुका है. सी-थ्री मिलना बाकी है. यह मिलने के बाद यह प्रमाणित हो जायेगा कि यहां सिर्फ जैविक खेती होती है.

अब तक कृषि विभाग का प्रयास

कृषि विभाग की ओर से समय-समय पर उनके उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए मेला लगाया गया. किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक प्रदर्शनी लगायी गयी. उनके उत्पादों की गुणवत्ता के आधार पर पुरस्कृत किया गया. इसमें उनके उत्पाद की बिक्री भी हुई और उत्पादों की गुणवत्ता से आम लोग अवगत हुए.

कृषि कार्यालय परिसर में 10 दिन में तैयार होगा जैविक हाट

डीएम के सख्त निर्देश पर आत्मा की ओर से जिला कृषि कार्यालय परिसर में बीज निगम कार्यालय के समीप जैविक उत्पाद अर्थात सब्जियों का हाट तैयार किया जा रहा है. यह 10 दिन के अंदर तैयार हो जायेगा. जिला कृषि पदाधिकारी के अनुसार यह किसानों के लिए नि:शुल्क होगा. यहां सामान्य उत्पाद से 10 से 20 फीसदी अपेक्षाकृत अधिक दाम में किसान जैविक उत्पाद बेच सकेंगे. किसानों के उत्पादों का रेट तय किया जायेगा. इससे पहले सीमित समय के लिए डीएम सुब्रत कुमार सेन ने बिक्री स्टॉल का शुभारंभ किया था.

कहते हैं किसान

किसानों को बाजार की समस्या को देखते हुए जो निर्देश मिला था, उसी के आलोक में जैविक हाट बनाया जा रहा है. तिलकामांझी हटिया रोड के बगल में कृषि कार्यालय परिसर में यह हाट 10 दिन में तैयार हो जायेगा. पीरपैंती राजगांव में जैविक हाट बन कर तैयार है. जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग तत्पर है.

कृष्णकांत झा, जिला कृषि पदाधिकारी

एक बीघा में पहले आलू लगाये थे. अब मिर्च लगाये हैं. 20 हजार तक खर्च करने पर मौसम अनुकूल रहा तो एक लाख तक का उत्पादन हो जाता है. इसमें मजदूर खर्च दोगुना बढ़ गया है. उत्पादन घट गया है. उत्पादित सब्जी की बिक्री सामान्य सब्जी के भाव में हो रही है. फिर भी उम्मीद लगाये हैं.

सरयुग सिंह, किसान, सरधो

मिर्च, बैगन, नेनुआ, करेला, कद्दू आदि एक एकड़ में लगाये हैं. एक सीजन में 15 हजार तक खर्च होता है और इसमें 25 हजार रुपये तक आमदनी होती है. सामान्य तरीके की खेती में अधिक उत्पादन होने पर आमदनी भी अधिक होती थी. बाजार नहीं मिल पा रहा है.

सनोज कुमार सिंह, किसान, नवगछिया

दो बीघा में परवल लगाये हैं. इसमें 60 हजार रुपये तक खर्च कर चुके हैं. अब तक 10 हजार रुपये का ही बेच पाये हैं. जैविक परवल में चमक कम है. हालांकि बैगन उपजाने में 5000 रुपये खर्च हुए थे और 40 हजार रुपये आमदनी हुई थी. सही दाम व बाजार मिलने पर फायदा होगा.

सूर्यदेव, किसान, मोतीचक, सुल्तानगंज

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