गंगा कटाव से गोपालपुर-इस्माईलपुर में हजारों परिवार संकट में, गांव और खेती हो रहे तबाह

Author Vipin Thakur|Edited by System
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गंगा कटाव से गोपालपुर-इस्माईलपुर में हजारों परिवार संकट में, गांव और खेती हो रहे तबाह

गंगा के कटाव ने बदल दी गोपालपुर-इस्माईलपुर की तस्वीर, हजारों परिवारों का भविष्य संकट में गोपालपुर (भागलपुर) से विपिन ठाकुर भागलपुर जिले के गोपालपुर और इस्माईलपुर प्रखंड के दर्जनों

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गोपालपुर (भागलपुर) से विपिन ठाकुर

Bhagalpur News: कभी सैकड़ों बीघा जमीन के मालिक रहे किसान आज दूसरे राज्यों में मजदूरी कर रहे हैं. जिन गांवों में कभी फसलें लहलहाती थीं, वहां अब गंगा की तेज धारा बह रही है. भागलपुर के गोपालपुर और इस्माईलपुर प्रखंड में गंगा का कटाव सिर्फ जमीन नहीं काट रहा, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, पहचान और भविष्य भी अपने साथ बहा ले जा रहा है. हर मानसून के साथ यहां के लोगों का डर और गहरा हो जाता है. सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अपना घर उजड़ते हुए देखते रहेंगे?

गंगा के कटाव ने बदल दी पूरे इलाके की तस्वीर

भागलपुर जिले के गोपालपुर और इस्माईलपुर प्रखंड के दर्जनों गांव वर्षों से गंगा नदी के भीषण कटाव की मार झेल रहे हैं. लगातार बदलती नदी की धारा ने इस इलाके का भूगोल ही बदल दिया है. कई गांव पूरी तरह गंगा में समा चुके हैं, जबकि कई गांवों का बड़ा हिस्सा नदी की भेंट चढ़ गया.

कटाव का सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ा है. हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि गंगा में समा जाने से किसानों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. जिन खेतों से कभी पूरे परिवार का जीवन चलता था, वहां अब सिर्फ पानी दिखाई देता है.

जमींदार से मजदूर बनने की दर्दनाक कहानी

स्थानीय लोग बताते हैं कि एक समय इस इलाके के कई परिवार सैकड़ों बीघा जमीन के मालिक थे. खेती-बाड़ी उनकी पहचान थी और उसी से उनका घर-परिवार चलता था.

लेकिन गंगा के लगातार कटाव ने उनकी जमीन, घर और जीवन की बुनियाद छीन ली. आज उन्हीं परिवारों के युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, सूरत, लुधियाना और देश के अन्य महानगरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं.

यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गहरा असर छोड़ गया है. गांवों से पलायन बढ़ा है और पारंपरिक ग्रामीण जीवन धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है.

हर मानसून के साथ बढ़ जाता है डर

कटाव प्रभावित परिवारों का कहना है कि मानसून शुरू होते ही उनकी चिंता बढ़ जाती है. जैसे-जैसे गंगा का जलस्तर बढ़ता है, वैसे-वैसे कटाव का खतरा भी तेज हो जाता है.

कई परिवार हर साल इस डर के साथ जीते हैं कि कहीं इस बार उनका बचा हुआ घर भी नदी में न समा जाए. यही वजह है कि बरसात का मौसम उनके लिए राहत नहीं, बल्कि चिंता लेकर आता है.

अस्थायी उपायों से नहीं निकल रहा समाधान

स्थानीय लोगों के अनुसार जल संसाधन विभाग और प्रशासन समय-समय पर कटाव रोकने के लिए काम कराते हैं. हालांकि गंगा की तेज धारा के सामने ये प्रयास कई बार पर्याप्त साबित नहीं होते.

ग्रामीणों का कहना है कि बांस, बोल्डर या अस्थायी सुरक्षा कार्यों से कुछ समय के लिए राहत जरूर मिलती है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है.

लोगों की मांग है कि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर दीर्घकालिक कटाव निरोधी योजना बनाई जाए ताकि हर साल होने वाले नुकसान को रोका जा सके.

Bhagalpur News: पुनर्वास की राह अब भी अधूरी

कटाव से सबसे अधिक प्रभावित वे परिवार हैं, जिनके घर और जमीन दोनों गंगा में समा चुके हैं. कई परिवार आज भी तटबंधों, सड़कों के किनारे या अस्थायी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं.

विस्थापन के वर्षों बाद भी पुनर्वास की समुचित व्यवस्था नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है. उनका कहना है कि केवल राहत सामग्री देने से समस्या खत्म नहीं होगी. उन्हें स्थायी आवास, रोजगार और खेती के लिए वैकल्पिक जमीन की जरूरत है.

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