भागलपुर में जीवित है पूर्वजों की वैदिक रीति: कुशोत्पाटनी अमावस्या पर एकजुट हुए ग्रामीण, सालभर के अनुष्ठानों की तैयारी
भागलपुर जिले में आधुनिकता के बावजूद सदियों पुरानी कुश उखाड़ने की परंपरा आज भी जीवित है. कुशग्रहणी अमावस्या के अवसर पर ग्रामीण पवित्र कुश का संग्रहण करते हैं, जो साल भर चलने वाले धार्मिक कार्यों के लिए अनिवार्य है.
आधुनिकता के तीव्र प्रवाह में जहां कई पारंपरिक और लोक परंपराएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं, वहीं भागलपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में पूर्वजों की धरोहर आज भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ जीवित है.
कुशग्रहणी (कुशोत्पाटनी) अमावस्या के पावन अवसर पर शुक्रवार को जिले के नवगछिया अनुमंडल स्थित गोसाईं गांव सहित विभिन्न गांवों में वर्षों पुरानी 'कुश उखाड़ने की परंपरा' का भव्य रूप देखने को मिला. गांव के दर्जनों प्रबुद्ध नागरिक, बुजुर्ग और युवा सुबह-सवेरे खेतों और नदी किनारे पहुंचे, जहां वैदिक नियमों के अनुसार सामूहिक रूप से पवित्र कुश उखाड़ी गई और उसे पूरे साल के धार्मिक कार्यों के लिए सहेजकर घर लाया गया.
सनातन धर्म में कुश का विशेष महत्व: पूजा से पितृकर्म तक अनिवार्य
सनातन धर्म और हिंदू कर्मकांड में कुश (दर्भ) को परम पवित्र माना गया है:
- धार्मिक कार्यों में अनिवार्यता: दैनिक पूजा-पाठ, संकल्प, यज्ञ, हवन, तर्पण, श्राद्ध पक्ष और महालय के पितृकर्म में कुश की अंगूठी (पवित्री) और कुश का आसान अनिवार्य माना जाता है.
- अमावस्या का विशेष फल: शास्त्रों के अनुसार कुशग्रहणी अमावस्या के दिन विधिपूर्वक उखाड़ी गई कुश का प्रभाव वर्षभर अक्षुण्ण रहता है. इसी धार्मिक मान्यता के तहत ग्रामीण हर वर्ष इस दिन का इंतजार करते हैं.
नई पीढ़ी को पूर्वजों की जड़ों से जोड़ रही परंपरा
गोसाईं गांव के बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने इस सामूहिक आयोजन को सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक बताया:
- सेवानिवृत्त शिक्षक अनिल कुमार झा ने कहा कि गोसाईं गांव में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. यह सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत की अटूट डोर है.
- शिक्षक कालीचरण मिश्र के अनुसार, बदलते दौर में भी इस परंपरा का बने रहना गांव की सांस्कृतिक चेतना और मजबूती को दर्शाता है. ऐसे सामूहिक कार्य युवा पीढ़ी को अपने पूर्वजों के संस्कारों और प्रकृति से जोड़ते हैं.
- शिक्षक रजनीश बौआ ने बताया कि सनातन धर्म में कुश की पवित्रता सर्वोपरि है और ग्रामीण इसे केवल एक घास नहीं, बल्कि आस्था का पवित्र माध्यम मानकर ग्रहण करते हैं.
सामूहिकता और सामाजिक समरसता की मिसाल
इस परंपरा की सबसे खूबसूरत बात इसका सामूहिक स्वरूप है. गांव के लोग एक साथ मिलकर खेतों में उतरते हैं, जिससे आपसी प्रेम, भाईचारा और सामाजिक जुड़ाव को नया संबल मिलता है.
इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान पंडित राधाकृष्ण झा, गया झा, टिंकू झा, बमबम झा, पंडित सुमन झा, बरुण कुमार झा, अनिल झा, चंदन झा सहित दर्जनों की संख्या में ग्रामीण और युवा उपस्थित रहे.
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