कुछ शौचालय को बनाया रसोईघर तो कुछ को पशुओं के चारे का गाेदाम

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Jul 2018 4:22 AM

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भागलपुर : बाढ़-कटाव का वर्षों से दर्द झेल रहे लोगों को सच्चिदानंदनगर में बसने की वर्षों पूर्व थोड़ी जमीन मिली और समृद्ध कॉलोनी देने का आश्वासन. लेकिन इस बस्ती के लोग बाढ़-कटाव से भी जिल्लत भरी जिंदगी यहां जी रहे हैं. माला देवी को घर बनाकर दिया गया था और साथ में शौचालय भी. नगर […]

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भागलपुर : बाढ़-कटाव का वर्षों से दर्द झेल रहे लोगों को सच्चिदानंदनगर में बसने की वर्षों पूर्व थोड़ी जमीन मिली और समृद्ध कॉलोनी देने का आश्वासन. लेकिन इस बस्ती के लोग बाढ़-कटाव से भी जिल्लत भरी जिंदगी यहां जी रहे हैं. माला देवी को घर बनाकर दिया गया था और साथ में शौचालय भी. नगर निगम ने शौचालय की टंकी पर ढक्कन नहीं चढ़ाया और माला देवी की कभी इतनी कमाई नहीं हो सकी कि वह शौचालय की टंकी पर ढक्कन बना सके.

नतीजा यह हुआ कि खाली पड़े छोटे से शौचालय को माला ने रसोईघर बना लिया. माला की पड़ोसी द्रोपदी देवी के शौचालय की टंकी भी माला के शौचालय की टंकी से जोड़ा गया था. द्रोपदी ने भी शौचालय का उपयोग पशु-चारा रखने के लिए कर लिया. माला और द्रोपदी का शौचालय तो सिर्फ एक बानगी है. सच्चिदानंदनगर में बसे करीब पांच सौ घर में से सिर्फ 10-12 फीसदी घरों में ही शौचालय का उपयोग हो रहा है. बाकी घरों के लोग हवाई अड्डा में शौच करने जाते हैं. यह हाल शहरी क्षेत्र का है. गांवों में क्या स्थिति होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

हाल निगम क्षेत्र में स्वच्छता मिशन
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सरकार ने दिये पैसे, ठेकेदार अधूरा निर्माण छोड़ भागे, वर्षों से जिल्लत भरी जिंदगी जी रहे हैं इलाके के लोग
हवाई अड्डा की दीवार बनती है, पर शौच के लिए तोड़ देते हैं
सच्चिदानंदनगर के अधिकतर लोग हवाई अड्डा पर शौच करने जाते हैं. सुबह और शाम हवाई अड्डा के किनारे लोग भरे रहते हैं. हवाई अड्डा की दीवार कई बार बनायी गयी. लेकिन मजबूरी के कारण लोग इसे तोड़ते रहे हैं.
‘गंदी बस्ती’ को गंदी ही छोड़ गये
वर्ष 1978 में शंकरपुर दियारा में कटाव हुआ था. लोगों का सब कुछ बह गया था. दूसरी ओर संघर्ष भी जारी रहा. लंबे संघर्ष के बाद 3 अक्तूबर 1986 को पर्चा मिला. सरकार घर बनायेगी, रोड देगी, बिजली देगी, शौचालय देगी. जिन लोगों को पर्चा नहीं मिला, वे झोपड़ी बांध कर रहने लगे. यहां जब विकास नहीं होने लगा, आंदोलन कर गंदी बस्ती घोषित करने की मांग उठी. फिर गंदी बस्ती 1994-95 में घोषित हुआ. फिर दो-तीन सड़कें बनीं. इसके बाद पक्का मकान देने की मंजूरी हुई. एक परिवार पर 1.40 लाख खर्च करने का निर्णय हुआ. पटना से जांच टीम आयी. 299 लोगों का नाम गया, पर कई लोगों का नाम छूट गया. 360 लोगों को पर्चा मिलना था. लेकिन 325 लोगों को ही पर्चा मिला. 299 परिवार का घर बना है. उसमें घर, शौचालय, बिजली, पानी सब शामिल था. बिजली नहीं दी. पानी भी नहीं. अभी भी 12 प्रतिशत लोगों के पास ही शौचालय है.
राम किशोर, कन्वेनर, दियारा गंगा मुक्ति आंदोलन
न पर्चा िमलता है न शौचालय
नगर निगम कार्यालय में जब लोगों को जमीन का पर्चा देने की मांग करती हूं, तो बहाने बनाये जाते हैं. लोगों के शौचालय का आवेदन लेकर जाती हूं, तो जमीन का पर्चा मांगा जाता है. एक तो पर्चा देते नहीं और दूसरा शौचालय देने के लिए पर्चा मांगते हैं. आखिर यह कैसे संभव है. दिक्कत यह है कि नगर निगम में निदान की कोशिश नहीं होती. नतीजा है कि लोग शौच करने हवाई अड्डा पर जाने को विवश हैं. अभी भी यहां बसे 200 लोगों के पास पर्चा नहीं है और अधिकतर लोगों के घर पर शौचालय नहीं है.
शीला देवी, पार्षद
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