30 साल बाद भाजपा अपना सबसे मजबूत गढ़ बांकीपुर हार गई है. विधानसभा उप चुनाव में प्रशांत किशोर की जनसुराज ने 19,324 वोटों से BJP के नीरज सिन्हा को मात दे दी. 2025 के विधानसभा चुनाव और अब 2026 के उप चुनाव के नतीजों में जो सबसे बड़ा अंतर देखने को मिला है वो वोटरों का मूड. इसलिए सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि जनसुराज ने भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटरों में सेंध लगा दी है.आंकड़े भी यही गवाही दे रहे हैं. लेकिन ऐसा हुआ कैसे ? क्या बड़े फैक्टर रहे ? बांकीपुर में भाजपा का कोर वोटर क्यों खिसक गया? जानेंगे इस लेख में.बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी क्यों हारी?नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन जो अभी पार्टी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष है, ने 51,936 वोटों से जीत दर्ज की थी. लेकिन उनके राज्यसभा जाने से जब यह सीट खाली हुई और उप चुनाव हुए तो भाजपा को 44,827 वोटों पर सिमट गई.नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 98 हजार वोट मिले थे, जबकि राजद लगभग 46 हजार वोटों पर सिमट गई थी. उस चुनाव में जनसुराज की उम्मीदवार को सात हजार से कुछ अधिक वोट मिले थे.लेकिन 2026 के उपचुनाव में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई और जनसुराज के प्रशांत किशोर सबसे आगे चले गए, जबकि भाजपा दूसरे और राजद तीसरे स्थान पर खिसक गई.पिछले चुनाव की तुलना करें तो भाजपा के वोटों में लगभग 54 हजार की गिरावट दर्ज हुई, जबकि राजद को भी करीब 30 हजार वोटों का नुकसान हुआ, राजनीतिक जानकार कहते है कि भाजपा के नुकसान का बड़ा हिस्सा सीधे जनसुराज के खाते में गया, पहले यह राजद के हिस्से आती थी.अब सवाल है कि क्या भाजपा का कोर वोटर नाराज है?जानकार कहते हैं कि 2026 के उप चुनाव से पहले तक जो ट्रेंड दिख रहा था, उसमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक तबकों के वोटरों को बिहार में भाजपा का विरोधी माना जा रहा था. यानी कि इस वर्ग को वोटर भाजपा को वोट नहीं कर रहे थे!लेकिन बांकीपुर के उप चुनाव के नतीजों के बाद चर्चा इस बात हो रही है कि इस बार नाराजगी भाजपा के उसी वर्ग में दिखी जिसे उसका सबसे मजबूत समर्थक माना जाता है, जैसे कि अर्बन मिडिल क्लास और सवर्ण मतदाता.चुनाव प्रचार के दौरान भी यह देखने को खुब मिला कि भाजपा के लिए सोशल मीडिया और मोहल्लों में सक्रिय रहने वाला समर्थक वर्ग पहले जैसी आक्रामकता से पार्टी के पक्ष में नहीं था.विधानसभा उप चुनाव में वोटरों की नाराजगी को लेकर राजनीतिक जानकार कहते हैं कि भाजपा का अपना यह कोर वोट बैंक भाजपा को यह संदेश देना चाहता है कि उसे अब फॉर ग्रांटेड नहीं लिया जा सकता हैअगर सच में नाराजगी है तो इसकी वजह क्या है?अब 9 महीने पहले 51,936 वोटों से जीतने वाली भाजपा अगर 51 हजार वोट भी नहीं पा सकी तो नाराजगी तो है. इसके पीछे क्या कारण है? इसको लेकर राजनीतिक गलियारों में में कई कारणों की चर्चा हो रही है.चुनाव प्रचार के दौरान बिहार भाजपा के भीतर नेतृत्व को लेकर भी असंतोष की खबरें भी आई. कुछ वर्गों में दबी जवान यह चर्चा हो रही थी कि पार्टी की राजनीतिक शैली धीरे-धीरे उस पार्टी विद डिफरेंस वाली छवि से दूर होती जा रही है.जानकार इसके लिए उम्मीदवार चयन का उदाहरण देते है. बांकीपुर में नीरज सिन्हा की उम्मीदवारी को लेकर पार्टी के भीतर और समर्थक वर्ग में सवाल उठे और स्थानीय स्तर पर नाराजगी सामने आई.हालांकि कायस्थ समुदाय को पारंपरिक रूप से भाजपा समर्थक माना जाता है, लेकिन चुनाव के दौरान इसके अलावा गैर-कायस्थ सवर्ण, विशेषकर भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत समाज, में भी पार्टी को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार होती रही.छात्रों के मुद्दों ने कितना प्रभावित किया और उसका क्या असर रहाबांकीपुर विधानसभा में कुल वोटरों की संख्या 3.79 लाख है. इसमें 14% वोटर 29 साल से कम उम्र वाले हैं यानी की 53,419 वोटर. अब अगर आप पिछले एक साल में जिन मुद्दों को लेकर खुब चर्चा हुई उसकी तुलना करेंगे तो पाएंगे कि इसमें ज्यादातर मुद्दे शिक्षा और युवाओं से जुड़े थे. जो इस चुनाव में भी महत्वपूर्ण फैक्टर बनकर उभरे.NEET परीक्षा विवाद, UGC इक्विटी रेगुलेशन, पटना में जहानाबाद की NEET छात्रा के कथित रेप-मर्डर मामला, भरत तिवारी एनकाउंटर और छात्रों के आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों को लेकर युवा और छात्रों में काफी नाराजगी थी. जिसे विपक्ष और जनसुराज ने लगातार उठाया,बांकीपुर इस मामले में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पटना में जहां छात्रों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की घटनाएं हुईं, वह इलाका इसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर आता है. मतदान से पहले सोशल मीडिया पर इन घटनाओं के वीडियो बड़े पैमाने पर साझा किए गए. इसको लेकर छात्रों और युवाओं के अभिभावक और परिजनों में अच्छी खासी नाराजगी थी.चुनावी नतीजों के अनुसार बड़ी संख्या में युवा मतदान करने नहीं पहुंचे, लेकिन जो युवा वोट डालने निकले, उनके रुझान भाजपा के खिलाफ बताए जा रहे थे. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि युवाओं के एक हिस्से में भाजपा के प्रति नाराजगी देखने को मिली.क्या भाजपा को पहले से था नतीजों का अंदेशा ?अब सवाल ये है कि चुनावी राजनीति में माहिर मानी जाने वाली भाजपा को इस खेल का अंदाजा नहीं था ? इस सवाल के जवाब में राजनीतिक जानकार कहते हैं कि पार्टी को सवर्ण समाज में असंतोष की जानकारी पहले से थी.क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी द्वारा सवर्ण नेताओं की अलग-अलग बैठक कराई जा रही थी, मोहल्लों और हाउसिंग सोसायटियों में उन्हें सक्रिय किया गया था. करीब 40 स्टार प्रचारकों में 15 से अधिक की संख्या इसी सामाजिक समूह से जुड़े नेताओं का था.हालांकि इसके बावजूद पार्टी अपने पारंपरिक समर्थकों को पूरी तरह एकजुट रखने में सफल नहीं हो सकी.तो प्रशांत किशोर को मिल गया नया राजनीतिक फार्मूला?परिणाम बताते हैं कि भाजपा और राजद, दोनों के वोट शेयर में गिरावट आई, जबकि इसका सबसे बड़ा फायदा जनसुराज को मिला, क्योंकि प्रशांत किशोर भारी संख्या में दोनों तरफ के वोटरों को अपने साथ मिलाने में कामयाब रहे.बांकीपुर के नतीजों के बाद यह चर्चा भी हो रही कि प्रशांत किशोर अब केवल विरोधी दलों के वोटों पर निर्भर रहने की रणनीति नहीं अपना रहे हैं, बल्कि उनका प्रयास भाजपा के नाराज समर्थकों को अपने साथ जोड़ने का है.यदि यह प्रयोग आगे भी सफल रहता है तो जनसुराज बिहार की राजनीति में उस राजनीतिक स्पेस को भरने की कोशिश कर सकती है, जिसे कभी जदयू का प्रभाव क्षेत्र माना जाता था और जहां राजद भी लगातार कमजोर होती दिख रही है.