भाई की मंगलकामना के लिए 22 सितंबर को बहनें रखेंगी करमा एकादशी व्रत, जानें पूजा और पारण की परंपरा

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करमा एकादशी का व्रत भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करता है. इस बार 22 सितंबर को महिलाएं और बालिकाएं अपने भाइयों की मंगलकामना के लिए यह व्रत रखेंगी. जानें इसकी खास परंपराएं और पूजा विधि.

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औरंगाबाद भारतीय सनातन संस्कृति में लोक परंपरा के अनुसार भाई की मंगलकामना के लिए महिलाओं और बालिकाओं द्वारा रखा जाने वाला करमा एकादशी व्रत 22 सितंबर मंगलवार को किया जाएगा. यह व्रत हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को विधि-विधान से किया जाता है. इस वर्ष एकादशी तिथि सोमवार की शाम 6 बजकर 18 मिनट से मंगलवार की रात 7 बजकर 58 मिनट तक रहेगी. ऐसे में व्रत मंगलवार को ही रखा जाएगा. इस एकादशी को पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है.

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महिलाओं और बालिकाओं में रहती है खास आस्था

ज्योतिर्विद डॉ. हेरम्ब कुमार मिश्र ने बताया कि करमा व्रत को लेकर धर्मावलंबियों में काफी आस्था रहती है. बालिकाओं और महिलाओं में करमा एकादशी को लेकर करीब एक माह पहले से ही ललक बनी रहती है और वे इस तिथि का इंतजार करती हैं.

मान्यता है कि महिलाएं यह व्रत अपने भाइयों के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और वैभव की कामना के लिए करती हैं. वहीं, करमा एकादशी का व्रत करने से स्वयं के लिए भी सौभाग्य की प्राप्ति, कष्टों का निवारण और दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है. ऐसी मान्यता है कि इससे परिवार में खुशी आती है और विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं.

बिहार, झारखंड और यूपी में भी है महत्व

ज्योतिर्विद के अनुसार बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य प्रदेशों में भी करमा एकादशी का विशेष महत्व है. मध्य प्रदेश में इस व्रत को डोलाग्यरस के नाम से जाना जाता है.

झूर काशी और बेलौन्धर पूजन की परंपरा

प्राचीन काल से करमा एकादशी व्रत करने वाली महिलाओं और बालिकाओं द्वारा आंगन में लकड़ी के पीढ़े पर झूर काशी और बेलौन्धर रखकर पूजन करने की परंपरा रही है. धार्मिक और वैदिक मान्यताओं के अनुसार महिलाएं झूर के नीचे मिट्टी से भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा बनाकर पूजा करती हैं.

मान्यता है कि इससे पारिवारिक सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है. भगवान गणेश की पूजा से बुद्धि और ज्ञान का आशीर्वाद मिलता है. भगवान विष्णु, शंकर, पार्वती और गणेश की आराधना से जीवन की बाधाएं दूर होने की भी मान्यता है. शास्त्रों के अनुसार देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु शयन में चले गये थे और भादो एकादशी पर उन्होंने करवट बदली थी.

भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है व्रत

करमा एकादशी का भाई-बहन के रिश्ते से भी अटूट संबंध माना जाता है. व्रत रखकर बहनें अपने भाइयों की रक्षा और मंगलकामना के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना करती हैं. सनातन धर्म में करमा को पारंपरिक और धार्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है. छोटी बच्चियों से लेकर बड़ी लड़कियां और महिलाएं इस व्रत को रखकर विधि-विधान से पूजा करती हैं.

पूजा के दौरान भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है और उन्हें बेलपत्र व धतूरा अर्पित किया जाता है. इसके बाद व्रती कर्मा और धर्मा नामक दो भाइयों पर आधारित पौराणिक कथा का श्रवण करती हैं.

सूर्योदय के बाद होगा व्रत का पारण

इस व्रत का पारण बुधवार को सूर्योदय के बाद किया जाएगा. लोक परंपरा के अनुसार बासी भात, दही और कर्मी का साग खाकर व्रती पारण करती हैं और इसी के साथ व्रत का अनुष्ठान पूरा होता है. करमा एकादशी के अनुष्ठान में लोक परंपराओं के साथ सांस्कृतिक झलक भी देखने को मिलती है. एकादशी व्रत के दौरान तामसी भोजन करना निषेध माना गया है.

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