विभाग को ढो रहीं तीन खटारा बसें

Updated at :14 Jan 2015 8:31 AM
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विभाग को ढो रहीं तीन खटारा बसें

खामोशी की चादर में लिपट चुका है परिवहन निगम का औरंगाबाद डिपो औरंगाबाद (ग्रामीण) : कभी वाहनों की आवाजाही व यात्रियों की चहलकदमी से बिहार राज्य पथ परिवहन निगम का बस डिपो गुलजार रहता था. सूबे के विभिन्न जिलों के साथ-साथ अन्य प्रदेशों को जाने वाली वाहनों की कतार लगी रहती थी. कर्मचारियों का रौब […]

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खामोशी की चादर में लिपट चुका है परिवहन निगम का औरंगाबाद डिपो
औरंगाबाद (ग्रामीण) : कभी वाहनों की आवाजाही व यात्रियों की चहलकदमी से बिहार राज्य पथ परिवहन निगम का बस डिपो गुलजार रहता था. सूबे के विभिन्न जिलों के साथ-साथ अन्य प्रदेशों को जाने वाली वाहनों की कतार लगी रहती थी. कर्मचारियों का रौब भी खूब चलता था.
सरकारी बसों की भीड़ गैर सरकारी बस मालिकों को काफी परेशान करती थी. यात्रियों को भी सरकारी बस डिपो से सुलभ होता था. लेकिन, अब सरकारी बस डिपो ने खामोशी की चादर ओढ ली है. चारों तरफ वीरानगी पसरा रहता है. अब न वो भीड़ और न वह दौर. दर्जनों बसों की जगह पर इक्के -दुक्के बस ही अब दिखते हैं.
वह भी अपनी अंतिम सांस गिन रही है. अब, जिस विभाग की स्थिति ही खस्ताहाल है तो उस विभाग के कर्मचारियों की स्थिति क्या होगी. आधे दर्जन वाहन मरम्मत के अभाव में जजर्र हुए और अब तो सड़ चुकी है. जो वाहन अभी चल रहे हैं वह भी 12 वर्ष पुरानी हो गयी है. वैसे आठ वर्ष की उम्र पार करने के बाद ही विभाग अपने वाहन को डेड घोषित कर देती है.
लेकिन खटारा हो चुके इस विभाग को तीन गाड़ी खींच रही है. यात्री शेड, टिकट काउंटर, कर्मचारियों का कार्यालय अब सिर्फ याद के सहारे जिंदा है. अब इसका जिम्मेवार कौन है, यह तो विभाग ही जानती होगी या उसके कर्मचारी. वैसे कर्मचारी संसाधन का रोना रो रहे हैं. कर्मचारियों की माने तो सरकार जिम्मेवार है.
1986 का मिल रहा वेतनमान : सरकार अब अपने कर्मचारियों को सातवीं वेतन देने जा रहा है. लेकिन परिवहन विभाग के कर्मचारी अब भी एक जनवरी 1986 के वेतनमान पर काम कर रहे हैं. सात से आठ हजार सर्वाधिक वेतन है.
1996 में पांचवीं वेतन व 2006 में छठा वेतन लागू किया गया.लेकिन इसका लाभ इन कर्मचारियों को नहीं मिला. मामला न्यायालय में चल रहा है. कर्मचारियों की मानें तो चार माह से उच्च न्यायालय ने फैसले को रिजर्व कर लिया है. परिवहन निगम के कर्मचारियों को मिल रहे वेतन से लगता है कि इतना कम वेतन पाने वाले सिर्फ यही सरकारी कर्मचारी हैं.
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