फारबिसगंज में मनाई गई महान क्रांतिकारी मंगल पांडे की जयंती: वक्ताओं ने कहा- उनके बलिदान ने भड़काई 1857 की क्रांति

महान क्रांतिकारी मंगल पांडे के जयंती समारोह में मौजूद लोग | Prabhat Khabar Network
फारबिसगंज में महान क्रांतिकारी मंगल पांडे की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई. इस अवसर पर उनके जीवन, साहस और 1857 के विद्रोह में उनके योगदान पर प्रकाश डाला गया. उपस्थित लोगों ने देश की संप्रभुता की रक्षा का संकल्प लिया.
अररिया जिले के फारबिसगंज शहर में देश की आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम के महानायक और महान क्रांतिकारी मंगल पांडे की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई. स्थानीय संस्था 'पंडित रामदेनी तिवारी द्विजदेनी क्लब' के तत्वावधान में रविवार को प्रोफेसर कॉलोनी के समीप स्थित पीडब्ल्यूडी (PWD) प्रांगण में एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया. इस जयंती समारोह की अध्यक्षता जाने-माने हिंदी सेवी अरविन्द ठाकुर ने की, जबकि पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन संस्था के संस्थापक विनोद कुमार तिवारी द्वारा किया गया.
चित्र पर पुष्प अर्पित कर दी गई श्रद्धांजलि
समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि वयोवृद्ध समाजसेवी शिवनारायण चौधरी, क्लब के पदाधिकारियों और उपस्थित प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा अमर शहीद मंगल पांडे के तैलचित्र पर माल्यार्पण और श्रद्धासुमन अर्पित कर किया गया. इसके बाद उपस्थित वक्ताओं ने बारी-बारी से देश की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर करने वाले इस महान सपूत के जीवन वृत्त, साहस और अप्रतिम बलिदान पर विस्तार से प्रकाश डाला.
1857 के विद्रोह का बिगुल: नगवा से बैरकपुर तक का सफर
मंच से वक्ताओं ने मंगल पांडे के उस ऐतिहासिक कदम को याद किया, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिलाकर रख दी थीं:
- जन्म और सेना में भर्ती: वक्ताओं ने बताया कि मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1823 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था. वे वर्ष 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे और बंगाल मूल की बैरकपुर छावनी में 34वीं नेटिव इन्फैंट्री बटालियन के सिपाही थे.
- विद्रोह की वो तारीख: 29 मार्च 1857 को नए एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी के प्रयोग को लेकर जब धार्मिक भावनाएं आहत हुईं, तो उन्होंने बैरकपुर में अकेले ही अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ सैन्य विद्रोह का बिगुल फूंक दिया और ब्रिटिश सार्जेंट मेजर पर गोली चला दी.
- शहादत की चिंगारी: इस दुस्साहसिक और देशभक्तिपूर्ण कदम के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और सैन्य अदालत द्वारा कोर्ट-मार्शल चलाकर 8 अप्रैल 1857 को निर्धारित तिथि से पहले ही फांसी दे दी गई. उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने पूरे देश में प्रथम स्वाधीनता संग्राम की एक ऐसी चिंगारी भड़का दी, जिसने आगे चलकर ब्रिटिश राज का अंत किया.
प्रबुद्ध नागरिकों व शिक्षकों की रही गरिमामयी उपस्थिति
इस प्रेरणादायी जयंती समारोह को सफल बनाने और अमर शहीद के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए फारबिसगंज के कई गणमान्य लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे:
- बुद्धिजीवियों की भागीदारी: कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रधानाध्यापक दिवाकर कुमार, वरिष्ठ शिक्षक नागेंद्र शुक्ला, राकेश रंजन, रमण कुमार चौधरी, सावन कुमार और प्रांजल शुक्ला सहित प्रोफेसर कॉलोनी के दर्जनों गणमान्य नागरिक और युवा उपस्थित थे.
- संकल्प: उपस्थित लोगों ने देश की संप्रभुता की रक्षा करने और नई पीढ़ी को देश के महान क्रांतिकारियों के गौरवशाली इतिहास से रूबरू कराने का सामूहिक संकल्प लिया.
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लेखक के बारे में
By कलीमउद्दीन
कलीमउद्दीन प्रिंट माध्यम में 24 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, अपराध, शिक्षा, राजनीतिक खबरों में रुचि रखते हैं.
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