शनि प्रदोष व्रत आज, ऐसे करें शिव पूजा, यहां जानें शुभ मुहूर्त से लेकर आरती-चालीसा तक सब कुछ

Edited by Neha Kumari
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शिवलिंग की पूजा करते हुए भक्त

Shani Pradosh Vrat: शनि प्रदोष व्रत के पावन अवसर पर भगवान शिव की कृपा पाने के लिए प्रदोष काल में विधि-विधान से पूजा करें. यहां जानें शुभ मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, शिव चालीसा, शिव आरती और व्रत से जुड़े महत्वपूर्ण धार्मिक नियम एक ही स्थान पर.

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Shani Pradosh Vrat: आज, 27 जून 2026, शनिवार को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर शनि प्रदोष व्रत का पावन पर्व मनाया जा रहा है. शास्त्रों के अनुसार, जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है. यह दिन देवों के देव भगवान शिव और कर्मफलदाता शनिदेव दोनों को प्रसन्न करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन श्रद्धा और सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा-अर्चना एवं व्रत करता है, उसके जीवन से दुख-दर्द और कष्ट दूर होते हैं तथा सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है.

शनि प्रदोष व्रत 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि

प्रदोष व्रत की पूजा सदैव प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में की जाती है. पंचांग के अनुसार—

  • त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 26 जून 2026, रात 10:22 बजे
  • त्रयोदशी तिथि समाप्त: 28 जून 2026, रात 12:43 बजे
  • प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त: 27 जून 2026, शाम 7:20 बजे से रात 9:29 बजे तक

शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करके गंगाजल का छिड़काव करें. हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें. भगवान शिव के समक्ष दीपक और धूप जलाएं. अपनी श्रद्धा के अनुसार फलाहार या निर्जल व्रत रखते हुए पूरे दिन सात्विक नियमों का पालन करें.

शाम को प्रदोष काल में पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और भगवान शिव की पूजा करें. शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध तथा पंचामृत से अभिषेक करें. इसके बाद चंदन का तिलक लगाएं और साबुत एवं स्वच्छ बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प तथा अक्षत अर्पित करें. शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए शिवलिंग पर काले तिल भी अर्पित करें.

इसके बाद फल, मिष्ठान और अन्य नैवेद्य अर्पित करें. भगवान शिव के मंत्रों का जाप करें तथा शिव चालीसा, प्रदोष व्रत कथा और शिव आरती का पाठ करें. अंत में कपूर या घी का दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें.

पूजा के पश्चात निकट स्थित शनि मंदिर या पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं. वहां काले तिल, काली उड़द की दाल अथवा काले वस्त्र का दान करें तथा यथाशक्ति “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें.

भगवान शिव चालीसा

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

श्री शिव चालीसा

जय गिरिजापति दीन दयाला।
सदा करत संतन प्रतिपाला॥

भाल चंद्रमा सोहत नीके।
कानन कुंडल नागफनी के॥

अंग गौर, शिर गंग बहाए।
मुंडमाल तन क्षार लगाए॥

वस्त्र खाल बाघंबर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥

मैना मातु की हवे दुलारी।
वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नंदी गणेश सोहैं तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुम्हहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद माहि महिमा तुम गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए विहाला॥

कीन्ही दया तहँ करी सहाई।
नीलकंठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सबके घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकारो।
यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट ते मोहि आन उबारो॥

मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जाँचे सो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शंभु सहाई॥

ऋणी जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पंडित त्रयोदशी को लावे।
ध्यानपूर्वक होम करावे॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म-जन्म के पाप नसावे।
अंत धाम शिवपुर में पावे॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्य नियम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

माघसिर छठि हेमंत ऋतु, संवत चौसठ जान।
स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

भगवान शिव की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन, चतुरानन, पंचानन राजे।
हंसासन, गरूड़ासन, वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज, चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला, वनमाला, मुंडमाला धारी।
त्रिपुरारी, कंसारी, कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।
सनकादिक, गरुणादिक, भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमंडलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी, दुखहारी, जगपालनकारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग, धतूरा का भोजन, भस्मी में वासा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुंडन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

शिवजी की आरती (2)

हर-हर-हर महादेव!

सत्य, सनातन, सुंदर, शिव सबके स्वामी।
अविकारी, अविनाशी, अज अंतर्यामी॥

हर-हर-हर महादेव!

आदि, अनंत, अनामय, अकल, कलाधारी।
अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥

हर-हर-हर महादेव!

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तुम त्रिमूर्तिधारी।
कर्ता, भर्ता, धर्ता, तुम ही संहारी॥

हर-हर-हर महादेव!

रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औढरदानी।
साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता अभिमानी॥

हर-हर-हर महादेव!

मणिमय भवन निवासी, अति भोगी-रागी।
सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥

हर-हर-हर महादेव!

छाल-कपाल, गरल-गल, मुंडमाल व्याली।
चिता-भस्म तन, त्रिनयन, अयन महाकाली॥

हर-हर-हर महादेव!

प्रेत-पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी।
विवसन, विकट रूपधर, रुद्र प्रलयकारी॥

हर-हर-हर महादेव!

शुभ्र, सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।
अतिकमनीय, शांति कर, शिव मुनि मनहारी॥

हर-हर-हर महादेव!

निर्गुण, सगुण, निरंजन, जगमय नित्य प्रभो।
कालरूप केवल हर, कालातीत विभो॥

हर-हर-हर महादेव!

सत्, चित्, आनंद रसमय, करुणामय धाता।
प्रेम-सुधानिधि प्रियतम, अखिल विश्व त्राता॥

हर-हर-हर महादेव!

हम अति दीन, दयामय! चरण-शरण दीजै।
सब विधि निर्मल मति कर, अपना कर लीजै॥

हर-हर-हर महादेव!

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

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नेहा कुमारी प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वे धर्म, ज्योतिष, राशिफल, व्रत-त्योहार, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं. उनकी विशेष रुचि धार्मिक परंपराओं, ज्योतिषीय विश्लेषण और दैनिक राशिफल को सरल, सटीक और पाठक-हितैषी भाषा में प्रस्तुत करने में है. नेहा का उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धर्म, संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों को आसानी से समझ सकें. उनकी लेखन शैली शोध-आधारित, सरल और स्पष्ट है, जो जटिल विषयों को भी सहज और रोचक बना देती है. वे राशिफल, ग्रह-गोचर, व्रत-त्योहार, धार्मिक मान्यताओं, वास्तु, पौराणिक प्रसंगों और भारतीय रीति-रिवाजों से संबंधित विषयों पर नियमित रूप से लेख लिखती हैं. डिजिटल पत्रकारिता में उनकी रुचि पाठकों की जरूरतों को समझते हुए जानकारीपूर्ण, SEO-अनुकूल और प्रभावी कंटेंट तैयार करने में है.

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