शिव को प्रिय सावन: जानें कनखल में क्यों 1 महीने रहते हैं भोलेनाथ?
कनखल शिव मंदिर से जुड़ी मान्यता
सावन में कनखल का दक्षेश्वर महादेव मंदिर शिवभक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है. जानिए भगवान शिव के यहां एक महीने रहने की पौराणिक मान्यता.
लेखक: रघोत्तम शुक्ल, पूर्व पीसीएस, लखनऊ
Kanakhal Shiva Temple: भगवान भोलेनाथ को प्रिय श्रावण मास हिंदू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है. स्कंद पुराण के ‘श्रावण मास माहात्म्य’ में भगवान शिव के वचन के रूप में श्रावण को बारह महीनों में अत्यंत प्रिय बताया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इस महीने में श्रद्धापूर्वक शिव पूजा करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है. ‘श्रावण’ नाम का संबंध श्रवण नक्षत्र से माना जाता है, क्योंकि इस मास की पूर्णिमा को चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में रहता है. भगवान शिव ने चंद्रदेव को अपने मस्तक पर धारण किया है, इसलिए चंद्रमा और श्रावण के बीच धार्मिक संबंध भी जोड़ा जाता है.
कनखल में एक महीने रहते हैं भोलेनाथ, ऐसी है मान्यता
भगवान शिव को सावन प्रिय होने के पीछे एक प्रचलित पौराणिक कथा कनखल से जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, भगवान शिव का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से हुआ था. दक्ष ने एक महायज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किया. यज्ञ में सती के अपमान और शिव के प्रति अनादर से आहत होकर उन्होंने योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी. इसके बाद शिव के क्रोध से वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस किया. देवताओं की प्रार्थना पर शिव का क्रोध शांत हुआ और मान्यता है कि उन्होंने कनखल में प्रतिवर्ष एक महीने रहने का वचन दिया. यही महीना सावन माना जाता है. यहां दक्षेश्वर महादेव मंदिर और सती कुंड इस कथा से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थल हैं.
वर्षा और प्रकृति से भी जुड़ा है सावन
श्रावण वर्षा ऋतु का महत्वपूर्ण समय है. धार्मिक दृष्टि से चंद्रदेव को वनस्पतियों और औषधियों के पोषण से जोड़ा गया है और वर्षा को प्रकृति के जीवनचक्र का आधार माना गया है. इसलिए सावन को शिव उपासना के साथ प्रकृति और जीवन के संरक्षण से जोड़कर भी देखा जाता है. इस महीने में जलाभिषेक की परंपरा इसी भाव को आध्यात्मिक रूप देती है.
पार्वती की तपस्या और हरियाली तीज से भी संबंध
एक अन्य पौराणिक मान्यता माता पार्वती की कठोर तपस्या और शिव-पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ी है. माता पार्वती की अनन्य भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया. धार्मिक परंपरा में इस प्रसंग को सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया यानी हरियाली तीज से भी जोड़ा जाता है. इसी कारण सावन में शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है.
ऐसे करें सावन में शिव पूजा
श्रावण पूजा के लिए पार्थिव शिवलिंग स्थापित कर स्वच्छ जल से स्नान कराएं. इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से पंचामृत अभिषेक करें और फिर गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित करें. बेलपत्र, धतूरा, अर्क और मौसमी पुष्प चढ़ाएं. धार्मिक परंपरा में केतकी पुष्प को शिव पूजा में वर्जित माना जाता है. चंदन और भस्म से शिवलिंग का श्रृंगार करने के बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें. शिव महिम्न स्तोत्र, शिव तांडव स्तोत्र और रुद्राष्टक का पाठ भी किया जाता है.
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आरती, भोग और सेवा से पूर्ण करें पूजा
पूजा के अंत में धूप-दीप जलाकर आरती करें और बिल्व फल, मौसमी फल, मिष्ठान्न, खीर या पकवान का भोग लगाएं. प्रसाद परिवार के साथ ग्रहण करें और पशु-पक्षियों के लिए भी अन्न-जल की व्यवस्था करें. इससे पूजा में सेवा और करुणा का भाव जुड़ता है.
शिव पूजा में सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा
शैव पुराणिक परंपरा में शिव पूजा में भाव और भक्ति को विशेष महत्व दिया गया है. इसलिए विस्तृत विधि संभव न हो तो श्रद्धापूर्वक ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप और भगवान शिव का स्मरण भी किया जा सकता है. शिव-पार्वती को अर्द्धनारीश्वर स्वरूप मानते हुए पूजा में माता पार्वती का स्मरण करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है.
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By शौर्य पुंज
मैं धर्म, ज्योतिष और आध्यात्मिक विषयों पर लेखन में विशेषज्ञता रखता हूं. हस्तरेखा शास्त्र, राशिफल, ग्रह-नक्षत्र, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक कथाओं से जुड़े विषयों पर मेरी विशेष रुचि और गहरी समझ है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. धर्म और ज्योतिष के अलावा एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी लगातार लेखन करता रहा हूं. मेरी कोशिश रहती है कि जटिल विषयों को आसान, रोचक और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाया जाए.
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