Gita Gyan: हर काम के बाद रिजल्ट की चिंता सताती है? श्रीकृष्ण की ये बात समझ लें, मन रहेगा शांत

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श्रीकृष्ण और अर्जुन (PC- medium)

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Bhagavad Gita Gyan: क्या आप भी अपने हर काम के नतीजे को लेकर परेशान रहते हैं? सफलता मिलेगी या नहीं, यह सोचकर मन बेचैन रहता है. श्रीकृष्ण ने गीता में इस परेशानी से जुड़ी ऐसी बात बताई है, जिसे अगर जीवन में अपनाया जाए, तो इस समस्या को दूर किया जा सकता है.

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Bhagavad Gita Gyan: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई किसी न किसी बात को लेकर परेशान रहता है. नौकरी में काम का दबाव, पढ़ाई में अच्छे नंबर की चिंता या भविष्य को लेकर डर, इन सबके बीच मन अक्सर बेचैन रहता है. हम मेहनत तो करते हैं, लेकिन साथ ही बार-बार यही सोचते रहते हैं कि इसका नतीजा क्या होगा और सफलता मिलेगी या नहीं. यही चिंता धीरे-धीरे मानसिक तनाव का कारण बन जाती है. भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कर्म और उसके फल को लेकर ऐसी सीख दी है, जिसे समझकर हम इस चिंता को कम कर सकते हैं.

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बिना किसी स्वार्थ के अपना काम करते रहें

1. कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥

अध्याय 5, श्लोक 11

भावार्थ: मनुष्य को अपने काम के नतीजे की ज्यादा चिंता या उससे लगाव नहीं रखना चाहिए. श्रीकृष्ण कहते हैं कि इंसान को शरीर, मन और इंद्रियों से अपना काम करते हुए आसक्ति छोड़ देनी चाहिए. यानी व्यक्ति को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए, लेकिन उसके नतीजे को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए. बिना स्वार्थ के किया गया कर्म मन को शांत रखने में मदद करता है.

कर्म के फल की चिंता छोड़ने से मिलती है मन की शांति

2. युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥

अध्याय 5, श्लोक 12 

भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति कर्म के फल की इच्छा छोड़कर अपना काम करता है, उसे मन की शांति मिलती है. वहीं, जो व्यक्ति हर काम के नतीजे की चिंता करता है और अपनी इच्छा के अनुसार फल चाहता है, वह चिंता और परेशानी में फंस जाता है.

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हर चीज को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश न करें

3. सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥

 अध्याय 5, श्लोक 13 

भावार्थ: जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है और अपने किए काम पर अहंकार नहीं करता, वह सुख और शांति से जीवन जीता है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को खुद को हर काम का कर्ता नहीं मानना चाहिए. जीवन में कुछ चीजें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं. इसलिए जो हमारे हाथ में है, उस पर ध्यान देना चाहिए और बाकी चीजों को लेकर परेशान नहीं होना चाहिए.

हर काम का जिम्मेदार खुद को मानना सही नहीं

4. न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥

अध्याय 5, श्लोक 14 

भावार्थ: इंसान अपने स्वभाव के अनुसार काम करता है. लेकिन कई बार वह यह मानने लगता है कि हर काम उसी ने किया है और सब कुछ उसके हाथ में है. श्रीकृष्ण समझाते हैं कि ऐसा मानना सही नहीं है. हमें अपना काम करते रहना चाहिए, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि जीवन की हर चीज हमारे नियंत्रण में नहीं होती.

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