Gita Gyan: जब जीवन में सब खत्म सा लगे, श्रीकृष्ण की ये 3 सीख दिखाएंगी नई राह

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श्रीकृष्ण और अर्जुन (PC- medium)

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जब जीवन में मुश्किलें बढ़ने लगती हैं और हर रास्ता बंद नजर आता है, तब श्रीकृष्ण की ये सीख मन को संभालने में मदद कर सकती हैं. गीता के ये 3 श्लोक असफलता से उबरने, मन को शांत रखने और कठिन समय में ईश्वर पर विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं.

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Gita Gyan: जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब इंसान को लगता है कि उसके पास आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा है. नौकरी का छूटना, कारोबार में नुकसान, किसी अपने का साथ छोड़ देना या किसी असफलता का सामना करना व्यक्ति को अंदर से तोड़ सकता है. ऐसे समय में मन में निराशा और भविष्य को लेकर डर बढ़ने लगता है. भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कई ऐसी सीख दी हैं, जो मुश्किल समय में मन को संभालने और आगे बढ़ने की राह दिखाती हैं.

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असफलता के डर से रुकें नहीं, कर्म करते रहें

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

अध्याय 2, श्लोक 48

भावार्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को अपने कर्म करते रहना चाहिए और उसके परिणाम की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए. जीवन में सफलता मिले या असफलता, दोनों परिस्थितियों में मन को संतुलित रखना जरूरी है.

सीख: कई बार असफलता के बाद इंसान दोबारा कोशिश करने से डरने लगता है. उसे लगता है कि अगर फिर से हार मिली तो क्या होगा. ऐसे समय में श्रीकृष्ण की यह सीख याद रखनी चाहिए कि हमारे हाथ में केवल प्रयास है, परिणाम नहीं. इसलिए असफलता से डरकर रुकने के बजाय लगातार अपना कर्म करते रहना चाहिए.

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जब मन परेशान हो, तो उसे संभालना सीखें

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

अध्याय 6, श्लोक 35

भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन बहुत चंचल होता है और उसे नियंत्रित करना आसान नहीं है. लेकिन लगातार अभ्यास और वैराग्य यानी मोह और अनावश्यक आसक्ति को कम करने से मन को धीरे-धीरे नियंत्रित किया जा सकता है.

सीख: मुश्किल समय में मन बार-बार एक ही बात सोचता रहता है. बीती हुई घटनाओं को याद करना और भविष्य की चिंता करना व्यक्ति को और परेशान कर सकता है. ऐसे में खुद को संभालने के लिए मन को धीरे-धीरे सही दिशा में लगाने की कोशिश करनी चाहिए. लगातार अभ्यास से मन को शांत और स्थिर किया जा सकता है.

जब कोई रास्ता न दिखे, तब ईश्वर पर विश्वास रखें

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

अध्याय 18, श्लोक 66

भावार्थ: इस श्लोक में श्रीकृष्ण अपनी शरण में आने और सभी चिंताओं को छोड़ने का संदेश देते हैं. वह कहते हैं कि उनकी शरण में आने वाले व्यक्ति को डरने या शोक करने की जरूरत नहीं है.

सीख: यह भगवद्गीता का चरम श्लोक माना जाता है. 18 अध्यायों में कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान का मार्ग बताने के बाद श्रीकृष्ण अंत में ईश्वर की शरण और पूर्ण विश्वास का संदेश देते हैं. जीवन में जब परिस्थितियां बहुत कठिन हो जाएं और कुछ समझ न आए कि आगे क्या करना है, तब खुद को अकेला और असहाय समझकर हार नहीं माननी चाहिए. ऐसे समय में ईश्वर पर विश्वास और धैर्य बनाए रखना मन को हिम्मत देता है और आगे बढ़ने की ताकत देता है.

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