सुल्तानगंज से देवघर: 100 किलोमीटर की आस्था यात्रा में दिखा श्रद्धा, सेवा और संकल्प का अद्भुत संगम

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सुल्तानगंज से देवघर तक कांवड़ पथ पर उमड़ी भक्ति, जहां थकान से बड़ी है श्रद्धा

सुल्तानगंज से देवघर तक कांवड़ पथ पर उमड़ी भक्ति, जहां थकान से बड़ी है श्रद्धा

सावन के दौरान सुल्तानगंज से देवघर तक की लगभग 100 किलोमीटर लंबी कांवर यात्रा करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का प्रतीक बन जाती है. अजगैबीनाथ मंदिर से गंगाजल भरने के साथ शुरू होने वाली यह यात्रा केवल पैदल सफर नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और भक्ति का महायज्ञ है. जिलेबिया मोड़, इनारावरण, कटोरिया, चांदन और सुईया पहाड़ जैसे प्रमुख पड़ावों से गुजरते हुए कांवरिये कठिन रास्तों को भी "बोल-बम" के जयघोष के साथ आसान बना देते हैं.

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Sultanganj To Deoghar: सावन के पवित्र महीने में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, धैर्य और सामूहिक आस्था का जीवंत उदाहरण बन जाती है. हर कदम पर भक्ति का अनूठा अनुभव मिलता है.

अजगैबीनाथ से शुरू होती है आस्था की डगर

सुल्तानगंज स्थित अजगैबीनाथ मंदिर के पास सुबह की पहली किरण के साथ ही श्रद्धालुओं की भीड़ गंगा तट की ओर बढ़ने लगती है. भक्त गंगा स्नान कर पवित्र जल भरते हैं और बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करने का संकल्प लेते हैं. कंधों पर कांवर, मुख पर "बोल-बम" का जयघोष और मन में बाबाधाम पहुंचने की लालसा के साथ यह आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है. यही वह क्षण होता है, जहां एक सामान्य रास्ता श्रद्धा के मार्ग में बदल जाता है.

सेवा शिविर बनते हैं यात्रा के सहायक

कृष्णगढ़, गोपालपुर, वेलाटरी और मंगलपुर जैसे पड़ावों पर स्थापित सेवा शिविर कांवरियों को राहत प्रदान करते हैं. यहां पीने का पानी, शरबत, फल और प्राथमिक उपचार जैसी सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं. धार्मिक यात्राओं का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इन सेवा शिविरों की वजह से लाखों श्रद्धालुओं की यात्रा अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनती है. सामूहिक सेवा की यह परंपरा भारतीय धार्मिक संस्कृति की विशेष पहचान है.

जिलेबिया मोड़ पर दिखता है सेवा और समर्पण

जिलेबिया मोड़ का घुमावदार रास्ता कांवर यात्रा के सबसे चर्चित पड़ावों में से एक माना जाता है. यहां कठिन चढ़ाई और उतार के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं होता. कई कांवरिये कुछ देर विश्राम करते हैं तो कई अपने साथियों की मदद करते दिखाई देते हैं. धर्मशालाएं और नियंत्रण कक्ष लगातार यात्रियों की सहायता में जुटे रहते हैं. यह पड़ाव सेवा, सहयोग और सामूहिक भावना का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है.


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सुईया पहाड़ की कठिन चढ़ाई

सुईया पहाड़ पहुंचते ही यात्रा का सबसे चुनौतीपूर्ण चरण शुरू हो जाता है. खड़ी चढ़ाई के कारण कदम धीमे पड़ते हैं, लेकिन श्रद्धा कभी कमजोर नहीं होती. थके हुए श्रद्धालुओं को साथी कांवरियों और "बोल-बम" के नारों से नई ऊर्जा मिलती है. पुलिस चौकियों और सेवा केंद्रों की मौजूदगी यात्रियों को सुरक्षा और सहायता का भरोसा देती है. यही कारण है कि कठिन रास्ता भी भक्तों के लिए आसान महसूस होने लगता है.

विश्वास का चरम: देवघर पहुंचकर पूरी होती है साधना

चांदन और दुम्मा क्षेत्र पार करने के बाद कांवरियों को महसूस होने लगता है कि मंजिल अब करीब है. झारखंड में प्रवेश के साथ उत्साह कई गुना बढ़ जाता है. बीएन झा पथ, नंदन पहाड़, तिवारी चौक और फुट ओवरब्रिज से गुजरते हुए श्रद्धालु शिवगंगा पहुंचते हैं. यहां पहुंचते ही सारी थकान मानो समाप्त हो जाती है. बाबा बैद्यनाथ मंदिर में जलार्पण का क्षण इस पूरी यात्रा का सबसे भावुक और आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है.

रास्ता नहीं, श्रद्धा का महायज्ञ

सुल्तानगंज से बाबाधाम तक की कांवर यात्रा केवल 100 किलोमीटर का सफर नहीं है. यह श्रद्धा, अनुशासन, सेवा और संकल्प का ऐसा महायज्ञ है, जिसमें हर कदम भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक बन जाता है. यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस कठिन यात्रा को उत्साह और आस्था के साथ पूरा करते हैं.


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शौर्य पुंज

लेखक के बारे में

By शौर्य पुंज

मैं धर्म, ज्योतिष और आध्यात्मिक विषयों पर लेखन में विशेषज्ञता रखता हूं. हस्तरेखा शास्त्र, राशिफल, ग्रह-नक्षत्र, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक कथाओं से जुड़े विषयों पर मेरी विशेष रुचि और गहरी समझ है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. धर्म और ज्योतिष के अलावा एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी लगातार लेखन करता रहा हूं. मेरी कोशिश रहती है कि जटिल विषयों को आसान, रोचक और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाया जाए.

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