नीतीश कुमार को शपथ दिलाने वाले राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने शाहबानो प्रकरण के बाद कांग्रेस से क्यों तोड़ा था नाता?

Edited by Rajneesh Anand
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नीतीश कुमार को सीएम पद की शपथ दिलाते राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान

Arif Mohammad Khan : आरिफ मोहम्मद खान, एक ऐसी शख्सियत जिसे प्रगतिशील मुसलमान कहा जा सकता है. जो शाहबानो को गुजाराभत्ता दिलाने के लिए मंत्री पद छोड़ सकता है और धर्म के लिए यह कहता है कि उसे मौलवियों पर आश्रित नहीं होना चाहिए. एक समय था जब वे प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सबसे करीबी नेता थे, लेकिन शाहबानो के साथ हुए गलत व्यवहार के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और आज बीजेपी के साथ खड़े हैं, क्योंकि वे नैतिकता की राजनीति करने का दावा करते हैं.

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Arif Mohammad Khan : बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने 10वीं बार शपथ ली. यह बहुत ही खास अवसर था क्योंकि आजादी के बाद भारतीय राजनीति में किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 10बार सीएम पद की शपथ नहीं ली है. इस शपथग्रहण समारोह का महत्व इतना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद पटना पहुंचे और पहुंचे 20 अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी. इस समारोह में कई गणमान्य मौजूद थे,एक और अतिविशिष्ट व्यक्ति इस समारोह में मौजूद था, जिसका भारत की राजनीति में बहुत अहम योगदान है. सोचिए, अरे आपका ध्यान ना गया हो तो मैं याद दिलाती हूं कि वो हैं बिहार के राज्यपाल-आरिफ मोहम्मद खान.

कौन हैं आरिफ मोहम्मद खान?

आरिफ मोहम्मद खान अभी बिहार के राज्यपाल हैं. उनका जन्म 18 नवंबर 1951 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ था. आरिफ मोहम्मद खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए ऑनर्स किया और बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा प्राप्त की. वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे और 1970 के दशक की शुरुआत में वे AMU छात्र संघ के महासचिव और अध्यक्ष बने. वे शुरुआत से ही इस्लाम में मौजूद कट्टरपंथ का विरोध करते थे. उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत चौधरी चरण सिंह के साथ हुई थी. बाद में उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा और केंद्रीय मंत्री तक बने. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद आरिफ मोहम्मद खान राजीव गांधी के काफी करीबी रहे, लेकिन शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी के फैसले के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी. जनता दल, बीएसपी और फिर अंतत: वे बीजेपी के साथ आए.

शाहबानो प्रकरण में राजीव गांधी से आरिफ मोहम्मद खान का विवाद क्यों हुआ?

1985 के बाद जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने, तो उनकी छवि बेहद पाक-साफ थी. उनके करिश्माई व्यक्तित्व और नई विचारधारा से लोग प्रभावित थे. उन्होंने राजनीति को बदलने की बात कही थी. वे देश में सूचनाक्रांति लेकर आए थे. तकनीक की बातें लोगों को बहुत पसंद भी आ रही थी. उसी दौर में एक केस सामने आया, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से उस फैसले को लागू किया और इसी वजह से उनका आरिफ मोहम्मद खान से विवाद हुआ.

क्या था शाहबानो प्रकरण?

इंदौर में एक 62 वर्षीय महिला शाहबानो को उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने 5 बच्चों के साथ घर से निकाल दिया था. पांच बच्चों की परवरिश के लिए जब शाहबानो ने पति से गुजारा भत्ता मांगा तो उसे तलाक दे दिया गया. यह मामला 1978 का था. जब पति ने शाहबानो को गुजारा भत्ता नहीं दिया, तो वह कोर्ट पहुंची. जिला अदालत ने उसकी गुहार सुनी और उसके पति को यह आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता दे. बस उसी फैसले से विवाद शुरू हुआ.

शाहबानो का पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने उसके खिलाफ ही फैसला सुनाया और सरकार से सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने को कहा क्योंकि हिंदू महिलाएं गुजारा भत्ता पाने की हकदार थीं, लेकिन मुसलमान नहीं. कोर्ट के फैसले के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन होने लगा.मुसलमानों ने इसे शरीयत पर हमला और उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बताया.

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जब यह मामला संसद पहुंचा तो सरकार की ओर से गृहराज्यमंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वकालत की और कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है, क्योंकि शरीयत तलाकशुदा महिलाओं के गुजारा भत्ता की जिम्मेदारी पति को सौंपता है. एबीपी न्यूज के प्रधानमंत्री सीरियल में आरिफ मोहम्मद खान खुद कहते हैं कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनसे कहा था कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ हैं और वे किसी तरह का समझौता नहीं करेंगे. आरिफ मोहम्मद खान बताते हैं कि जब राजीव गांधी ने इस मामले में यूटर्न लिया और Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 लेकर आए, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार भी गौण हो गए. ऐसे में नैतिकता के आधार पर आरिफ मोहम्मद खान ने पहले मंत्री पद और बाद में कांग्रेस ही छोड़ दी.

एक सुधारवादी और प्रगतिशील मुस्लिम नेता हैं आरिफ मोहम्मद खान

आरिफ मोहम्मद खान ने हमेशा ही प्रगतिशील मुस्लिम समाज की सिफारिश की. उन्होंने महिलाओं के हक और धार्मिक सुधार की बातें की, जिसे मुस्लिम समाज में पसंद नहीं किया गया, पर उनकी छवि एक प्रगतिशील मुस्लिम राजनेता की बन गई.लेकिन यह सिर्फ धार्मिक सुधार तक ही सीमित नहीं है, उनकी विरासत न केवल धार्मिक सुधार की है, बल्कि वे मुस्लिम समाज और उनकी विचारधारा में भी आधुनिकता लाना चाहते हैं, ताकि महिलाओं को उनका हक मिले.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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