15 अगस्त 1947 को भारत ने करीब 200 साल की ब्रिटिश हुकूमत से आजादी हासिल की, लेकिन यह आजादी अपने साथ विभाजन के रूप में एक गहरी त्रासदी भी लेकर आई थी. सोचिए, एक ऐसा देश जो विविधताओं के बावजूद एकजुट होकर आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, वह अचानक दो हिस्सों में कैसे बंट गया? यह सवाल आज भी इतिहास के सबसे अहम सवालों में से एक है. इसलिए यह जानना जरूरी है कि भारत का विभाजन हुआ क्यों? आखिर वह कौन-सा फैसला था, जिसके कारण भारत को आजादी के साथ बंटवारा भी मिला? इतिहासकार इसके पीछे कई वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक मतभेदों और फैसलों को जिम्मेदार मानते हैं. दरअसल, यह वही कहानी है जिसे समझे बिना 15 अगस्त 1947 की आजादी को पूरी तरह समझना मुश्किल है. क्यों कमजोर पड़ने लगा संयुक्त भारत का सपना?इतिहास के पन्ने बताते हैं कि भारत का बंटवारा अचानक नहीं हुआ था. 3 जून 1947 को जब लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की योजना का ऐलान किया, तब तक इसके पीछे कई वर्षों की राजनीतिक खींचतान जमा हो चुकी थी.इस कहानी की कड़ी 1940 से शुरू होती है, जब मुस्लिम लीग ने अलग मुस्लिम राजनीतिक भविष्य की मांग को स्पष्ट रूप से सामने रखा. दूसरी तरफ कांग्रेस एक ऐसे आजाद भारत की कल्पना कर रही थी, जिसमें पूरा देश एक संघ के रूप में साथ रहे और केंद्र के पास महत्वपूर्ण शक्तियां हों.लेकिन सिर्फ पाकिस्तान की मांग सामने आ जाने से भारत का विभाजन तय नहीं हो गया था. अगले कुछ वर्षों तक ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐसे समझौते की कोशिशें होती रहीं, जिससे सत्ता हस्तांतरण भी हो और भारत की राजनीतिक एकता भी बनी रहे.द्वितीय विश्व युद्ध ने ब्रिटेन को आर्थिक और सैन्य रूप से काफी कमजोर कर दिया था. ब्रिटेन के लिए युद्ध में भारत बेहद महत्वपूर्ण था. इसी बीच 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा.स्टैफर्ड क्रिप्स के भारत आने का मकसद भारतीय नेताओं के साथ ऐसा समझौता करना था, जिससे भारत ब्रिटेन को द्वितीय विश्व युद्ध में सहयोग करे और बदले में युद्ध के बाद भारत में संवैधानिक बदलाव का रास्ता तैयार हो सके.लेकिन असली सवाल यह था कि क्या ब्रिटेन एकजुट भारत को सत्ता सौंप सकता था, या कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बढ़ती दूरी अब इतनी गहरी हो चुकी थी कि उसे पाटना मुश्किल था?ये भी पढ़ें: अन्ना के अनशन से JPSC आंदोलन तक, आजादी के बाद भी कायम है गांधी का सत्याग्रह मॉडल !आजादी का प्रस्ताव दिया, लेकिन सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं थे अंग्रेजक्रिप्स भारत के लिए एक बड़ा प्रस्ताव लेकर आए थे. ब्रिटेन ने संकेत दिया कि युद्ध खत्म होने के बाद भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जा सकता है और भारतीयों को अपना संविधान बनाने का अधिकार मिलेगा. लेकिन इसमें एक अहम बात थी कि कुछ प्रांत नए भारतीय संविधान को स्वीकार न करने का विकल्प रख सकते थे, यानी भविष्य में भारत के बंटने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं की गई थी.यहीं से बात अटक गई, कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज अभी सत्ता भारतीयों को सौंपें, जबकि मुस्लिम लीग को डर था कि आजादी के बाद सत्ता पर कांग्रेस का दबदबा हो सकता है, वह मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक सुरक्षा और ठोस गारंटी चाहती थी.नतीजा यह हुआ कि क्रिप्स मिशन किसी समझौते तक नहीं पहुंच सका.लेकिन क्रिप्स मिशन की नाकामी ने यह भी साफ कर दिया कि आजादी के सवाल पर सिर्फ ब्रिटेन और भारतीय नेताओं के बीच मतभेद नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति के भीतर भी गहरी खाई बन चुकी थी.इसके कुछ ही महीनों बाद अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू कर दिया. ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और दमन किया.इस दौरान एक अहम राजनीतिक बदलाव हुआ. कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के जेल में होने से मुस्लिम लीग को अपनी राजनीति और संगठन मजबूत करने का ज्यादा मौका मिला. आने वाले वर्षों में यही बढ़ती राजनीतिक ताकत सत्ता के बंटवारे के सवाल को और मुश्किल बनाने वाली थी.मुस्लिम लीग की राजनीतिक हठ1940 के दशक में मुस्लिम लीग अपनी राजनीति को एक अहम पड़ाव पर ले जा रही थी और अपनी अलग राजनीतिक पहचान को लेकर आगे बढ़ रही थी.मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने इस तर्क को तेजी से आगे बढ़ाया और पाकिस्तान की मांग को अपना प्रमुख राजनीतिक लक्ष्य बनाया. जैसे-जैसे कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद बढ़ते गए, लीग का प्रभाव भी बढ़ता गया.लेकिन कहानी इतनी सीधी भी नहीं थी. पाकिस्तान का विचार शुरू से ही एक तय नक्शे या एक ही संवैधानिक व्यवस्था के रूप में सामने नहीं आया था.1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन ने भी इस मांग पर विचार किया और एक अलग, पूरी तरह संप्रभु पाकिस्तान के बजाय एक ढीले भारतीय संघ का विकल्प सामने रखा. इसका मतलब यह था कि 1947 से पहले तक एक संयुक्त भारत की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी.सवाल यह था कि क्या कांग्रेस, मुस्लिम लीग और ब्रिटिश सरकार ऐसी व्यवस्था पर सहमत हो सकती थीं, जिसमें दोनों पक्षों के राजनीतिक हित सुरक्षित रहें? यह वह सवाल था, जिसका जवाब अगले कुछ महीनों में भारत की राजनीति और उसकी भौगोलिक स्थिति को हमेशा के लिए बदलने वाला था.1944 की गांधी-जिन्ना बातचीत और 1945 का शिमला सम्मेलनलेकिन मुस्लिम लीग की बढ़ती ताकत के बावजूद विभाजन अभी कोई तय भविष्य नहीं था. कांग्रेस और लीग के बीच समझौते की कोशिशें जारी थीं. इन्हीं कोशिशों में 1944 की गांधी-जिन्ना बातचीत एक अहम पड़ाव बनी.भारत के बंटवारे से पहले समझौते की कई कोशिशें हुईं. 1944 में महात्मा गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना के बीच लंबी बातचीत हुई, लेकिन दोनों इस सवाल पर सहमत नहीं हो सके कि आजाद भारत की राजनीतिक व्यवस्था कैसी होगी.गांधी और जिन्ना के बीच बातचीत से भी कोई समाधान नहीं निकला. लेकिन सत्ता हस्तांतरण का सवाल अब टाला नहीं जा सकता था. अगले साल वायसराय लॉर्ड वेवेल ने इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए शिमला सम्मेलन बुलाया.इसके बाद 1945 में वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला सम्मेलन बुलाया. इसका मकसद था एक नई अंतरिम सरकार बनाई जाए, जिसमें भारतीय नेताओं को ज्यादा भूमिका मिले.लेकिन यहां सवाल यह भी था कि भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि कौन करेगा?मुस्लिम लीग चाहती थी कि मुसलमानों की ओर से प्रतिनिधित्व का अधिकार सिर्फ उसी के पास हो, लेकिन कांग्रेस इस दावे को मानने के लिए तैयार नहीं थी.नतीजा हुआ कि शिमला सम्मेलन भी बिना किसी नतीजे के खत्म हो गया.1946 का चुनाव: मुस्लिम लीग को मिली राजनीतिक ताकतशिमला सम्मेलन की नाकामी के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया कि आखिर भारत के मुसलमानों का राजनीतिक प्रतिनिधि कौन है और आजाद भारत की सत्ता में उनकी भूमिका क्या होगी. इसका जवाब कुछ हद तक 1945-46 के चुनावों में दिखाई दिया.1945-46 में हुए आम और प्रांतीय चुनावों के नतीजों में तस्वीर काफी हद तक साफ होने लगी. कांग्रेस ब्रिटिश भारत के प्रांतों में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर सामने आई.मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया. इस सफलता ने जिन्ना के उस दावे को काफी मजबूती दी कि मुस्लिम लीग ही मुसलमानों की प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि है. लेकिन ऐसा नहीं था कि भारत के सभी मुसलमानों ने पाकिस्तान के लिए वोट किया था.इसलिए 1946 के चुनाव मुस्लिम लीग की बढ़ती राजनीतिक ताकत का बड़ा सबूत जरूर थे, लेकिन उन्हें पूरे मुस्लिम समाज का सीधा जनमत-संग्रह मानना सही नहीं होगा.ये भी पढ़ें: कौन था रैडक्लिफ? जिसने बिना देखे खिंच दी भारत-पाकिस्तान की सीमाकैबिनेट मिशन: संयुक्त भारत को बचाने का एक और प्रयासचुनावों के नतीजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राजनीतिक स्थिति को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था. अब ब्रिटेन के सामने सबसे बड़ा सवाल था, इन दोनों ताकतों के बीच समझौता कराकर सत्ता हस्तांतरण कैसे किया जाए और क्या भारत को एकजुट रखा जा सकता है?इसका जवाब खोजने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1946 में कैबिनेट मिशन को भारत भेजा. इसमें लॉर्ड पिथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर समेत अन्य लोग शामिल थे.मिशन ने सीधे-सीधे पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया. इसके बजाय उसने एक ऐसे ढीले भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा, जिसमें केंद्र के पास मुख्य रूप से रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे विषय हों, जबकि बाकी अधिकार काफी हद तक प्रांतों के पास रहें.प्रांतों को समूह बनाने की भी व्यवस्था दी गई थी. इस तरह कांग्रेस को भारत की एकता बनाए रखने की संभावना दिख रही थी, जबकि मुस्लिम लीग को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए राजनीतिक सुरक्षा का रास्ता नजर आ रहा था.यही वजह है कि कैबिनेट मिशन योजना को 1947 से पहले संयुक्त भारत बचाने की सबसे गंभीर कोशिशों में से एक माना जाता है.लेकिन दुविधा यह थी कि क्या कांग्रेस और मुस्लिम लीग इस समझौते की शर्तों को अपनी-अपनी तरह से स्वीकार करके साथ चल पाएंगी?यहां कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां समझौते की आखिरी बड़ी संभावना भी धीरे-धीरे टूटने लगी.क्यों फेल हो गया ब्रिटेन का कैबिनेट मिशन?कैबिनेट मिशन योजना कागज पर एक ऐसा रास्ता था, जिससे भारत को एकजुट रखा जा सकता था. लेकिन असली मुश्किल इसकी शर्तों में ही छिपी थी. कांग्रेस और मुस्लिम लीग इसकी व्याख्या और भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर अलग-अलग सोच रखती थीं.कांग्रेस चाहती थी कि भारत एक ऐसा संघ बने, जिसमें समय के साथ केंद्र मजबूत हो सके. वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम लीग को डर था कि अगर केंद्र में कांग्रेस का बहुमत रहा, तो मुस्लिम बहुल प्रांतों की राजनीतिक स्वायत्तता कमजोर हो सकती है.यानी दोनों पक्ष आजादी तो चाहते थे, लेकिन आजाद भारत में सत्ता किसके पास और कितनी होगी, इस पर सहमति नहीं बन पा रही थी.आखिरकार कैबिनेट मिशन की योजना ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और जुलाई 1946 में मुस्लिम लीग ने योजना से अपनी स्वीकृति वापस ले ली. इसके बाद राजनीतिक टकराव और ज्यादा बढ़ गया.1946 के बाद तेजी से बिगड़ने लगे हालातकैबिनेट मिशन योजना के टूटने के बाद विवाद अब सिर्फ संवैधानिक बातचीत तक सीमित नहीं रहा. राजनीतिक असहमति तेजी से सड़क पर उतरने लगी और 1946 में सांप्रदायिक हिंसा ने हालात को और गंभीर बना दिया.ब्रिटिश सरकार के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां थीं. एक तरफ भारत से सत्ता वापस लेनी थी और दूसरी तरफ कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच ऐसा समझौता कराना था, जिससे सत्ता हस्तांतरण संभव हो सके. लेकिन समय तेजी से निकल रहा था और दोनों पक्षों के बीच भरोसा लगातार कम हो रहा था.इसी दौर में अंतरिम सरकार के स्तर पर भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सत्ता साझा करने की मुश्किलें सामने आईं. इससे यह एहसास और मजबूत हुआ कि सिर्फ एक संवैधानिक समझौता कर लेना ही काफी नहीं था, दोनों पक्षों को उस व्यवस्था के भीतर मिलकर काम भी करना था.1947: अब मुश्किल हो चुका था फैसले को टालनाअब ब्रिटिश सरकार के सामने समय भी कम था और विकल्प भी सीमित होते जा रहे थे. कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच भरोसा लगातार टूट रहा था, जबकि ब्रिटेन भारत से जल्द सत्ता वापस लेने की दिशा में बढ़ रहा था.1947 में लॉर्ड माउंटबेटन के भारत आने के बाद सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया और तेज हुई. अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि भारत को आजादी कब मिलेगी, बल्कि यह भी था कि क्या सत्ता एक संयुक्त भारत को सौंपी जाएगी या दो अलग-अलग देशों को.आखिरकार 3 जून 1947 को ब्रिटिश सरकार ने विभाजन की योजना की घोषणा कर दी. इस योजना के तहत ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान में बांटने का रास्ता साफ हुआ.Indian Independence Act: विभाजन को मंजूरी3 जून की योजना ने विभाजन के राजनीतिक फैसले का रास्ता साफ कर दिया था. लेकिन इस फैसले को कानूनी और संवैधानिक रूप देने के लिए ब्रिटिश संसद की मंजूरी जरूरी थी.इसके बाद ब्रिटिश संसद ने Indian Independence Act, 1947 पारित किया, जिसे 18 जुलाई 1947 को मंजूरी मिली.कानून के तहत 15 अगस्त 1947 से भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र डोमिनियन बनने वाले थे. पंजाब और बंगाल के विभाजन तथा नई सीमाएं तय करने के लिए अलग व्यवस्थाएं की गईं.यानी भारत का विभाजन सिर्फ नेताओं के बीच हुआ कोई राजनीतिक फैसला नहीं था. इसे ब्रिटिश संसद के कानून के जरिए संवैधानिक और कानूनी रूप दिया गया था.कानून में दोनों देशों के लिए 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण की तारीख तय की गई थी. लेकिन पाकिस्तान में स्वतंत्रता समारोह 14 अगस्त को हुआ और आज भी वहां 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है.भारत में सत्ता हस्तांतरण 15 अगस्त को हुआ और जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने.दूसरी ओर मुहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के पहले गवर्नर-जनरल बने.ये भी पढ़ें: ऑफिशियल डाक्यूमेंट में है 15 अगस्त, फिर एक दिन पहले स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है पाकिस्तान?क्यों हुआ भारत का विभाजन?इस पूरी कहानी को सिर्फ एक नेता, एक पार्टी या एक फैसले से समझना मुश्किल है.1940 में मुस्लिम लीग की अलग राजनीतिक मांग, 1942 का क्रिप्स मिशन, 1944 की गांधी-जिन्ना बातचीत, 1945 का शिमला सम्मेलन, 1946 के चुनाव, कैबिनेट मिशन की असफलता, बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और आखिरकार 1947 की सत्ता हस्तांतरण योजना इन सभी पड़ावों ने मिलकर उस स्थिति को पैदा किया, जिसमें संयुक्त भारत की संभावना लगातार कमजोर होती गई.यानी भारत का विभाजन एक दिन में नहीं हुआ था. 1947 सिर्फ वह साल था, जब कई वर्षों से जमा हो रहा राजनीतिक संकट एक कानूनी और भौगोलिक फैसले में बदल गया.और यही वजह है कि 15 अगस्त 1947 की आजादी को समझने के लिए सिर्फ आजादी की कहानी जानना काफी नहीं है. उसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि वह आजादी आखिर किस राजनीतिक कीमत के साथ आई थी.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर