देश में लाखों लोग ऐसे हैं जो अपने विवादों के समाधान के लिए सामान्य अदालतों के बजाय ट्रिब्यूनल तक पहुंचते हैं. टैक्स, कंपनी कानून, बिजली, दूरसंचार, सर्विस मैटर और दूसरे विशेष क्षेत्रों से जुड़े मामलों के लिए बनाए गए इन निकायों से उम्मीद थी कि विशेषज्ञता वाले मामलों का निपटारा सामान्य अदालतों की तुलना में तेज होगा. लेकिन खाली पद, नियुक्तियों में देरी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण ट्रिब्यूनल सिस्टम लंबे समय से सवालों के घेरे में रहा है.बीते मानसून सत्र में संसद ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल, 2026 को मंजूरी दी है. सरकार का दावा है कि नए बदलावों से ट्रिब्यूनल व्यवस्था ज्यादा सक्षम, पारदर्शी और स्वतंत्र होगी. लेकिन आम आदमी के लिए सबसे अहम सवाल ये है कि क्या नए कानून से मुकदमों के निपटारे की रफ्तार सच में बढ़ेगी, या फिर ट्रिब्यूनल में भी ‘तारीख पर तारीख’ का सिलसिला जारी रहेगा?ट्रिब्यूनल रिफॉर्म बिल में क्या नया है?नए कानून की सबसे अहम व्यवस्था नेशनल ट्रिब्यूनल्स कमीशन की स्थापना है. सरकार के अनुसार इसका मकसद अलग-अलग ट्रिब्यूनलों के प्रशासन, नियुक्ति और कामकाज के लिए एक समान व्यवस्था तैयार करना है.आयोग सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया देखेगा, ट्रिब्यूनलों के कामकाज और प्रदर्शन की समीक्षा करेगा, शिकायतों से जुड़ी जांच की निगरानी करेगा और एक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल डेटा ग्रिड भी बनेगा.यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से ट्रिब्यूनलों को उनके संबंधित मंत्रालयों पर प्रशासनिक और वित्तीय निर्भरता से मुक्त करने की जरूरत बताता रहा है.ये भी पढ़ें: इस्तीफा दे चुके जस्टिस यशवंत वर्मा पर होगी महाभियोग की कार्यवाही? जानें पद से हटाने के लिए क्या है नियमपांच साल का कार्यकाल, नियुक्ति में तीन महीने की समयसीमानए कानून में ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन और सदस्यों का कार्यकाल पांच साल तय किया गया है.चेयरपर्सन के लिए अधिकतम आयु 70 साल और सदस्यों के लिए 67 साल रखी गई है. दोबारा नियुक्ति पर भी विचार किया जा सकता है.ट्रिब्यूनल की नियुक्ति प्रक्रिया, कार्यकाल और सेवा शर्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से विवाद रहा है. अदालत ने कई मौकों पर इस बात पर जोर दिया है कि नियुक्ति और सेवा शर्तों की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे ट्रिब्यूनल स्वतंत्र रूप से काम कर सकें और उन पर कार्यपालिका के प्रभाव की आशंका कम हो.नियुक्ति प्रक्रिया में भी बड़ा बदलाव किया गया है. चयन समिति हर खाली पद के लिए एक उपयुक्त नाम की सिफारिश करेगी और एक अतिरिक्त नाम प्रतीक्षा सूची में रखा जाएगा.सरकार को सिफारिश मिलने के तीन महीने के भीतर नियुक्ति करनी होगी. 2021 की व्यवस्था में सरकार के सामने दो नामों का पैनल होता था, जिससे उसके पास ज्यादा विकल्प और विवेकाधिकार रहता था.क्या सच में ‘तारीख पर तारीख’ खत्म होगी?यह इस कानून की सबसे बड़ी परीक्षा होगी.नियुक्तियों के लिए समय सीमा तय होना निश्चित रूप से खाली पद लंबे समय तक पड़े रहने की समस्या को कम कर सकता है.राष्ट्रीय डेटा ग्रिड से यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि किस ट्रिब्यूनल में कितने मामले लंबित हैं और वहां कामकाज की स्थिति क्या है.लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है कि नियुक्ति की समयसीमा और केस के निपटारे की समयसीमा एक ही चीज नहीं है.यानी सरकार को खाली पद पर तीन महीने के भीतर नियुक्ति करनी होगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रिब्यूनल में लंबित मामले भी तीन महीने में निपट जाएंगे.केवल कानून बदलने से लंबित मामलों का निपटारा अपने-आप तेज नहीं हो जाता. इसके लिए पर्याप्त संख्या में सदस्य, न्यायिक और तकनीकी कर्मचारी, जरूरी बुनियादी ढांचा और नियमित बजट भी चाहिए.इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि नए कानून के बाद हर मामले का फैसला जल्दी होने लगेगा. आम आदमी को वास्तविक राहत तभी मिलेगी जब नई व्यवस्था खाली पदों को तेजी से भरे और उसके बाद मामलों के निपटारे की रफ्तार भी बढ़े.सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच पुराना विवाद क्या है?ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से खींचतान रही है.2017 में बनाए गए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के रोजर मैथ्यू मामले में सवाल उठाए थे. इसके बाद 2020 और 2021 में नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों को लेकर विवाद फिर सामने आया.2021 के कानून में चार साल का कार्यकाल और नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका जैसे प्रावधान थे.नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि पहले जिन व्यवस्थाओं को अदालत ने खारिज किया था, उन्हें दोबारा लागू करना स्वीकार्य नहीं है.अदालत ने ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आयोग की जरूरत पर भी जोर दिया.ये भी पढ़ें: क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया रोक सकती है लॉ ग्रैजुएट्स का नामांकन ? जानिए कानून क्या कहता हैसरकार का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हुआ क्या?नहीं, यह इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू है. राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग बनाया जरूर जा रहा है, लेकिन केंद्र सरकार की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं होगी.आयोग के प्रमुख और सदस्यों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका है. आयोग के सचिव की नियुक्ति, अनुदान और कुछ नियम बनाने के अधिकार भी केंद्र के पास रहेंगे.हालांकि चेयरपर्सन और न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श का प्रावधान है.इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि ट्रिब्यूनल अब पूरी तरह सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गए हैं. हां, पहले की तुलना में नियुक्ति और प्रशासन के लिए ज्यादा संस्थागत व्यवस्था जरूर बनाई गई है.आम आदमी के लिए असली नतीजा कब दिखेगा?नया कानून ट्रिब्यूनल व्यवस्था की पुरानी समस्याओं को ठीक करने की दिशा में बड़ा कदम है.पांच साल का कार्यकाल, नियुक्ति के लिए तीन महीने की समयसीमा और राष्ट्रीय आयोग जैसी व्यवस्था कागज पर मजबूत दिखती हैं.लेकिन जनता के लिए इसकी सफलता का पैमाना कानून की धाराएं नहीं, बल्कि फैसले की रफ्तार होगी.अगर खाली पदों के लिए समय पर भर्ती होती हैं, मामलों की निगरानी बेहतर होती है और ट्रिब्यूनल अपनी क्षमता के मुताबिक मामलों का निपटारा तेजी से करने लगते हैं, तभी यह कानून आम आदमी को ‘तारीख पर तारीख’ से वास्तविक राहत दिला पाएगा.फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि सरकार ने व्यवस्था की पुरानी बीमारी का इलाज शुरू किया है. अब यह देखना बाकी है कि दवा का असर ट्रिब्यूनलों में लंबित आम लोगों के मामलों पर कितनी जल्दी दिखाई देता है.पढ़िए देश दुनिया और बिहार झारखंड की ओरिजिनल खबर