चावल और मांस से टेस्टी बिरयानी तक के सफर में बिरयानी ने लगाया काफी ‘दम’, भारतीयों मसालों ने बनाया है खास

Edited by Rajneesh Anand
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बिरयानी

Biryani in india : आज के दौर में बिरयानी हर तरह के भूख की पहली पसंद बन चुका है. जल्दी में कुछ खाना हो, देर रात कुछ खाना हो, वेज खाना हो, नाॅन वेज खाना हो, कुछ हेल्दी खाना हो या फिर पार्टी करनी हो. बिरयानी भारतीयों की व्यंजन लिस्ट में टाॅप पर रहता है. 2024 के ऑनलाइन फूड डिलीवरी को देखें, तो आंकड़े बताते हैं कि स्वीगी के पास 83 मिलियन और जोमैटो के पास लगभग 91 मिलियन बिरयानी डिलीवरी के ऑर्डर आए, जो प्रति सेकेंड 2 और 3 बिरयानी ऑर्डर की संख्या को बताते हैं. आखिर बिरयानी क्यों और कैसे लोगों की पहली पसंद बन गया? क्या आज जो बिरयानी हम खा रहे हैं, उसमें कुछ देशी टच है या फिर वो मुगलों के तरीके से ही बनाई जा रही है?

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Biryani in india : बिरयानी का नाम लेते ही एक ऐसे स्वादिष्ट व्यंजन का स्वाद मुंह में घुल जाता है, जो ना सिर्फ जीभ को जायका देता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक है. जी हां, यहां बात हो रही है खुशबूदार, जायकेदार बिरयानी की. बिरयानी कहते ही इसके फैंस की भीड़ जमा हो जाती है और डिमांड आना शुरू हो जाती है कि किसे कौन सी बिरयानी खानी है. भारत में बिरयानी की इतनी वेरायटी है कि हर राज्य में इसका अलग स्वाद मिल जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आज जो बिरयानी हम खा रहे हैं उसकी शुरुआत कहां से हुई? क्या बिरयानी एक भारतीय भोजन है या फिर यह चाउमीन की तरह एक विदेशी खाना है?

क्या है बिरयानी का इतिहास

बिरयानी में चावल और मांस को साथ में पकाकर खाया जाता है. अगर सिर्फ चावल और मांस को साथ में पकाकर खाने की बात की जाए, तो भारत में इसकी परंपरा मिलती है. मौर्य और गुप्त काल में चावल और मांस को साथ में पकाकर खाने के प्रमाण मिलते हैं, दक्षिण भारत में भी कई जगहों पर चावल और मांस को साथ में पकाकर खाया जाता था. लेकिन आज के समय में हम जिसे बिरयानी कहते हैं, वो अलग होती है और उसका इतिहास मुगलों और तुर्कों से जुड़ा है. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि मुगलों और तुर्कों ने जिसे बिरयानी कहा, उससे भारतीय बिरयानी काफी अलग है और उसका पूरी तरह भारतीयकरण कर दिया गया है. बिरयानी की पौष्टिकता और स्वाद ने ही इसे सबकी पसंद बनाया है.

बिरयानी की मां है पुलाव

बिरयानी शब्द फारसी के बिरयान शब्द से बना है. बिरयान का अर्थ होता है तली हुई या भूनी हुई चीज. भारत पर जब मुस्लिम शासकों का राज कायम हुआ, तो यहां उनके द्वारा खाए जाने वाले व्यंजन भी चर्चित होने लगे, जिसमें से एक बिरयानी थी है. लेकिन दिल्ली सल्लतनत के सुल्तानों के समय मांस और चावल को साथ में पकाकर जो व्यंजन बनाया जाता था, दरअसल वह बिरयानी नहीं था उसे पुलाव कहा जाता था. मुगलों ने बिरयानी को चर्चित किया, जिसे बनाने की प्रक्रिया काफी अलग थी और यही विधि इसे पुलाव से अलग और खास बनाती है.

पूरी तरह देसी है बिरयानी का स्वाद

Biryani
बिरयानी की खासियत

मुगल जब भारत आए, तो उन्होंने मांस और चावल को साथ पकाकर बनाने की एक खास शैली भी साथ लेकर आए. लेकिन उस शैली की बिरयानी में वो बात नहीं थी, जो भारतीय बिरयानी में होती है. भारतीय बिरयानी में गरम मसाले, धनिया, जीरा, दही और मिर्च का खास स्वाद होता है. साथ ही भारतीय बासमती चावल इसे और भी खास बनाता है. मुगलों ने जब देश में बिरयानी बनाना शुरू किया, तो उनकी शैली शाही होती थी, उसमें भारतीय और फारसी संस्कृति का संगम होता था. उन्होंने बिरयानी को दम लगाकर यानी स्टीम करके पकाने की खास शैली विकसित की, जो उस वक्त कहीं और प्रयोग में नहीं आ रही थी. केवड़ा और गुलाब जल के स्वाद से उन्होंने बिरयानी को बहुत ही खास बना दिया. मुगलों की बिरयानी में सूखे मेवे का प्रयोग अत्यधिक होता था, जो इसके स्वाद को शाही बनाता था.

मुगल काल की बिरयानी से थोड़ा अलग है आज की बिरयानी

मुगल काल में जो बिरयानी बनाई जाती थी, वह संतुलित होती थी. उसमें काली मिर्च और लाल मिर्च का प्रयोग थोड़ा कम होता था. लेकिन आज के समय में जो बिरयानी हम खा रहे हैं, उसका स्वाद तेज होता है, यानी बिरयानी तीखी बनाई जाती है. साथ ही बिरयानी भारतीयों के खान-पान में इस तरह शामिल हो गई कि यह जिस प्रदेश में गई वहां के अनुसार इसने अपना रूप बदला. आज के समय में हैदराबादी बिरयानी, लखनवी बिरयानी और कोलकाता की बिरयानी काफी चर्चित है. हैदराबादी बिरयानी में मसालों का प्रयोग ज्यादा होता है, जबकि लखनवी बिरयानी का अंदाज शाही है. कोलकाता की बिरयानी बंगाली स्टाइल की होती है, जिसमें आलू और चीनी दोनों का प्रयोग किया जाता है. हां, यह बात जरूर है कि हर जगह की बिरयानी को दम लगाकर और चावल और मांस का लेयर लगाकर बनाया जाता है, जो बिरयानी बनाने की मूल विधि है. दक्षिण भारत में तो कई तरह की बिरयानी प्रचलित है. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज जो बिरयानी हम खा रहे हैं, उसने अपना वर्तमान स्वरूप पाने के लिए काफी लंबी यात्रा तय की है. मांस और चावल को साथ पकाए जाने के बाद वह मसालों के साथ पका, फिर खुशबूदार मसाले और बासमती चावल के साथ बना और फिर इसी तरह रूप बदलते-बदलते यह आज के इंडो-इस्लामिक संस्कृति का खास व्यंजन बिरयानी बना, जिसकी डिमांड बहुत ज्यादा है.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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