RSS ने खुद को रजिस्टर्ड संगठन क्यों नहीं बनाया है? 100 साल बाद क्यों उठा ये सवाल
मोहन भागवत
RSS Registration Row : कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर उनसे यह पूछा है कि संघ खुद को रजिस्टर क्यों नहीं कर लेता है, जबकि वह देश का सबसे बड़ा संगठन होने का दावा करता है? एक संगठन जो 60,000 से ज्यादा शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करता है, उसे पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही भी बनाए रखनी चाहिए.उन्होंने यह भी कहा है कि अगर नागरिकों, मजदूरों, एनजीओ, ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे रजिस्टर करें, जानकारी दें और कानून का पालन करें, तो संघ को छूट क्यों मिलनी चाहिए? खरगे ने यह पत्र 15 जून को सोशल मीडिया एक्स पर डाला और उसके बाद से संघ के रजिस्ट्रेशन का मुद्दा गरमाया हुआ है.
RSS Registration Row : आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में है और इस बीच इस संगठन से एक विवाद जुड़ गया है. यह विवाद तब शुरू हुआ है, जब कांग्रेस के नेता प्रियांक खरगे ने यह सवाल उठाया कि भारत का सबसे बड़ा सोशियो-कल्चरल संगठन बिना रजिस्ट्रेशन के क्यों काम कर रहा है. उन्होंने संगठन की फंडिंग, उसके टैक्स कम्प्लायंस और ऑडिट की जरूरत का मुद्दा भी उठाया है. इस आलेख में समझते हैं कि आखिर 100 साल बाद भी आरएसएस ने खुद को रजिस्टर क्यों नहीं कराया और क्या इससे कानून का कोई उल्लंघन हो रहा है.
क्या RSS का खुद को रजिस्टर्ड ना कराना, उसे गैरकानूनी बनाता है?
आरएसएस का गठन 1925 में हुआ था, यानी यह आजादी से पहले का संगठन है. रजिस्ट्रेशन के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि हमारी संस्था की स्थापना 1925 में हुई थी. उस वक्त ब्रिटिश शासन था. उनके पास रजिस्ट्रेशन कराने का कोई सवाल ही नहीं था. आजादी के बाद भी हमारा संगठन काम करता रहा, संविधान लागू हुआ, तब भी ऐसा कोई नियम नहीं बना कि रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी ही है. हमसे किसी ने कहा भी नहीं कि आपको रजिस्ट्रेशन करना ही होगा. हां, जो लोग सरकार से लाभ प्राप्त करते हैं, उनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. चूंकि हम व्यक्तियों के समूह के रूप में काम करते हैं इसलिए हमें उन अुनदानों (गुरु दक्षिणा) पर टैक्स भी नहीं देना पड़ता है, जो हमें स्वयंसेवकों से प्राप्त होते हैं. बावजूद इसके हम अपने खर्चे का पूरा हिसाब रखते हैं. चार्टर्ड एकाउंट से अपना काम करवाते हैं और सबकुछ देश के नियमों के अनुसार ही चलता है. हम कोई भी काम नियमों के विरुद्ध नहीं करते. अगर सरकार यह कहेगी कि अपना हिसाब-किताब दिखाएं, तो हम दिखा सकते हैं. मोहन भागवत ने यह भी कहा कि उनपर सरकारों ने बैन लगाया है, न्यायालयों ने उन्हें व्यक्तियों का समूह माना है और संसद में भी उनकी चर्चा होती है, इसका अर्थ यह है कि उनकी पहचान है.
क्या आरएसएस की गुरुदक्षिणा पर टैक्स लगता है?
आरएसएस की आय का सबसे बड़ा स्रोत है गुरुदक्षिणा. संघ में गुरु दक्षिणा वह स्वैच्छिक आर्थिक योगदान है जो स्वयंसेवक हर वर्ष संगठन को देते हैं. संघ में किसी व्यक्ति को गुरु नहीं माना जाता. व्यक्ति के बजाय एक आदर्श और मूल्य-प्रतीक को गुरु माना जाना चाहिए. इसी सोच के साथ संघ के स्वयंसेवक हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भगवा ध्वज के सामने श्रद्धा व्यक्त करते हैं और अपनी इच्छा व सामर्थ्य के अनुसार धनराशि अर्पित करते हैं. इसी को गुरु दक्षिणा कहा जाता है. गुरुदक्षिणा पर टैक्स की बात सबसे पहले 1970 में उठी. जब संघ को स्वयंसेवकों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को आय मानते हुए उस पर कर लगाने की कोशिश हुई. उस वक्त संघ ने यह तर्क दिया कि गुरु दक्षिणा कोई व्यावसायिक आय नहीं है. यह उनके स्वयंसेवकों द्वारा स्वेच्छा से दिया गया योगदान है. इसकी कोई निश्चित राशि नहीं है. संगठन और उसके स्वयंसेवकों के बीच म्यूचुअलिटी” (Mutuality) का संबंध है, इसलिए इस धन को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता. संघ के नागपुर मुख्यालय से जुड़ा मामला पहले आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal – ITAT) की बंबई बेंच में गया. जहां 26 जुलाई 1980 को ITAT की बंबई बेंच ने माना कि स्वयंसेवकों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा पर म्यूचुअलिटी का सिद्धांत लागू हो सकता है. इसी वजह से संघ पर टैक्स नहीं लगता है. यह फैसला संघ के पक्ष में गया और बाद के मामलों में इसका हवाला दिया गया.
संघ के लिए व्यक्तियों का समूह (Body of Individuals) की अवधारणा लागू

आरएसएस के गुरुदक्षिणा को लेकर जब विवाद हुआ, तो इन विवादों के दौरान और बाद में आयकर अधिकारियों तथा न्यायालयों ने यह माना कि संघ व्यक्तियों का समूह है, जिसे Body of Individuals कहा गया है. संघ का नेतृत्व आज भी इसी का हवाला देता है. मोहन भागवत ने 2025 में कहा था कि आयकर विभाग और अदालतों ने संघ को body of individuals यानी व्यक्तियों का समूह माना है, इसलिए उस पर आयकर नहीं लगता. body of individuals का अर्थ है कुछ व्यक्ति मिलकर एक समूह के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि है कि वे कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत हों.
क्या है म्यूचुअलिटी का सिद्धांत ?
म्यूचुअलिटी का सिद्धांत (Principle of Mutuality) आयकर कानून का एक पुराना कानूनी सिद्धांत है,जिसके अनुसार यह माना जाता है कि कोई व्यक्ति या समूह खुद से लाभ नहीं कमा सकता. मसलन कुछ लोग मिलकर एक साझा कोष बनाते हैं और उस कोष का उपयोग अपने ही लोगों के हित में करते हैं तो उस व्यवस्था से होने वाली प्राप्ति को आमतौर पर आय नहीं माना जाता है और उसपर टैक्स नहीं लगता है. संघ को इसी व्यवस्था के तहत आयकर नहीं देना पड़ता है.
क्या संघ का रजिस्ट्रेशन नहीं कराना गैरकानूनी है?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था है. इसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराना क्या गैरकानूनी है? इस सवाल का जवाब देते हुए झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा बताते हैं कि देश के कानून के हिसाब से रजिस्ट्रेशन नहीं कराने से कोई संगठन गैरकानूनी नहीं होता है. हां, रजिस्ट्रेशन कराना तब जरूरी होता है, जब संगठन या संस्था को सरकार से लाभ लेना हो. सरकार उन्हीं संगठनों को लाभ देती है, जो रजिस्टर्ड हों. संघ ने अगर अबतक रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है, तो उनका संगठन गैरकानूनी हो जाता है,ऐसा नहीं है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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