RSS Registration Row : आरएसएस यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में है और इस बीच इस संगठन से एक विवाद जुड़ गया है. यह विवाद तब शुरू हुआ है, जब कांग्रेस के नेता प्रियांक खरगे ने यह सवाल उठाया कि भारत का सबसे बड़ा सोशियो-कल्चरल संगठन बिना रजिस्ट्रेशन के क्यों काम कर रहा है. उन्होंने संगठन की फंडिंग, उसके टैक्स कम्प्लायंस और ऑडिट की जरूरत का मुद्दा भी उठाया है. इस आलेख में समझते हैं कि आखिर 100 साल बाद भी आरएसएस ने खुद को रजिस्टर क्यों नहीं कराया और क्या इससे कानून का कोई उल्लंघन हो रहा है. Dear Shri Mohan Bhagwat ji,My letter will reach you shortly. However, I thought it was important to draw your attention to this matter early.——————————-Firstly, congratulations to the RSS on completing 100 years.An organisation that claims over 60,000 shakhas and crores of… pic.twitter.com/IZy4oeKdMp— Priyank Kharge / ಪ್ರಿಯಾಂಕ್ ಖರ್ಗೆ (@PriyankKharge) June 15, 2026 प्रियांक खरगे का पत्र और सोशल मीडिया पोस्ट क्या RSS का खुद को रजिस्टर्ड ना कराना, उसे गैरकानूनी बनाता है? आरएसएस का गठन 1925 में हुआ था, यानी यह आजादी से पहले का संगठन है. रजिस्ट्रेशन के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि हमारी संस्था की स्थापना 1925 में हुई थी. उस वक्त ब्रिटिश शासन था. उनके पास रजिस्ट्रेशन कराने का कोई सवाल ही नहीं था. आजादी के बाद भी हमारा संगठन काम करता रहा, संविधान लागू हुआ, तब भी ऐसा कोई नियम नहीं बना कि रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी ही है. हमसे किसी ने कहा भी नहीं कि आपको रजिस्ट्रेशन करना ही होगा. हां, जो लोग सरकार से लाभ प्राप्त करते हैं, उनके लिए रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. चूंकि हम व्यक्तियों के समूह के रूप में काम करते हैं इसलिए हमें उन अुनदानों (गुरु दक्षिणा) पर टैक्स भी नहीं देना पड़ता है, जो हमें स्वयंसेवकों से प्राप्त होते हैं. बावजूद इसके हम अपने खर्चे का पूरा हिसाब रखते हैं. चार्टर्ड एकाउंट से अपना काम करवाते हैं और सबकुछ देश के नियमों के अनुसार ही चलता है. हम कोई भी काम नियमों के विरुद्ध नहीं करते. अगर सरकार यह कहेगी कि अपना हिसाब-किताब दिखाएं, तो हम दिखा सकते हैं. मोहन भागवत ने यह भी कहा कि उनपर सरकारों ने बैन लगाया है, न्यायालयों ने उन्हें व्यक्तियों का समूह माना है और संसद में भी उनकी चर्चा होती है, इसका अर्थ यह है कि उनकी पहचान है. क्या आरएसएस की गुरुदक्षिणा पर टैक्स लगता है? आरएसएस की आय का सबसे बड़ा स्रोत है गुरुदक्षिणा. संघ में गुरु दक्षिणा वह स्वैच्छिक आर्थिक योगदान है जो स्वयंसेवक हर वर्ष संगठन को देते हैं. संघ में किसी व्यक्ति को गुरु नहीं माना जाता. व्यक्ति के बजाय एक आदर्श और मूल्य-प्रतीक को गुरु माना जाना चाहिए. इसी सोच के साथ संघ के स्वयंसेवक हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भगवा ध्वज के सामने श्रद्धा व्यक्त करते हैं और अपनी इच्छा व सामर्थ्य के अनुसार धनराशि अर्पित करते हैं. इसी को गुरु दक्षिणा कहा जाता है. गुरुदक्षिणा पर टैक्स की बात सबसे पहले 1970 में उठी. जब संघ को स्वयंसेवकों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को आय मानते हुए उस पर कर लगाने की कोशिश हुई. उस वक्त संघ ने यह तर्क दिया कि गुरु दक्षिणा कोई व्यावसायिक आय नहीं है. यह उनके स्वयंसेवकों द्वारा स्वेच्छा से दिया गया योगदान है. इसकी कोई निश्चित राशि नहीं है. संगठन और उसके स्वयंसेवकों के बीच म्यूचुअलिटी” (Mutuality) का संबंध है, इसलिए इस धन को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता. संघ के नागपुर मुख्यालय से जुड़ा मामला पहले आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (Income Tax Appellate Tribunal – ITAT) की बंबई बेंच में गया. जहां 26 जुलाई 1980 को ITAT की बंबई बेंच ने माना कि स्वयंसेवकों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा पर म्यूचुअलिटी का सिद्धांत लागू हो सकता है. इसी वजह से संघ पर टैक्स नहीं लगता है. यह फैसला संघ के पक्ष में गया और बाद के मामलों में इसका हवाला दिया गया. संघ के लिए व्यक्तियों का समूह (Body of Individuals) की अवधारणा लागू संघ के कार्यकर्ता आरएसएस के गुरुदक्षिणा को लेकर जब विवाद हुआ, तो इन विवादों के दौरान और बाद में आयकर अधिकारियों तथा न्यायालयों ने यह माना कि संघ व्यक्तियों का समूह है, जिसे Body of Individuals कहा गया है. संघ का नेतृत्व आज भी इसी का हवाला देता है. मोहन भागवत ने 2025 में कहा था कि आयकर विभाग और अदालतों ने संघ को body of individuals यानी व्यक्तियों का समूह माना है, इसलिए उस पर आयकर नहीं लगता. body of individuals का अर्थ है कुछ व्यक्ति मिलकर एक समूह के रूप में काम कर रहे हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि है कि वे कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत हों. क्या है म्यूचुअलिटी का सिद्धांत ? म्यूचुअलिटी का सिद्धांत (Principle of Mutuality) आयकर कानून का एक पुराना कानूनी सिद्धांत है,जिसके अनुसार यह माना जाता है कि कोई व्यक्ति या समूह खुद से लाभ नहीं कमा सकता. मसलन कुछ लोग मिलकर एक साझा कोष बनाते हैं और उस कोष का उपयोग अपने ही लोगों के हित में करते हैं तो उस व्यवस्था से होने वाली प्राप्ति को आमतौर पर आय नहीं माना जाता है और उसपर टैक्स नहीं लगता है. संघ को इसी व्यवस्था के तहत आयकर नहीं देना पड़ता है. क्या संघ का रजिस्ट्रेशन नहीं कराना गैरकानूनी है? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था है. इसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराना क्या गैरकानूनी है? इस सवाल का जवाब देते हुए झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा बताते हैं कि देश के कानून के हिसाब से रजिस्ट्रेशन नहीं कराने से कोई संगठन गैरकानूनी नहीं होता है. हां, रजिस्ट्रेशन कराना तब जरूरी होता है, जब संगठन या संस्था को सरकार से लाभ लेना हो. सरकार उन्हीं संगठनों को लाभ देती है, जो रजिस्टर्ड हों. संघ ने अगर अबतक रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है, तो उनका संगठन गैरकानूनी हो जाता है,ऐसा नहीं है. ये भी पढ़ें : शिवसेना(यूबीटी)की बैठक में नहीं पहुंचे 6 बागी सांसद, संजय राउत ने कहा-गद्दारों की सदस्यता समाप्त होगी संजय राउत का दावा-50-50 करोड़ में खरीदे जा रहे हैं सांसद, 15 करोड़ दिया एडवांस, बौखलाहट में मीडिया के सामने दी गाली