ज्वाला गुट्टा ने 30L Breast Milk डोनेट किया, झारखंड-बिहार के बच्चों के लिए रानी अस्पताल ही आसरा, नहीं है कोई सरकारी Milk Bank
ज्वाला गुट्टा
Breast Milk : सेलिब्रेटी जब कोई कदम उठाते हैं, तो उन्हें काॅपी करके आम आदमी भी खास बनना चाहता है. इस लिहाज से ज्वाला गुट्टा को फाॅलो करते हुए अगर कोई औरत अपने ब्रेस्ट मिल्क का दान करती है, तो वह आदर्श स्थिति होगी. हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि किसी भी नवजात बच्चे के लिए मां का दूध अमृत है. मां का दूध बच्चे को ना सिर्फ कई बीमारियों से बचाता है, बल्कि उसकी इम्युनिटी को बढ़ाकर उसे भविष्य के लिए तैयार करता है. देश में अबतक कुल 99-100 ही मिल्क बैंक हैं, इस वजह से वंचितों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है. बिहार-झारखंड जैसे राज्य में जहां 60% गर्भवती महिलाओं को एनीमिया है, मिल्क बैंक की सख्त जरूरत है, लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि मात्र एक मिल्क बैंक जो प्राइवेट अस्पताल में हैं, अभी वही कार्यरत है.
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Breast Milk : देश की बैडमिंटन स्टार ज्वाला गुट्टा दूसरी बार मां बनी हैं और उन्होंने पिछले दिनों एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह जानकारी दी, उन्होंने अपना ब्रेस्ट मिल्क डोनेट किया है. ज्वाला गुट्टा ने अस्पताल में रहते हुए करीब 30 लीटर दूध का दान किया. उनकी इस पहल के बाद ना सिर्फ मीडिया संस्थानों ने उनकी पहल और ब्रेस्ट मिल्क डोनेशन की चर्चा की, सोशल मीडिया में भी इस बात की तारीफ हुई. मां का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम आहार है, इस बात को अमूमन सभी लोग जानते हैं. लेकिन इस उत्तम आहार को कैसे नवजात बच्चे के लिए के सहज उपलब्ध बनाया जाए, इसे लेकर या तो समाज में जानकारी का अभाव है या फिर लोग उसके बारे में ज्यादा जागरूक नहीं हैं.
झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में जहां गर्भवती महिलाओं में एनीमिया गंभीर स्थिति तक पहुंचा रहता है, मां के दूध की कमी रहती है और कई बार तो एनीमिया की वजह से मां बहुत कमजोर हो जाती है और उसमें लैक्टेशन यानी स्तन में दूध का स्राव नहीं हो पाता है. इस स्थिति में बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में ब्रेस्ट मिल्क बैंक वरदान साबित हो सकता है, लेकिन अफसोस की बात है कि दोनों ही राज्य में कोई सरकारी मिल्क बैंक नहीं है. प्राइवेट बैंक की अगर बात करें, तो सिर्फ रांची के रानी अस्पताल में मिल्क बैंक की सुविधा उपलब्ध है.
ब्रेस्ट मिल्क (Breast Milk) की जरूरत क्यों?
जब एक मां स्वस्थ नहीं होती है और कुपोषण और एनीमिया की शिकार रहती है, तो ना सिर्फ उसे बच्चे को जन्म देने में परेशानी होती है बल्कि बच्चे के जन्म के बाद उसका पोषण भी मुश्किल हो जाता है. इस संबंध में डाॅ रूपाश्री बताती हैं कि मां का दूध किसी भी बच्चे के लिए बहुत जरूरी है. मां के दूध से ही बच्चे की इम्युनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. लेकिन हमारे राज्य में महिलाओं के स्वास्थ्य की जो स्थिति है, उसमें लैक्टेशन लाॅस की स्थिति बन जाती है. इस स्थिति को बदलने के लिए यह बहुत जरूरी है कि महिलाएं गर्भ ठहरने से पहले, गर्भावस्था के दौरान और डिलीवरी के बाद अपने खान-पान का ख्याल रखें.

डाॅ रूपाश्री बताती हैं कि कई बार बच्चे प्रीमैच्योर पैदा होते हैं, यह ज्यादातर वैसी महिलाओं में होता है जो स्वस्थ नहीं है. इन हालात में मां बच्चे को दूध नहीं पिला पाती है. तब मिल्क बैंक मदद कर सकते हैं, जहां बच्चों के लिए मां के स्तन का दूध निकालकर रखा जाता है. यह दूध उन बच्चों के लिए वरदान है और उनकी इम्युनिटी को भी बढ़ाता है. मिल्क बैंक में वैसी मांओं का दूध रखा जाता है, जिनके पास अपने बच्चे को पिलाने के बाद सरप्लस दूध होता है.
अफसोस की बात है कि अभी हमारे देश में इस बात को लेकर बहुत जागरूकता नहीं है, इस वजह से कई वंचित बच्चों को मदर मिल्क नहीं मिल पाता है. अगर डोनर सामने आएं तो कई जरूरतमंद बच्चों को इसका लाभ मिल सकता है. यहां एक बात गौर करने की है कि किसी भी मां के स्तन में उसके बच्चे की जरूरतों के हिसाब से दूध होता है, जैसे अगर कोई बच्चा 32 महीने में पैदा होता है, तो उसकी मां उसकी जरूरतों के अनुसार उसे दूध पिलाएगी. मिल्क बैंक में जो दूध होता है, वह एक खास बच्चे की जरूरतों के अनुसार नहीं होता है, लेकिन उसकी गुणवत्ता में कोई कमी नहीं होती है.
ब्रेस्ट मिल्क डोनेट करने के लिए मांओं को प्रेरित करने की जरूरत
जैसे रक्त दान महादान है, उसी तरह ब्रेस्ट मिल्क का दान भी देश के भविष्य नौनिहालों के सुंदर जीवन के लिए बहुत जरूरी होता है. अगर एक बच्चा बिना मां के दूध के बड़ा होता है, तो उसे कई तरह की बीमारियों का खतरा रहता है. उनकी इ्म्युनिटी कमजोर होती है. डाॅ रूपाश्री बताती हैं कि इसके लिए डाॅक्टर्स , सरकार और परिवार सबको सहयोग करना चाहिए, ताकि सरप्लस दूध को इकट्ठा कर जरूरतमंदों की मदद की जाए.
| दूध के मुख्य तत्व | औसत मात्रा (प्रति 100 ml दूध) | गुणकारी लाभ |
|---|---|---|
| ऊर्जा | 65–70 kcal | शिशु को ऊर्जा प्रदान करता है |
| प्रोटीन (Protein) | 1.0–1.5 g | मांसपेशी व अंग निर्माण |
| वसा (Fat) | 3.5–4.5 g | ऊर्जा का मुख्य स्रोत, मस्तिष्क विकास |
| कार्बोहाइड्रेट (Lactose) | 6.5–7.0 g | ऊर्जा + आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की वृद्धि |
| पानी | 87% | शिशु की हाइड्रेशन आवश्यकताओं को पूरा करता है |
| कैल्शियम (Ca) | 30–35 mg | हड्डी और दांतों का विकास |
| आयरन (Fe) | 0.2–0.3 mg | खून (हीमोग्लोबिन) बनाने में सहायक |
| जिंक (Zn) | 0.3 mg | रोग प्रतिरोधक क्षमता |
| विटामिन A | 60–70 µg | आंखों और त्वचा का स्वास्थ्य |
रानी अस्पताल रांची के डाॅक्टर विनय कुमार बताते हैं कि रानी अस्पताल में जो मिल्क बैंक है वह बिहार-झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में एकमात्र मिल्क बैंक है. इस तरह के मिल्क बैंक की सख्त जरूरत है, ताकि वैसे नवजात बच्चे जिन्हें मां का दूध नहीं मिल पा रहा है, उन्हें लाभ हो. डाॅक्टर विनय कहते हैं कि इसके लिए बड़े पैमाने पर अवेयरनेस कैंपेन चलाने की जरूरत है, क्योंकि मदर मिल्क को डोनेट करने की सोच अभी तक अपने देश में विकसित नहीं हो पाई है.
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मां में क्यों हो रही है लैक्टेशन फेल्योर की समस्या
लैक्टेशन फेल्योर वो स्थिति है, जब किसी नई मां के स्तन में बच्चे के जन्म के बाद दूध ना उतरे. इस स्थिति में यह भी होता है कि नई मां के स्तन में अगर दूध उतरता भी है, तो वह बच्चे के पोषण के लिए पर्याप्त नहीं होता है. डाॅ रूपाश्री बताती हैं कि एक औरत अगर एनेमिक है तो उसमें यह लैक्टेशन फेल्योर की समस्या सबसे अधिक होती है. गरीब परिवारों में यह समस्या नजर आती है. दूसरी वजह से जो आजकल दिख रही है और खासकर मिडिल क्लास में है कि मां और बच्चे का संपर्क कम हो रहा है.
एक कामकाजी मां अपने बच्चे के साथ ज्यादा समय नहीं गुजारती है, जिसकी वजह से दूध का सेक्रेशन कम हो जाता है और कभी-कभी तो लैक्टेशन फेल्योर भी हो जाता है. इसी वजह से डाॅक्टर्स नई मांओं को यह सलाह देते हैं कि चाहे दूध आए या ना आए, बच्चे के मुंह से निप्पल को पकड़ाइए. मां-बच्चे के इस संपर्क से स्तन में दूध उतरता है. अस्पतालों में कंगारू ट्रीटमेंट भी कराया जाता है,जिसमें बच्चे को मां के स्तन के संपर्क में रखा जाता है, ताकि दोनों का संपर्क हो. आजकल इस तरह के अभ्यास बंद हो रहे हैं. कई बार ऐसा होता है कि अगर मां को पर्याप्त दूध नहीं आ रहा है, तो उसके घर वाले बच्चे को ऊपर का दूध देने लगते हैं, यह सही नहीं है. ऊपर का दूध पिलाने से मां के स्तन में दूध की मात्रा नहीं बढ़ेगी, इसलिए मिक्स फीडिंग नहीं कराना चाहिए.
क्या रानी अस्पताल का मिल्क बैंक प्रदेश की जरूरतों के लिए पर्याप्त है?
झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ को मिला दें, तो यहां सिर्फ एक मिल्क बैंक है. झारखंड में सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत मिल्क बैंक खोलने की योजना बनाई है, लेकिन वह अभी पूरा नहीं हो पाया है. रानी अस्पताल के डाॅक्टर विनय कुमार बताते हैं कि हमारे पास अस्पताल में भर्ती बच्चों के लिए ही दूध पर्याप्त नहीं पाता है, इसलिए हम उसे बाहर के लोगों को उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं हैं. यहां 120-130 बच्चे हमेशा भर्ती रहते हैं. उनकी जरूरतों को पूरा कर पाना मुश्किल होता है. हालांकि क्षमता बढ़ाने की कोशिश है, लेकिन डोनर नहीं मिल पाते हैं. डोनेट करने के लिए जागरूक करने की सख्त जरूरत है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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