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खाद्य सुरक्षा की चुनौतियां

By ज्यां द्रेज
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ज्यां द्रेज, विजिटिंग प्रोफेसर, रांची विश्वविद्यालय

delhi@prabhatkhabar.in

अभी यह सोचना जरूरी है कि बरसात के दिनों में भुखमरी से बचाव के लिए क्या किया जाये क्योंकि ग्रामीण भारत में बरसात का समय गरीब परिवारों के लिए बड़ी कठिनाई का समय होता है. मॉनसून के अच्छा रहने की उम्मीद है, लेकिन खरीफ फसल की कटाई का वक्त अभी दूर है. ऐसे में लाखों लोगों के लिए दो जून की रोटी जुटा पाना मुश्किल होगा क्योंकि जो कुछ भी अनाज इन्होंने बचा कर रखा था, वह तालाबंदी के दौरान तकरीबन खत्म हो चला है. ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) मददगार हो सकता है, तब भी बहुत बड़ी तादाद को असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा.

अभी तक बड़ी आबादी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) ने भुखमरी से बचाया है. इसके पीछे बड़ी वजह रही शुरुआती तीन महीनों में दोगुना राशन मुहैया कराना, जिसे एक अप्रैल से शुरू किया गया. झारखंड के 46 प्रखंडों के स्थानीय पर्यवेक्षकों से बातचीत से हमें पता चला कि कुल 42 प्रखंडों में यह दोगुना राशन लोगों को मिल रहा है. अब इसे पूर्ण तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इससे बहुत फर्क पड़ता है. कयास लगाया जा सकता है कि अन्य जगहों पर भी ऐसा हो रहा है. सो, यह कहने के मजबूत आधार हैं कि दोगुना राशन जून के बाद भी कम से कम अगले तीन महीनों तक के लिए तो जरूर ही दिया जाये.

इसमें संसाधनों की भी कोई बाधा नहीं है. केंद्र सरकार के पास खाद्यान्न का विशाल भंडार है. लेकिन जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उनके लिए यह व्यवस्था मददगार साबित नहीं होगी. इनमें सिर्फ तथाकथित मध्यवर्ग के लोग ही नहीं, बल्कि कई गरीब परिवार भी शामिल हैं. गरीब परिवारों की पहचान कठिन काम है, लेकिन संकट की मौजूदा परिस्थिति में ऐसे परिवारों की पहचान कर पाना समय और संसाधन के सीमित होने के कारण और भी ज्यादा मुश्किल है.

एक व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि ग्रामीण इलाकों और शहरी झुग्गियों में जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें अस्थायी तौर पर कार्ड जारी किया जाये. फौरी जरूरत अपेक्षाकृत गरीब राज्यों (खासकर पूर्वी क्षेत्र के) को अतिरिक्त खाद्यान्न आवंटन की है ताकि वे अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार कर सकें, भले ही यह अस्थायी तौर पर हो. संकट के इस समय में गरीब राज्यों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन इन राज्यों की भावी दशा पर चिंतित होना लाजिमी है.

भारत के गरीब राज्यों में बड़ी आबादी बहुत कम संसाधनों से गुजर-बसर करने को मजबूर है. मिसाल के लिए, यह कह पाना मुश्किल है कि कोई ऐसा भी देश होगा, जहां भुखमरी और गरीबी की गहनता बिहार से भी ज्यादा होगी. व्यापक बेरोजगारी की दशा लंबे समय तक कायम रहती है, तो यह उन लाखों लोगों के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं होगा, जो आम वक्तों में दिहाड़ी कर किसी तरह अपना गुजर करते हैं.

दूसरी बात, निर्धनतम राज्य और वहां की कामगार आबादी पर मौजूदा आर्थिक संकट की मार सबसे ज्यादा पड़ेगी. जो राज्य अपेक्षाकृत बेहतर हैं, वहां स्थानीय कामगारों को आप्रवासी मजदूरों के चले जाने से फायदा मिल सकता है . लेकिन, गरीब राज्यों में इसका उलटा होगा- आप्रवासी मजदूरों के लौटने से श्रम की अधिकता हो जायेगी और स्थानीय कामगारों के लिए रोजगार के अवसर घट जायेंगे.

तीसरी बात, निर्धनतम राज्यों का अभी कोरोना संकट के गंभीर चपेट में आना बाकी है. संक्रमण अब पूर्वी इलाके की तरफ बढ़ रहा है. इन राज्यों में स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी भी न के बराबर है. बिहार में अगर संक्रमण महाराष्ट्र जैसा हो जाये, तो फिर क्या होगा? आखिरी बात यह कि निर्धनतम राज्यों में सरकार का खजाना खस्ताहाल है. झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव के मुताबिक राजस्व की वसूली अपने सामान्य स्तर के मुकाबले अभी बस 30 प्रतिशत है. धन की कमी इतनी ज्यादा है कि कुछ को वेतन भुगतान तक नहीं हो पा रहा.

नकदी का अभाव राहत उपायों के आड़े आ रहा है. इन वजहों से निर्धनतम राज्यों को अतिरिक्त खाद्यान्न समेत विशेष सहायता की जरूरत है. झारखंड के ग्रामीण इलाके में पीडीएस का बुनियादी कवरेज आबादी के 86 प्रतिशत तक है और इसे बढ़ाकर अगले छह महीने के लिए अगर 100 प्रतिशत किया जाता है, तो बस 1.2 लाख टन खाद्यान्न की जरूरत होगी, जो मौजूदा अनाज-भंडार का महज 0.2 प्रतिशत (जी हां, 1 प्रतिशत का पांचवां हिस्सा) है. यह हैरत की बात है कि केंद्र सरकार ने अतिरिक्त खाद्यान्न आवंटन के झारखंड सरकार के अनुरोध को ठुकरा दिया है.

देश के खाद्यान्न भंडार का अगले कुछ महीनों तक रचनात्मक इस्तेमाल हो, इसकी कई अपील और तर्कों को केंद्र सरकार ठुकरा चुकी है. लेकिन, समय हाथ से फिसलता जा रहा है. अगर समय रहते केंद्र सरकार को सदबुद्धि नहीं आती, तो फिर बरसात के दिनों में गरीबों के लिए दो जून की रोटी के लाले पड़ेंगे और देश का ठसाठस भरा हुआ अन्न भंडार यूं ही बेमतलब पड़ा रहेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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