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घातक है नशाखोरी

शराब मौत और बीमारी की ऐसी दूसरी सबसे बड़ी वजह है, जिसे रोका जा सकता है. भारत में इसको लेकर कोई राष्ट्रीय नीति भी नहीं है.

By संपादकीय
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घातक है नशाखोरी
घातक है नशाखोरी
एजेंसी

तमाम कोशिशों के बावजूद तंबाकू और शराब की लत चिंताजनक बनी हुई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (2019-21) के अनुसार, हमारे देश में 15 वर्ष से अधिक आयु के 38 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं. महिलाओं में यह आंकड़ा नौ प्रतिशत है. सर्वे में यह भी बताया गया है कि 15 से 49 साल की उम्र की केवल एक प्रतिशत महिलाएं ही शराब पीती हैं, जबकि इस आयु वर्ग में 19 प्रतिशत पुरुषों को इसकी लत है. इस संबंध में एक तथ्य यह भी है कि 2015 से पुरुषों में शराब का उपभोग सात प्रतिशत कम हुआ है. लेकिन इससे हमें संतोष नहीं करना चाहिए क्योंकि अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि इस कमी की एक वजह कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण शराब का उपलब्ध नहीं होना भी हो सकती है.

शराब पीने वाले पुरुषों में 15 फीसदी लगभग रोज, 43 फीसदी हफ्ते में लगभग एक बार तथा 42 फीसदी हफ्ते से अधिक अंतराल में पीते हैं. स्त्रियों में 17 प्रतिशत लगभग हर दिन तथा 37 प्रतिशत सप्ताह में लगभग एक बार शराब का उपभोग करती हैं. उल्लेखनीय है कि यह रिपोर्ट देश के 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जिलों में 6.37 लाख परिवारों के सर्वेक्षण पर आधारित है. दो सालों की इतनी बड़ी कवायद के बाद जो नतीजे हमारे सामने हैं, उन पर गंभीरता से अध्ययन कर नशाखोरी रोकने या सीमित करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनायी जानी चाहिए. हालांकि नशे की लत हर वर्ग में है, लेकिन यह पाया गया है कि अशिक्षित लोगों में तंबाकू का सेवन अपेक्षाकृत अधिक है.

स्कूल नहीं गये या पांच साल से कम पढ़ाई करनेवाले लगभग 58 फीसदी पुरुष तथा 15 फीसदी महिलाएं तंबाकू की लत की शिकार हैं. ग्रामीण भारत में तेजी से नशाखोरी बढ़ रही है और इससे सबसे अधिक प्रभावित वंचित सामुदाय हैं. पूर्वोत्तर, उत्तर और पूर्वी भारत के कई राज्यों में सेवन का स्तर बहुत अधिक है. पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में भी ऐसा है. शराब के उपभोग के मामले में भी कमोबेश यही हालत है. ये क्षेत्र देश के अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके हैं. तंबाकू सेवन से होनेवाली बीमारियों के कारण हमारे देश में हर साल कम से कम 13 लाख लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं.

मौत से पहले उन्हें बहुत लंबे समय तक तकलीफ से गुजरना पड़ता है और उपचार पर बहुत अधिक खर्च भी करना पड़ता है. तंबाकू उत्पादों के सेवन का असर केवल उस व्यक्ति पर ही नहीं पड़ता, जिसकी उसे लत है, बल्कि उसके आसपास के लोग भी नुकसान झेलते हैं. शराब मौत और बीमारी की ऐसी दूसरी सबसे बड़ी वजह है, जिसे रोका जा सकता है. भारत में इसको लेकर कोई राष्ट्रीय नीति भी नहीं है. यह स्पष्ट है कि रोकथाम के लिए सरकारों में साहस और इच्छाशक्ति का भी अभाव है. पर अब देरी करना या मुंह मोड़ना भविष्य के लिए घातक हो सकता है.

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