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बच्चों के पोषण को लेकर संजीदा हों

By आशुतोष चतुर्वेदी
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर

बच्चों के पोषण को लेकर संजीदा हों

आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधान संपादक

प्रभात खबर

हाल में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पहले चरण की रिपोर्ट जारी की. इसमें चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि विभिन्न राज्यों के बच्चों में कुपोषण फिर से पांव पसारने लगा है. यह सर्वेक्षण 2019-20 में किया गया था और इसमें 17 राज्य और पांच केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे. सर्वे में आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, अंडमान व निकोबार, दादरा-नगर हवेली व दमन दीव, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और लक्षद्वीप शामिल हैं. दूसरे चरण में यूपी, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्य हैं.

हालांकि दूसरे चरण का सर्वे कोरोना और लॉकडाउन की वजह से पूरा नहीं हो पाया है और इसकी रिपोर्ट मई, 2021 तक आने की उम्मीद है. सर्वेक्षण में जानकारियां छह लाख घरों में जाकर जनसंख्या, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और पोषण से जुड़े मानकों के बारे में जुटायी गयीं है. सर्वे के मुताबिक ज्यादातर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कम वजन वाले वयस्कों की संख्या 2015-16 के मुकाबले कम हुई है, लेकिन बच्चों के मामले में स्थिति बिल्कुल विपरीत है.

सर्वे के मुताबिक पिछले पांच सालों में ठिगने, कमजोर और कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ोत है. यह स्थिति बच्चों के स्वास्थ्य में एक दशक के सुधार के एकदम उलट है. दुनिया भर में बच्चों के पोषण को मापने के चार पैमाने होते हैं- शरीर की लंबाई का कम होना, लंबाई के हिसाब से वजन कम होना, सामान्य से कम वजन का होना और पोषक तत्वों की कमी होना. कुपोषण को उम्र के हिसाब से लंबाई कम होने का अहम कारण माना जाता है. कुपोषण दूर करने के लिए लगभग सभी प्रदेश सरकारें आंगनबाड़ी और स्कूलों में पोषण कार्यक्रम चला रही हैं.

बावजूद इसके, कुपोषित बच्चों की संख्या का बढ़ना चिंताजनक है, लेकिन सबसे अहम है कि देश में कुपोषण के प्रति लोगों का नजरिया बदलना बेहद जरूरी है. कुपोषण से आशय अक्सर बेहद कमजोर दिखने वाले बच्चों से लगाया जाता है, जबकि कमजोर होने के साथ-साथ बच्चों में मोटापा बढ़ना भी कुपोषण का ही एक रूप है. बीते कुछ वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों में अति कुपोषित बच्चों की संख्या में कमी आयी है, लेकिन अल्प-पोषित बच्चों को पोषित मान लेने की गलती आम होती जा रही है.

खाद्य सुरक्षा और खाने में विविधता कुपोषण दूर करने के लिए जरूरी है और ये दोनों ही बातें सीधे-सीधे व्यक्ति की आय से जुड़ी होती हैं. समुचित आय नहीं होगी, तो बच्चे और परिवार के अन्य सदस्यों को पोषण मिलना मुमकिन नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में खाद्यान्न की उपलब्धता और ईंधन तक लोगों की पहुंच आसान हुई है, लेकिन इसके बावजूद कुपोषण में वृद्धि सवाल खड़े करती है.

इसी तरह शहरों में बच्चों के मोटापे को तंदुरुस्त माने जाने की भूल भी चिंताजनक है. ऐसा आकलन है कि देश में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. सेव द चिल्ड्रेन दुनियाभर के बच्चों की स्थिति पर एक सूची जारी करता है, जहां बच्चे सबसे ज्यादा संकट में है. पिछले साल जारी सूची में भारत 116वें स्थान पर था.

यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा समेत आठ पैमानों के आधार पर तैयार किया जाता है. बड़ी संख्या में लोगों को पर्याप्त पोषण न मिलने के साथ-साथ मोटापा और गैर संक्रामक रोगों की बढ़ी हुई दर बड़ी चिंता का विषय है, खासकर गैर-संक्रामक रोगों के मामलों में. कोविड के दौरान डायबिटीज, तनाव और मोटापे ने हालात को और गंभीर बना दिया है.

आंकड़ों से पता चलता है कि कई राज्यों में मोटापा तेजी से बढ़ा है. संपन्न राज्यों में डायबिटीज के स्तर में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. सर्वे में पाया गया कि गोवा और केरल के व्यस्कों में हाई ब्लड शुगर सबसे ज्यादा है. साथ ही बड़े राज्यों में हर पांच में से एक वयस्क में उच्च रक्त चाप की समस्या पायी गयी, जो भविष्य में हृदय संबंधी रोगों को जन्म दे सकती है.

22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में औसतन लगभग एक चौथाई पुरुष आबादी उच्च रक्त चाप की समस्या का जूझ रही है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में संस्थागत प्रसव, महिला सशक्तीकरण, संपूरक आहार, प्रसव पूर्व जांच एवं टीकाकरण जैसे सूचकांकों में काफी सुधार हुआ है. सरकारी प्रयास बिहार के लोगों की लंबाई में कमी को रोकने में सहायक साबित हुए हैं.

सर्वे के अनुसार बिहार में 2015-16 में 26.4% महिलाओं के पास बैंक एकाउंट था, अब 76.7 प्रतिशत महिलाओं के बैंक खाते हैं.मोबाइल का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या भी 40.9 फीसदी से बढ़ कर 51.4 फीसदी हो गयी है., जो अच्छा संकेत है.

शहरी संपन्न वर्ग के बच्चों में मोटापा बढ़ने की एक बड़ी वजह दौड़-भाग के खेलों में कम हिस्सा लेना है. बाहरी खेलों में हिस्सा लेना उन्होंने पहले ही कम कर दिया था. कोरोना काल में तो यह एकदम बंद हो गया. नतीजतन शारीरिक श्रम के अभाव में संपन्न तबके के बच्चे मोटे होते जा रहे हैं. शायद आपने गौर नहीं किया कि बच्चों में बहुत परिवर्तन आ चुका है.

विदेशी पूंजी और टेक्नाेलॉजी ने वातावरण और संस्कृति पूरी तरह बदल दी है. एक और चिंताजनक बात है कि बच्चों से माता-पिता की संवादहीनता बढ़ी है. टेक्नोलॉजी ने संवादहीनता और बढ़ा दी है. मोबाइल और इंटरनेट ने उनका बचपन ही छीन लिया है. शारीरिक रूप से भले ही वे वयस्क नहीं होते, पर मानसिक रूप से वे वयस्क हो जाते हैं. उनकी बातचीत, आचार-व्यवहार में यह बात साफ झलकती है.

तकनीक में इतनी ताकत होती कि उसके प्रभाव से कोई भी मुक्त नहीं रह सकता है. दिक्कत यह है कि हम सब नयी परिस्थितियों से तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं, पर आप गौर करें कि बच्चों के सोने, पढ़ने के समय, हाव-भाव और खान-पान सब बदल चुके हैं. आप सुबह पढ़ते थे, बच्चा देर रात तक जगने का आदी है. आप छह दिन काम करने के आदी हैं, बच्चा सप्ताह में पांच दिन स्कूल का आदी है. जाहिर है, वह पांच दिन की नौकरी ही करेगा. उसका खान-पान बदल गया है.

उसका पसंदीदा भोजन मैगी, मोमो, बर्गर और पिज्जा है. यह व्हाट्सएप की पीढ़ी है, यह बात नहीं करती, मैसेज भेजती है. लड़के-लड़कियां दिन-रात आपस में चैट करते हैं. कोरोना ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा दिया है. बच्चे दिनभर घर में रहते हैं और मोबाइल व कंप्यूटर पर सारा समय गुजारते हैं. माना जाता था कि पीढ़ियां 20 साल में बदलती है, लेकिन तकनीक ने इस परिवर्तन को 10 साल कर दिया है.

अब नयी व्याख्या है कि पांच साल में पीढ़ी बदल जाती है. इसका मतलब यह कि पांच साल में दो पीढ़ियों में आमूलचूल परिवर्तन हो जाता है. आज जरूरत इन मुद्दों पर संजीदा होने की है.

posted by : sameer oraon

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