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तमिलनाडु में स्वायत्तता की मांग के मायने

क्या केंद्र सरकार द्रमुक के साथ कड़ा रुख अपनायेगी या जुलाई, 2022 के राष्ट्रपति चुनाव तक सामंजस्य बनाने की कोशिश करेगी?

By आर राजागोपालन
Updated Date
तमिलनाडु में स्वायत्तता की मांग के मायने
तमिलनाडु में स्वायत्तता की मांग के मायने
ANI

एमके स्टालिन ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में 125 दिन पूरे कर लिये हैं, पर अभी उन्हें अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करना है. क्या सत्तारूढ़ दल द्रमुक अब भी राज्य की पूर्ण स्वायत्तता की मांग करेगा या सहकारी संघवाद की नीति पर चलेगा? बीते तीन माह के शासन का संकेत यह है कि पार्टी केंद्र और मोदी सरकार के साथ टकराव के रास्ते पर चलेगी. मुख्यमंत्री ने अचानक कई जिलों में स्थानीय निकायों के चुनाव की घोषणा भी कर दी है.

द्रमुक को आशंका है कि विपक्षी अन्नाद्रमुक चुनौती बन सकता है, क्योंकि जयललिता की मृत्यु के बावजूद उसका जनाधार बरकरार है. विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच अंतर लगभग तीन लाख मतों का ही है और 234 सदस्यों के सदन में अन्नाद्रमुक खेमे के 77 विधायक हैं. केंद्र ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व अधिकारी आरएन रवि को तमिलनाडु का राज्यपाल बना कर सबको चौंका दिया है. नये राज्यपाल की घोषणा के साथ ही द्रमुक के सहयोगियों ने पूर्व खुफिया अधिकारी की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय की आलोचना शुरू कर दी. क्या द्रमुक ने उन्हें आरएन रवि की आलोचना करने के लिए कहा था?

द्रमुक के सत्ता संभालने के बाद राज्य के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग बढ़ने लगी है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा एक खुफिया अधिकारी को तमिलनाडु का राज्यपाल बनाने का कारण यह है कि तमिलनाडु और केरल के अतिवादी समूहों के बीच फोन से होनेवाली बातचीत के पकड़े जाने के बाद पाकिस्तानी आइएसआइ द्वारा प्रायोजित समूहों द्वारा कट्टरपंथी अतिवाद और हिंदू विरोधी भावनाएं भड़काने के मामले सामने आये हैं.

भाजपा के चार विधायकों की चुनावी जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की लोकप्रियता को इंगित करती है. संयोग से द्रमुक भी अपनी द्रविड़ विचारधारा को लेकर नरम हुआ है. एमके स्टालिन की पत्नी दुर्गा स्टालिन नियमित रूप से प्रयागराज, बनारस और नेपाल के मंदिरों की यात्रा करती हैं. द्रमुक ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि अयोध्या या द्वारका जानेवाले नागरिकों को 25 हजार रुपये दिये जायेंगे. यह बढ़ती हुई हिंदू भावना को दर्शाता है.

भाजपा ने एक पूर्व पुलिस अधिकारी के अन्नामलाई को राज्य इकाई का प्रमुख नियुक्त किया है. द्रमुक के विरुद्ध उनके बयान विपक्ष के लिए उत्साहजनक हैं. भाजपा की शिकायत है कि तमिलनाडु में मीडिया का रवैया एकतरफा है. इस कारण भाजपा और अन्नाद्रमुक के नेता टीवी चर्चाओं में हिस्सा नहीं लेते हैं. राज्य में हर पार्टी के पास अपना समाचार चैनल है. इसलिए मतदाता आरोप-प्रत्यारोपों से चिढ़े हुए रहते हैं.

इसमें संदेह है कि द्रमुक 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगी. द्रमुक को समझ में आ गया है कि उत्तर भारत में कांग्रेस हाशिये पर जा रही है और उसकी जगह आम आदमी पार्टी ले रही है. कांग्रेस के कमजोर होने के बारे में शरद पवार के बयान के बाद कांग्रेस के साथ द्रमुक का रवैया सावधानीपूर्ण होगा.

दक्षिण भारतीय राज्यों में विभिन्न पार्टियों का वर्चस्व कांग्रेसमुक्त दक्षिण भारत की तस्वीर पेश करता है, जो भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनौती है. स्टालिन भी तमिलनाडु में हिंदुत्व की बढ़ती भावना पर चुप हैं. भाजपा आगामी वर्षों में द्रविड़ राजनीति को पीछे धकेलने की कोशिश में है, जैसे उसने त्रिपुरा में सीपीएम के साथ किया था. द्रमुक खुद अपने जाल में उलझ गया है.

उसने बड़े-बड़े चुनावी वादे किये थे, जो अब कागजों पर ही हैं. पार्टी ब्राह्मणों को उकसा रही है, मंदिरों के कोष के साथ छेड़छाड़ की जा रही है. हिंदू चरमपंथी समूह और भाजपा इसके विरोध में हैं. किसी भी जाति के पुजारियों की नियुक्ति के सरकार के आदेश का भी ब्राह्मण विरोध कर रहे हैं. द्रमुक ने नीट की परीक्षा खत्म करने जैसे असंभव वादे किये हैं. कॉलेज के छात्र एमके स्टालिन का भरोसा करते हैं. दिलचस्प है कि सत्ता संभालते ही स्टालिन और उनकी पार्टी ने केंद्र सरकार को कोसना शुरू कर दिया.

द्रमुक का इरादा अन्नाद्रमुक को विभाजित करने का है. पूर्व मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोपों, मुकदमों, छापों आदि में फंसाया जा रहा है. ऊटी में पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के आवास पर हुई हत्याओं के मामले फिर से खोले जा रहे हैं. इस मामले से निकलना अन्नाद्रमुक के लिए आसान नहीं होगा. ई पालानीस्वामी की पकड़ से ओ पनीरसेल्वम को निकाल कर स्टालिन मतदाताओं में उनके प्रति अविश्वास पैदा कर रहे हैं.

राज्यपाल निवास में मुख्यमंत्री का अन्नाद्रमुक के नेता पनीरसेल्वम के साथ भोजन करना राज्य की राजनीति में अभूतपूर्व घटना है. पूर्व स्वास्थ्य मंत्री विजयभास्कर को बहुदलीय कोविड पैनल में शामिल करना भी चतुर रणनीति है. तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है. द्रमुक ने पहले जीएसटी में हिस्सेदारी को लेकर केंद्र को उकसाया. वित्त मंत्री पलानीवेल राजन वाम विचारधारा के साथ अमेरिकी कार्य संस्कृति से प्रभावित हैं. जून में जीएसटी की पहली बैठक में राजन ने केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर सवाल उठा दिया. बाद में स्टालिन ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की, लेकिन वह भी सद्भावपूर्ण नहीं थी.

द्रमुक इस तनातनी को 2024 के चुनाव तक जारी रखना चाहता है, लेकिन राज्य के लाभार्थियों को केंद्रीय योजनाओं का लाभ सीधे खाते में मिल रहा है. इसमें राज्य सरकार की न्यूनतम भूमिका है. द्रमुक के लिए यह भी एक झटका है. वित्तीय समस्याओं के समाधान की कोशिश में सरकार को देशी शराब को अनुमति देनी पड़ी है, लेकिन वह स्थानीय स्तर पर वित्तीय समर्थन नहीं जुटा पा रही है. सरकार किसानों या गरीब मतदाताओं पर करों का बोझ नहीं लादना चाहती है. वह दुविधा में फंसी हुई है.

द्रमुक की पारिवारिक राजनीति मुलायम सिंह, अखिलेश यादव, लालू यादव, तेजस्वी यादव आदि की तरह है. स्टालिन का अपने भाई एमके अलागिरी से लंबे समय तक आंतरिक झगड़ा रहा है. अलागिरी को पूरी तरह किनारे कर दिया गया है, पर वे अपने बेटे को आगे बढ़ाना चाहते हैं. इस झगड़े का नतीजा राजनीतिक नाटक के रूप में होगा, जैसे बिहार में होता है. द्रमुक स्टालिन के बेटे उदयनिधि को आगे लाना चाहता है.

लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. बहरहाल, स्थिति की चाहे जैसे व्याख्या की जाए, तमिलनाडु स्वायत्तता की मांग कर रहा है. क्या केंद्र सरकार द्रमुक के साथ कड़ा रुख अपनायेगी या जुलाई, 2022 के राष्ट्रपति चुनाव तक सामंजस्य बनाने की कोशिश करेगी? द्रमुक के पास दस राज्यसभा और 23 लोकसभा सांसद हैं. उसकी बड़ी मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भी तमिलनाडु में बढ़ रही है, जो 2024 में सीटें जिता सकती है.

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