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डेसमंड टूटू हमारे लिए बहुत सारे सपने छोड़ गये हैं

Updated at : 28 Dec 2021 10:46 AM (IST)
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डेसमंड टूटू हमारे लिए बहुत सारे सपने छोड़ गये हैं

आज के इस बौने दौर में डेसमंड टूटू जैसे किसी आदमकद का जाना वैसे ही सालता है जैसे तेज आंधी में उस आखिरी वृक्ष का उखड़ जाना जिससे अपनी झोंपड़ी पर साया हुआ करता था.

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आज के इस बौने दौर में डेसमंड टूटू जैसे किसी आदमकद का जाना वैसे ही सालता है जैसे तेज आंधी में उस आखिरी वृक्ष का उखड़ जाना जिससे अपनी झोंपड़ी पर साया हुआ करता था. जब तेज धूप में अट्टहास करती प्रेत छायाओं की चीख-पुकार सर्वत्र गूंजती हो, तब वे सभी खास अपने लगने लगते हैं, जो मनुष्यता का मंदिर गढ़ने में लगे थे, लगे रहे और मंदिर गढ़ते-गढ़ते ही विदा हो गये.

यह वह मंदिर है जो मन-मंदिर में अवस्थित होता है, और एक बार पैठ गया, तो फिर आपको चैन नहीं लेने देता है. गांधी ने अपने हिंद-स्वराज्य में लिखा ही है, ‘एक बार इस सत्य की प्रतीति हो जाए, तो इसे दूसरों तक पहुंचाए बिना हम रह ही कैसे सकते हैं!’

डेसमंड टूटू एंग्लिकन ईसाई पादरी थे, लेकिन ईसाइयों की तमाम दुनिया में उन जैसा पादरी गिनती का भी नहीं है. डेसमंड टूटू अश्वेत थे, पर उन जैसा शुभ्र व्यक्तित्व खोजे भी न मिलेगा. वे शांतिवादी थे, लेकिन उन जैसा योद्धा उंगलियों पर गिना जा सकता है. वे थे तो दक्षिण अफ्रीका के,

लेकिन हमें बेहद अपने लगते थे क्योंकि गांधी के भारत और भारत के गांधी से उनका गर्भनाल वैसे ही जुड़ा था, जैसे उनके समकालीन साथी व सिपाही नेल्सन मंडेला का. इस गांधी का यह कमाल ही है कि उसके अपने रक्त-परिवार का हमें पता हो कि न हो, उसका तत्व-परिवार सारे संसार में इस कदर फैला है कि वह हमेशा जीवंत चर्चा के बीच जिंदा रहता है. डेसमंड टूटू संसार भर में फैले इसी गांधी परिवार के अनमोल सदस्यों में एक थे.

श्वेत आधिपत्य से छुटकारा पाने की दक्षिण अफ्रीका की लंबी खूनी लड़ाई के अधिकांश सिपाही या तो मौत के घाट उतार दिये गये या देश-बदर कर दिये गये या जेलों में सदा के लिए दफन कर दिये गये. डेसमंड टूटू इन सभी के साक्षी भी रहे और सहभागी भी. फिर भी वे इन सबसे बच सके, तो शायद इसलिए कि उन पर चर्च का साया था.

वर्ष 1960 में वे पादरी बने और 1985 में जोहानिसबर्ग के बिशप. अगले ही वर्ष वे केप टाउन के पहले अश्वेत आर्चबिशप बने. दबा-ढका यह विवाद तो चल ही रहा था कि डेसमंड टूटू समाज व राजनीति के संदर्भ में जो कर व कह रहे हैं, क्या वह चर्च की मान्य भूमिका से मेल खाता है? सत्ता व धर्म का जैसा गठबंधन आज है,

उसमें ऐसे सवाल केवल सवाल नहीं रह जाते हैं, बल्कि छिपी हुई धमकी में बदल जाते हैं. डेसमंड टूटू ऐसे सवाल सुन रहे थे और उस धमकी को पहचान रहे थे. इसलिए आर्चबिशप ने अपनी भूमिका स्पष्ट कर दी- ‘मैं जो कर रहा हूं और जो कह रहा हूं वह आर्चबिशप की शुद्ध धार्मिक भूमिका है. धर्म यदि अन्याय व दमन के खिलाफ नहीं बोलेगा, तो धर्म ही नहीं रह जायेगा.’ वेटिकन के लिए भी आर्चबिशप की इस भूमिका में हस्तक्षेप करना मुश्किल हो गया.

रंगभेदी शासन के तमाम जुल्मों की उन्होंने मुखालफत की. वे चर्च से जुड़े संभवत: पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका की चुनी हुई श्वेत सरकार की तुलना जर्मनी के नाजियों से की और संसार की तमाम श्वेत सरकारों को लज्जित कर, लाचार किया कि वे दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार पर आर्थिक प्रतिबंध कड़ा भी करें और सच्चा भी करें. सत्ता जानती थी कि उनकी बातों को काटना, उन्हें झुकाना संभव नहीं है. डेसमंड टूटू में नैतिक साहस था. वे श्वेत सरकार के छद्म का पर्दाफाश करने में लगे रहे.

नेल्सन मंडेला ने जब दक्षिण अफ्रीका की बागडोर संभाली, तो रंगभेद की मानसिकता बदलने का वह अद्भुत प्रयोग किया जिसमें पराजित श्वेत राष्ट्रपति दि’क्लार्क उनके उप-राष्ट्रपति बनकर साथ आये. फिर ‘ट्रूथ एंड रिकॉन्सिलिएशन कमिटी’ का गठन किया गया, जिसके पीछे मूल भावना थी कि अत्याचार व अनाचार श्वेत-अश्वेत नहीं होता है. सभी अपनी गलतियों को पहचानें, कबूल करें,

दंड भुगतें और साथ चलने का रास्ता खोजें. सामाजिक जीवन का यह अपूर्व प्रयोग था. अश्वेत-श्वेत मंडेला-क्लार्क की जोड़ी ने डेसमंड टूटू को इस अनोखे प्रयोग का अध्यक्ष मनोनीत किया. दोनों ने पहचाना कि देश में उनके अलावा कोई नहीं है कि जो उद्विग्नता से ऊपर उठकर, समत्व की भूमिका से हर मामले पर विचार कर सके. सत्य के प्रयोग हमेशा ही दोधारी तलवार होते हैं.

ऐसा ही इस कमिशन के साथ भी हुआ. सत्य के निशाने पर मंडेला की सत्ता भी आयी. अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की आलोचना भी डेसमंड टूटू ने उसी साहस व बेबाकी से की जो हमेशा उनकी पहचान रही थी. सत्ता व सत्य का नाता कितना सतही होता है, यह आजादी के बाद गांधी के संदर्भ में हमने देखा ही था, अब डेसमंड टूटू ने भी वही किया. लेकिन कमाल यह हुआ कि टूटू इस अनुभव के बाद न कटु हुए, न निराश. खिलखिलाहट के साथ अपनी बात कहते रहे.

अपने परम मित्र दलाई लामा के दक्षिण अफ्रीका आने के सवाल पर सत्ता से उनकी तनातनी बहुत तीखी हुई. सत्ता नहीं चाहती थी कि दलाई लामा वहां आएं, टूटू किसी भी हाल में ‘संसार के लिए आशा के इस सितारे’ काे अपने देश में लाना चाहते थे.

आखिरी सामना राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख के दफ्तर में हुआ जिसने बड़ी हिकारत से उनसे कहा, ‘मुंह बंद करो और अपने घर बैठो.’ डेसमंड टूटू ने शांत मन से, संयत स्वर में कहा, ‘लेकिन मैं तुमको बता दूं कि वे बनावटी क्राइस्ट नहीं हैं.’ डेसमंड टूटू ने अंतिम सांस तक न संयम छोड़ा, न सत्य. गांधी की तरह वे भी यह कह गये कि यह मेरे सपनों का दक्षिण अफ्रीका नहीं है. भले डेसमंड टूटू का सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन वे हमारे लिए बहुत सारे सपने छोड़ गये हैं जिन्हें पूरा कर हम उन्हें भी और खुद काे भी परिपूर्ण बना सकते हैं.

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कुमार प्रशांत

लेखक के बारे में

By कुमार प्रशांत

कुमार प्रशांत is a contributor at Prabhat Khabar.

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