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  • Jul 12 2019 2:56PM
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Jharkhand : जनजातीय विश्वविद्यालय पर क्या है आदिवासी समुदाय के विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय

Jharkhand : जनजातीय विश्वविद्यालय पर क्या है आदिवासी समुदाय के विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय

रांची : झारखंड में जनजातीय विश्वविद्यालय (Tribal University) खुलने की खबर से जनजातीय भाषाओं (Tribal Languages) के विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ताओं (Social Activists) की राय बंटी हुई है. कुछ लोग इससे खुश हैं, तो कुछ को लगता है कि आदिवासी समुदाय (Tribal Community) को इसका कोई विशेष लाभ नहीं मिलने वाला है. हालांकि, विश्वविद्यालय की शाखा खुलने का सबने स्वागत किया. prabhatkhabar.com ने जनजातीय भाषाओं के विद्वानों और आदिवासी समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात की. आप भी पढ़ें, जनजातीय विश्वविद्यालय के बारे में वे क्या सोचते हैं.

सिर्फ आदिवासी समाज के लिए नहीं है विश्वविद्यालय : प्रो करमा उरांव

रांची विश्वविद्यालय (Ranchi University) के सीनियर प्रोफेसर करमा उरांव झारखंड (Jharkhand) में जनजातीय विश्वविद्यालय (Tribal University) की शाखा खुलने से खुश तो हैं, लेकिन बहुत उत्साहित नहीं हैं. उनका कहना है कि लंबे अरसे से इसकी पहल हो रही थी. अब जाकर सफलता मिली है. उन्होंने कहा कि अच्छी बात है कि झारखंड (Jharkhand) में जनजातीय विश्वविद्यालय (Tribal University) की शाखा खुलने जा रही है. लेकिन, इससे आदिवासियों (Tribals) का भला होगा, ऐसा कहना उचित नहीं है. यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central University) है. उसी के अनुरूप शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति होगी. सेंट्रल यूनिवर्सिटी (Central University) की तर्ज पर ही बच्चों के एडमिशन भी होंगे. ऐसा नहीं है कि जनजातीय विश्वविद्यालय (Tribal University) में सिर्फ जनजातीय समुदाय (Tribal Community) के बच्चे ही पढ़ेंगे या उसी समुदाय के शिक्षकों और अन्य विभागों में कर्मचारियों की नियुक्ति होगी.

प्रो करमा उरांव ने कहा कि यह लोगों की भावनाओं से जुड़ा मामला हो सकता है. इससे ज्यादा कुछ नहीं. श्री उरांव कहते हैं कि मध्यप्रदेश के अमरकंटक में स्थित इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी (Indira Gandhi National Tribal University) का उन्होंने कई बार दौरा किया है. वहां की व्यवस्था से भी वह अवगत हैं. विश्वविद्यालय में सभी भाषाओं की पढ़ाई होती है. सभी समुदाय के लोग उसमें पढ़ते हैं. ऐसा भी नहीं है कि आदिवासियों के लिए 50 फीसदी या उससे ज्यादा सीटें आरक्षित हों. केंद्र सरकार के नियम के मुताबिक ही आदिवासी बच्चों को इस विश्वविद्यालय में आरक्षण (Reservation) मिलेगा. हां, प्रबंधन में किसी आदिवासी को रख लिया जायेगा, जैसे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक (Indira Gandhi National Tribal University, Amarkantak) में दिवाकर मिंज को रखा गया है.

प्रो उरांव कहते हैं कि विश्वविद्यालय की शाखा खुलने का एक लाभ होगा कि जब भी वहां कोई कार्यक्रम होगा, उसमें आदिवासी कला और संस्कृति की झलक दिखेगी. इससे ज्यादा और कुछ नहीं होने वाला. उन्होंने कहा कि अमरकंटक में विश्वविद्यालय में भी भगवान बिरसा मुंडा की आदमकद प्रतिमा लगी हुई है. वहां भी कार्यक्रमों में ही आदिवासियत की झलक दिखती है.

 

शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा, अंधविश्वास दूर होगा : शकुंतला मिश्रा



नागपुरी साहित्यकार शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय की शाखा खुलने से बेहद उत्साहित हैं. वह कहती हैं कि इससे आदिवासी समुदाय में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा. लोग शिक्षित होंगे, तो उनमें प्रचलित अंधविश्वास दूर होंगे. शिक्षा के प्रसार से पलायन रुकेगा.

शकुंतला मिश्रा ने कहा कि आदिवासी समुदाय के लोगों ने मजदूरी को अपने रोजगार की नियति मान ली है. शिक्षित होंगे, तो उनकी सोच बदलेगी. उनका मनोबल बढ़ेगा. जनजातीय विश्वविद्यालय से उनकी आत्मीयता बढ़ेगी, अपनापन बढ़ेगा. शिक्षा के प्रति उनका अनुराग बढ़ेगा.

शकुंतला मिश्रा यह भी कहती हैं कि विश्वविद्यालय में एमए तक की पढ़ाई होनी चाहिए. जनजातीय भाषाओं पर शोध होने चाहिए. यदि ऐसा नहीं होता है, तो विश्वविद्यालय खोलने का कोई लाभ नहीं होगा. नागपुरी भाषा की जानकार श्रीमती मिश्रा कहती हैं कि झारखंड में मातृभाषा में लोगों को शिक्षा मिलेगी, तो उनके सोचने का नजरिया बदलेगा. इसलिए जरूरी है कि उनकी भाषा में पहली कक्षा से एमए तक की पढ़ाई की व्यवस्था की जाये.

शकुंलता मिश्रा कहती हैं कि झारखंड में पांच जनजातियां (संथाली, उरांव, खड़िया, मुंडारी और हो) बसती हैं. उनके लिए पहली कक्षा से एमए तक की शिक्षा की व्यवस्था हो, तभी इस विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य हासिल हो सकेगा. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय खुलने से रोजगार की सारी समस्याएं तो दूर नहीं होंगी, लेकिन इस दिशा में यह मील का पत्थर साबित हो सकता है.

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय खुल रहा है, तो हर जिले में जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई के लिए कॉलेज भी खुलने चाहिए. जनजातीय भाषाओं के प्रशिक्षित शिक्षक नहीं होने की वजह से उच्च शिक्षा में समस्याएं हैं. इसलिए जरूरी है कि जनजातीय विश्वविद्यालय में बीएड की भी पढ़ाई हो.

झारखंड को देश का आशीर्वाद मिला, संवैधानिक अधिकार मिला : रतन तिर्की


झारखंड में इंदिरा गांधी ट्राइबल यूनिवर्सिटी की शाखा खुलने से ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल (TAC) के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता रतन तिर्की बेहद उत्साहित हैं. उन्होंने कहा कि 6-7 साल से यह प्रयास चल रहा था, जो अब जाकर रंग लाया है. संविधान की पांचवीं अनुसूची के अनुरूप झारखंड के लोगों के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है. उन्होंने कहा कि झारखंड के कई संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसकी पहल की. जनजातीय विश्वविद्यालय की कई शाखाएं भी झारखंड में खुलेंगी. इसका लाभ झारखंड को मिलेगा. इस अभियान को सफल बनाने की जरूरत है. हालांकि, उन्होंने कहा कि अभी यह देखना होगा कि विश्वविद्यालय में शिक्षक कौन होंगे, शोधार्थी कौन होंगे.

श्री तिर्की ने कहा कि विश्वविद्यालय में आदिवासी और गैर-आदिवासी का भेद नहीं होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सबके साझा प्रयास से यह सफलता मिली है. साथ ही श्री तिर्की ने कहा कि विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं का अध्ययन होना चाहिए. ‘अभी केंद्रशासित प्रदेश मिला है, राज्य लेना बाकी है.’ श्री तिर्की ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि जनजातीय विश्वविद्यालय झारखंड को मिलेगा और वह मिला.

विश्वविद्यालय में आदिवासियत झलकनी चाहिए : वंदना टेटे


खड़िया भाषा की विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता वंदना टेटे जनजातीय विश्वविद्यालय खुलने की खबर से उत्साहित तो हैं, लेकिन उनके मन में कई आशंकाएं भी हैं. उनका कहना है कि विश्वविद्यालय में आदिवासियत झलकनी चाहिए. फैकल्टी मेंबर्स की बात हो या प्रबंधन की, उनमें आदिवासी होने चाहिए. इतना ही नहीं, शिक्षा, कला और संस्कृति में भी आदिवासियत की छाप होगी, तभी विश्वविद्यालय की शाखा का खुलना सार्थक हो पायेगा. वंदना टेटे कहती हैं कि विश्वविद्यालय में आदिवासी समाज अपनी चीजों को देखना चाहेगा. यदि शिक्षा पद्धति उनके अनुरूप नहीं होगी, तो इसका लाभ भी उन्हें नहीं मिल पायेगा.

वह कहती हैं कि विश्वविद्यालय के खुलने से कुछ लोगों को रोजगार तो मिल जायेगा, बच्चों को दाखिला भी मिल जायेगा. लेकिन, यदि यहां आदिवासियों का इतिहास नहीं पढ़ाया जायेगा, उनकी कला-संस्कृति के बारे में नहीं बताया जायेगा, तो जनजातीय विश्वविद्यालय खोलने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा.

आदिवासी ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ायेगा जनजातीय विश्वविद्यालय : अनुज लुगून



राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित झारखंड के युवा रचनाकार अनुज लुगून ने कहा कि प्रदेश में जनजातीय विश्वविद्यालय की शाखा की स्थापना स्वागत योग्य कदम है. उन्होंने कहा कि संस्थान को आदिवासी भाषा, दर्शन, इतिहास और ज्ञान परंपरा की शुरुआत का केंद्र बनाना चाहिए. ऐसा होता है, तो यह संस्थान आदिवासी ज्ञान परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित करेगा. उन्होंने कहा कि जनजातीय समूहों के लिए मध्यप्रदेश के अमरकंटक में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी थी. इससे आदिवासी ज्ञान परंपरा की शुरुआत हुई. झारखंड में भी ऐसा होगा, इसकी उम्मीद की जानी चाहिए.

श्री लुगून ने कहा कि विश्वविद्यालय या शिक्षण संस्थान खुलते ही रहते हैं. उन संस्थानों का ढांचा क्या होता है, यह मायने रखता है. सिर्फ आदिवासी के नाम पर विश्वविद्यालय का नामकरण कर देने से कुछ हासिल नहीं होगा. संस्थान की गवर्निंग बॉडी में आदिवासी होने चाहिए, उसके पाठ्यक्रम में आदिवासी दर्शन, इतिहास, भाषा और ज्ञान परंपरा को समाहित करना होगा. तभी इस विश्वविद्यालय की सार्थकता साबित होगी.

उन्होंने कहा कि जनजातीय विश्वविद्यालय की शाखा का झारखंड में खुलना ज्ञान की नयी शाखा की शुरुआत है. कहा कि आदिवासी समाज अपनी ज्ञान परंपरा से अनभिज्ञ है. विश्वविद्यालय के खुलने से वे अपनी परंपरा से जुड़ सकेंगे. अन्य लोगों को भी आदिवासियों की ज्ञान परंपरा के बारे में जानकारी मिलेगी, क्योंकि ज्ञान किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं है. किसी भी जाति या समुदाय के बारे में जानकारी देना ही ज्ञान का उद्देश्य है और सबके बारे में सबको जानकारी मिले, यही शिक्षा का उद्देश्य है.

आदिवासी बहुल क्षेत्रों की समस्या का होगा समाधान : वासवी किड़ो

सामाजिक कार्यकर्ता वासवी किड़ो ने स्पष्ट किया कि झारखंड में अमरकंटक स्थित जनजातीय विश्वविद्यालय की शाखा नहीं, क्षेत्रीय कार्यालय खुलने जा रहा है. उन्होंने बताया कि कई साल से यह प्रयास चल रहा था. उन्होंने कहा कि पार्लियामेंट एक्ट के तहत आदिवासी बहुल राज्यों ओड़िशा, झारखंड और मध्यप्रदेश में आदिवासी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोले जाने की बात कही गयी है. इसी के तहत विश्वविद्यालय का एक कैंपस झारखंड में भी खुलने जा रहा है.


उन्होंने कहा कि झारखंड के सामाजिक संगठन वर्षों से इस अभियान में लगे थे. नरेंद्र मोदी की सरकार आने से पहले केंद्र सरकार से बात हुई थी. उन्होंने कहा था कि विश्वविद्यालय के लिए राज्य सरकार को जमीन देनी है. उन्होंने कहा कि रघुवर दास की सरकार ने साढ़े चार साल तक कुछ नहीं किया. अब जाकर उन्होंने यह प्रयास किया है और विश्वविद्यालय का कैंपस प्रदेश में खुलने जा रहा है. यह अच्छी बात है.

वासवी किड़ो ने विश्वविद्यालय में ट्राइबल वीमेन सेंटर खोलने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि ट्राइबल यूनिवर्सिटी को आदिवासी भाषाओं का केंद्र बनाना चाहिए. उन्होंने इस विश्वविद्यालय का नामकरण मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नाम पर करने की भी मांग की.

प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त किये बगैर विश्वविद्यालय की स्थापना बेमानी : ग्लैडसन डुंगडुंग

सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने झारखंड में नये शिक्षण संस्थान के खुलने का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि इसके साथ ही बहुत से सवाल भी हैं. श्री डुंगडुंग ने कहा कि झारखंड में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था बदहाल है. जब नींव ही कमजोर होगी, तो इमारत बुलंद कैसे हो सकती है. उन्होंने कहा कि प्राइमरी स्कूलों में बेहतर शिक्षक ही नहीं हैं, तो बेहतर शिक्षा कहां से मिलेगी. जब प्राथमिक शिक्षा ही बदहाल होगी, तो उच्च शिक्षा गुणवत्तापूर्ण कैसे हो सकती है. इसलिए सरकार को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए.


श्री डुंगडुंग ने कहा कि झारखंड में कई विश्वविद्यालय हैं. उनमें आदिवासी भाषाओं के विभाग हैं, लेकिन वहां पढ़ाई नहीं होती, क्योंकि शिक्षकों का घोर अभाव है. जनजातीय भाषाओं के जो प्राइमरी स्कूल हैं, वहां शिक्षक ही नहीं हैं, तो बच्चों की पढ़ाई कैसी होती होगी, यह आप सोच सकते हैं. आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं करने की नीति की डुंगडुंग ने कड़ी आलोचना की. कहा कि आठवीं तक सभी बच्चों को पास कर दिया जाता है और नौवीं में भारी संख्या में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं. ऐसे बच्चे महानगरों में घरेलू नौकर का काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को खत्म करना होगा. जब तक सरकार प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं सुधारती, उच्च शिक्षण संस्थान खुलने का कोई भी लाभ आदिवासी समाज को नहीं मिल सकता. श्री डुंगडुंग ने कहा कि शिक्षा ही वो माध्यम है, जिसके जरिये समाज में बदलाव लाया जा सकता है. शिक्षा से लोगों की सोच का दायरा बढ़ेगा. वे अपने और समाज के विकास के बारे में सोच सकेंगे. इसके लिए बेसिक्स को ठीक करने की जरूरत है.

ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि जनजातीय विश्वविद्यालय से आदिवासी समुदाय को तभी फायदा होगा, जब वहां आदिवासी फिलॉसफी की पढ़ाई होगी. आज तक आदिवासियों की नकारात्मक छवि ही पेश की गयी है. उन्हें अनपढ़, गंवार और जंगली के रूप में प्रस्तुत किया गया है. लेकिन, सच्चाई इसके विपरीत है. आदिवासी समाज के लोग प्रकृति के साथ जीते हैं. उनमें जाति और वर्ग के आधार पर कोई असमानता नहीं है. आदिवासी महिलाओं को समाज ने कई अधिकार दिये हैं. उनमें स्वशासन की व्यवस्था है, ग्रामसभा की व्यवस्था है. इसके बारे में लोगों को पढ़ाया जाना चाहिए.

आदिवासियों की इस समृद्ध व्यवस्था के बारे में न पढ़ाकर, वर्तमान खिचड़ी स्कूल की तरह इसे भी चलाया जायेगा, तो विश्वविद्यालय खुलने का कोई फायदा नहीं होगा. उन्होंने कहा कि सरकार आदिवासियों का भला करना चाहती है, तो उसे सरकारी जनजातीय विद्यालयों में प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त करने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे. ऐसा नहीं हुआ, तो आदिवासियों के बच्चे घरेलू नौकरों की फैक्टरी का उत्पाद बनकर रह जायेंगे.

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