मुफ्त सेवाएं और उपहार देना राजनीतिक दलों को पड़ सकता है महंगा, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट कहा कि यह गंभीर मामला है क्योंकि कभी-कभी नि:शुल्क सेवाएं नियमित बजट से भी अधिक दी जाती हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने आज चुनाव से पहले पब्लिक फंड से बेतुके मुफ्त सेवाएं एवं उपहार देने या इसका वादा करने वाले राजनीतिक दलों का चुनाव चिह्न जब्त करने या उनका पंजीकरण रद्द करने का आदेश देने का अनुरोध करने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और निर्वाचन आयोग से मंगलवार को जवाब मांगा है.
सुप्रीम कोर्ट कहा कि यह गंभीर मामला है क्योंकि कभी-कभी नि:शुल्क सेवाएं नियमित बजट से भी अधिक दी जाती हैं. प्रधान न्यायाधीश वी एन रमण, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है. इन्हें चार सप्ताह में नोटिस का जवाब देना है.
गौरतलब है कि पांच राज्यों में 10 फरवरी से विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होना है. इन चुनावों से पहले यह जनहित याचिका दायर की गयी है. याचिका में कहा गया है कि मतदाताओं से अनुचित राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस प्रकार के वादे करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. इस तरह के वादे और वितरण करना संविधान के खिलाफ है इसलिए चुनाव आयोग को ऐसा करने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई के बाद कहा देखते हैं, हम फिलहाल नोटिस जारी करेंगे, चुनाव आयोग के जवाब के बाद ही इसपर आगे कुछ कार्रवाई के आदेश दिये जा सकते हैं. कोर्ट ने कहा हम य जानना चाहते हैं कि इसे नियंत्रित कैसे करना है. यह एक गंभीर मसला है क्योंकि नि:शुल्क सेवाएं देने का बजट नियमित बजट से अधिक हो रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन वादों की वजह से कभी-कभी सभी को चुनाव में समान रूप से लड़ने का अवसर नहीं मिल पाता. पीठ ने कहा, अधिक वादे करने वाले दलों की स्थिति अच्छी होती है और उनके चुनाव जीतने की संभावना भी अधिक होती है, क्योंकि ये वादे कानून के तहत भ्रष्ट नीतियों के दायरे में नहीं आते.
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