शिरीष खरे को 'एक देश बारह दुनिया' के लिए स्वयं प्रकाश स्मृति सम्मान
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 20 Oct 2022 6:20 PM
निर्णायक मंडल के वरिष्ठतम सदस्य काशीनाथ सिंह (वाराणसी) ने अपनी संस्तुति में कहा कि युवा लेखक शिरीष खरे का रिपोर्ताज लेखन एक साथ वैचारिक और साहित्यिक कसौटियों पर खरा उतरता है.
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संस्थान ’स्वयं प्रकाश स्मृति न्यास’ ने सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्वयं प्रकाश की स्मृति में दिए जाने वाले वार्षिक सम्मान की घोषणा कर दी है. न्यास के अध्यक्ष प्रो मोहन श्रोत्रिय ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर के इस सम्मान के लिए इस बार सुपरिचित लेखक और पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ का चयन किया गया है.
सम्मान के लिए तीन निर्णायक मंडल ने इस पुस्तक को वर्ष 2022 के लिए चयनित करने की अनुशंसा की है. निर्णायक मंडल के वरिष्ठतम सदस्य काशीनाथ सिंह (वाराणसी) ने अपनी संस्तुति में कहा कि युवा लेखक शिरीष खरे का रिपोर्ताज लेखन एक साथ वैचारिक और साहित्यिक कसौटियों पर खरा उतरता है. उनकी पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ उस लेखन परम्परा का विकास है जो रांगेय राघव, अमृत राय और स्वयं प्रकाश जैसे लेखकों ने निर्मित की है. यह सामाजिक सरोकारों वाला ऐसा समर्थ गद्य है जो कथेतर लेखन को भी ऊंचाई देने वाला है.
निर्णायक मंडल के दूसरे सदस्य कवि-गद्यकार राजेश जोशी (भोपाल) ने शिरीष खरे की पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ की अनुशंसा में कहा कि स्वयं प्रकाश अपने कहानी लेखन के साथ साथ कथेतर लेखन में जिन सामाजिक सरोकारों के लिए सृजनरत रहे उन्हीं सरोकारों को खरे की इस कृति में देखना आश्वस्तिप्रद है. निर्णायक मंडल के तीसरे सदस्य प्रो असगर वजाहत थे.
शिरीष खरे की ये किताब महत्वपूर्ण है. अभी मैंने सिर्फ़ एक चैप्टर पढ़ा है. फिर भी कह रहा हूं. इस क़िताब में सिर्फ़ एक चैप्टर होता तब भी ये महत्वपूर्ण होती. छोटी-सी 200 पेज की किताब है, मंगाकर पढ़ डालिए. pic.twitter.com/qFHi2TDfVC
— Anubhav (@Anubhav_nahihai) September 3, 2022
प्रो श्रोत्रिय ने बताया कि मूलत: राजस्थान के अजमेर निवासी स्वयं प्रकाश हिंदी कथा साहित्य के क्षेत्र में मौलिक योगदान के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने ढाई सौ के आसपास कहानियां लिखीं और उनके पांच उपन्यास भी प्रकाशित हुए थे. इनके अतिरिक्त नाटक, रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध और बाल साहित्य में भी अपने अवदान के लिए स्वयं प्रकाश को हिंदी संसार में जाना जाता है. उन्हें भारत सरकार की साहित्य अकादेमी सहित देश भर की विभिन्न अकादमियों और संस्थाओं से अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले थे. उनके लेखन पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुआ है तथा उनके साहित्य के मूल्यांकन की दृष्टि से अनेक पत्रिकाओं ने विशेषांक भी प्रकाशित किए हैं. 20 जनवरी 1947 को इंदौर में जन्मे स्वयं प्रकाश का निधन कैंसर के कारण 7 दिसंबर 2019 को हो गया था. लंबग समय से वे भोपाल में निवास कर रहे थे और यहां से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘वसुधा’ तथा ‘चकमक’ के संपादन से भी जुड़े रहे.
प्रो श्रोत्रिय ने बताया कि लेखक शिरीष खरे को सम्मान में ग्यारह हजार रुपये, प्रशस्ति पत्र और शॉल भेंट किये जायेंगे. इस सम्मान के लिए देश भर से बड़ी संख्या में प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं जिनमें से प्राथमिक चयन के बाद श्रेष्ठ कृतियों को निर्णायकों के पास भेजा गया. वर्ष 2021 का स्वयं प्रकाश स्मृति सम्मान मनोज कुमार पांडेय को उनके कहानी संग्रह ‘बदलता हुआ देश’ के लिए घोषित किया गया था. साहित्य और लोकतान्त्रिक विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए गठित स्वयं प्रकाश स्मृति न्यास में कवि राजेश जोशी(भोपाल), आलोचक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल (जयपुर). कवि-आलोचक आशीष त्रिपाठी (बनारस), आलोचक पल्लव (दिल्ली), इंजी अंकिता सावंत (मुंबई) और अपूर्वा माथुर (दिल्ली) सदस्य हैं.
साल 1981 को मध्य-प्रदेश, जिला नरसिंहपुर के आदिवासी बहुल गांव मदनपुर में जन्म हुआ. वर्ष 1999 में बारहवीं पास करके अपने गांव से पहली बार राज्य की राजधानी भोपाल की यात्रा. वर्ष 2002 तक भोपाल में पत्रकारिता की पढ़ाई. तब से देश के बारह राज्यों के भीतरी भागों की यात्राएं. दो दशक से भोपाल, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, रायपुर और पुणे में रहते हुए गांव केंद्रित पत्रकारिता और लेखन में सक्रिय. हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर दर्शाती बहुचर्चित पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ के लेखक. अन्य पुस्तकें खोजी पत्रकारिता पर ‘तहकीकात’ और स्कूली शिक्षा पर ‘उम्मीद की पाठशाला’. ‘राजस्थान पत्रिका’ और ‘तहलका’ सहित अन्य संस्थानों में रहते हुए हजार से अधिक प्रकाशित रिपोर्ट. चार सौ से अधिक गांवों के बारे में लिखित सामग्री. भारतीय गांवों पर उत्कृष्ट रिपोर्टिंग के लिए वर्ष 2013 में ‘भारतीय प्रेस परिषद’ द्वारा सम्मानित. वर्ष 2009, 2013 और 2020 में ‘संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष’ द्वारा लैंगिक संवेदनशीलता पर न्यूज स्टोरीज के लिए ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ सहित सात राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार. संपर्क: kharealert24@gmail.com
जब मुख्यधारा की मीडिया में अदृश्य संकटग्रस्त क्षेत्रों की ज़मीनी सच्चाई वाले रिपोर्ताज लगभग गायब हो गए हैं तब इस पुस्तक का संबंध एक बड़ी जनसंख्या को छूते देश के इलाकों से है जिसमें शिरीष खरे ने विशेषकर गांवों की त्रासदी, उम्मीद और उथल-पुथल की परत-दर-परत पड़ताल की है. यह देश-देहात के मौजूदा और भावी संकटों से संबंधित नया तथा जरूरी दस्तावेज है. इक्कीसवीं सदी के मेट्रो-बुलेट ट्रेन के भारत में विभिन्न प्रदेशों के वंचित जनों की जिंदगियों के किस्से एक बिलकुल दूसरे ही हिंदुस्तान को पेश करते हैं, हिंदुस्तान जो स्थिर है, गतिहीन है और बिलकुल ठहरा हुआ है. यह भारत की ऐसी तस्वीर है जो छिपाई जाती है, लेकिन जिसे फ्रंट पर होना चाहिए.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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