मानव विकास सूचकांक में भारत 132वें स्थान पर, वैश्विक स्तर पर 32 साल में पहली बार जोरदार गिरावट

Published by : KumarVishwat Sen Updated At : 08 Sep 2022 3:28 PM

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मानव विकास सूचकांक की हालिया गिरावट में एक बड़ा योगदान जीवन प्रत्याशा में वैश्विक गिरावट दर्ज की गई है, जो 2019 में 72.8 वर्ष से घटकर 2021 में 71.4 वर्ष हो गया है.

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नई दिल्ली : वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान मानव विकास में वैश्विक गिरावट के बीच मानव विकास सूचकांक में भारत 191 देशों में 32वें स्थान पर पहुंच गया है. हालांकि 90 प्रतिशत देशों ने 2020 या 2021 में अपने मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) मूल्य में कमी दर्ज की है, जो सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में प्रगति विपरीत है. मानव विकास (एक राष्ट्र के स्वास्थ्य, शिक्षा और औसत आय का एक उपाय) लगातार दो साल (2020 और 2021) में घट गया है, जो पिछले पांच साल की प्रगति को प्रभावित करता है. यह वैश्विक गिरावट के अनुरूप है, जो यह दर्शाता है कि दुनिया भर में मानव विकास 32 वर्षों में पहली जोरदार गिरावट दर्ज की गई.

जीवन प्रत्याशा में वैश्विक गिरावट दर्ज

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मानव विकास सूचकांक की हालिया गिरावट में एक बड़ा योगदान जीवन प्रत्याशा में वैश्विक गिरावट दर्ज की गई है, जो 2019 में 72.8 वर्ष से घटकर 2021 में 71.4 वर्ष हो गया है. पिछले दो वर्षों में दुनिया भर में अरबों लोगों पर कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध का विनाशकारी प्रभाव पड़ा है. कोरोना महामारी के दौरान व्यापक सामाजिक और आर्थिक बदलाव देखे गए. वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को एक खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है.

जीवन को अस्थिर करने वाला दौर जारी

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ओर से गुरुवार को पेश की गई मानव विकास रिपोर्ट (अनसर्टेन टाइम्स-अनसेटल्ड लाइव्स : शेपिंग अवर फ्यूचर इन ए ट्रांसफॉर्मिंग वर्ल्ड) के अनुसार अनिश्चितता की परतें ढेर हो रही हैं और अभूतपूर्व तरीके से जीवन को अस्थिर करने वाला दौर जारी है. यूएनडीपी के प्रशासक अचिम स्टेनर ने कहा कि दुनिया भर के लोग लगातार संकटों का सामना कर रहे हैं. हमारे जीवन जीने की लागत बढ़ गई है और ऊर्जा संकट लगातार बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि, ऊर्जा संकट जीवाश्म ईंधन को सब्सिडी देने जैसे त्वरित सुधारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए आकर्षक है. तत्काल राहत रणनीति दीर्घकालिक प्रणालीगत परिवर्तनों में देरी कर रही है, जो हमें करना चाहिए. उन्होंने कहा कि हम इन चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक रूप से असक्षम हो गए हैं. अनिश्चितता के इस दौर में आम चुनौतियों से निपटने के लिए हमें परस्पर संबंधों को मजबूत बनाते हुए वैश्विक एकजुटता की एक नई भावना पैदा करने की आवश्यकता है.

मानव विकास श्रेणी में भारत मध्यम स्तर पर

यूएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार, इन अन्तर्विभाजक संकटों ने भारत के विकास पथ को वैसे ही प्रभावित किया है, जैसे विश्व के अधिकांश हिस्सों में किया है. भारत का एचडीआई मान 0.633 देश को मध्यम मानव विकास श्रेणी में रखता है, जो 2020 की रिपोर्ट में इसके 0.645 के मूल्य से कम है. एचडीआई मानव विकास के 3 प्रमुख आयामों पर प्रगति को मापता है – एक लंबा और स्वस्थ जीवन, शिक्षा तक पहुंच और एक सभ्य जीवन स्तर. इसकी गणना 4 संकेतकों का उपयोग करके की जाती है, इसमें जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय शामिल हैं.

भारत में भी जीवन प्रत्याशा में आई गिरावट

वैश्विक रुझानों की तरह भारत के मामले में भी मानव विकास सूचकांक में 2019 में 0.645 से 2021 में 0.633 तक की गिरावट दर्ज की गई. इसमें जीवन प्रत्याशा को 69.7 से घटकर 67.2 वर्ष तक हो जाने जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. भारत में स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष 11.9 वर्ष हैं और स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष 6.7 वर्ष हैं. सकल राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति स्तर 6,590 डॉलर है.

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मानव विकास पर असमानता का प्रभाव हुआ कम

भारत में यूएनडीपी के प्रतिनिधि शोको नोडा ने कहा कि मानव विकास रिपोर्ट से पता चलता है कि यह वैश्विक स्तर पर प्रगति के विपरीत है. मानव विकास में भारत की गिरावट इस प्रवृत्ति को दर्शाती है कि संकटों को पार करने से प्रभावित है. 2019 की तुलना में मानव विकास पर असमानता का प्रभाव कम है. भारत दुनिया की तुलना में पुरुषों और महिलाओं के बीच मानव विकास की खाई को तेजी से पाट रहा है. यह विकास पर्यावरण के लिए एक छोटी कीमत पर आया है. भारत की विकास कहानी समावेशी विकास, सामाजिक सुरक्षा, लिंग-प्रतिक्रियात्मक नीतियों में देश के निवेश को दर्शाती है और यह नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देती है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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