असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा- बॉर्डर स्टेट में रहने वाले हर परिवार की नागरिकता की जांच जरूरी

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 14 Jun 2026 12:30 PM

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हिमंत बिस्वा सरमा

Himanta Biswa Sarma : असम सरकार केंद्र सरकार को यह सुझाव देगी कि सीमावर्ती राज्यों में रहने वाले प्रत्येक परिवार की नागरिकता की जांच की जाए. इसकी वजह वे यह मानते हैं कि असम समझौते के बावजूद देश में घुसपैठ जारी था, क्योंकि फेंसिंग का काम उस स्तर पर नहीं हो पाया था, जैसा कि होना चाहिए था.

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Himanta Biswa Sarma : असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि भारत-बांग्लादेश की पूरी सीमा पर बाड़ (फेंसिंग) लगाना चाहिए था. असम समझौते के तहत केवल असम और बांग्लादेश की सीमा पर फेंसिंग का काम किए जाने की शुरुआत हुई. यह समझौता एक ऐतिहासिक भूल थी, क्योंकि नाॅर्थ-ईस्ट के कई अन्य राज्यों की सीमाएं भी बांग्लादेश से लगती हैं, लेकिन वहां फेंसिंग का काम नहीं हुआ.

असम समझौते के वक्त कुछ गलतियां हुई

गुवाहाटी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम समझौते के समय मुख्य मांग असम-बांग्लादेश सीमा पर फेंसिंग कराने की थी, लेकिन उस समय यह नहीं सोचा गया कि मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी समान रूप से बाड़बंदी की जानी चाहिए. परिणाम यह हुआ कि जिन राज्यों में फेंसिंग नहीं की गई, वहां से घुसपैठ जारी रहा.उन्होंने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लंबे समय तक सीमा का बड़ा हिस्सा खुला रहा. उन्होंने कहा कि यदि एक स्थान पर सीमा बंद कर दी जाए और दूसरे स्थान से आवागमन जारी रहे, तो सुरक्षा उपायों का कोई फायदा नहीं मिलता है.

1985 के समझौते पर अब काम हुआ

हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि 1985 में जो समझौता हुआ था उसपर अब काम हो रहा है. अब स्थिति काफी बदल रही है. मेघालय में सीमा फेंसिंग का लगभग 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है, जबकि त्रिपुरा में करीब 60 प्रतिशत काम पूरा हुआ है. मिजोरम में भी काम जारी है और पश्चिम बंगाल में भी अब फेंसिंग का काम शुरू हो गया है. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले दशकों में बांग्लादेश से होने वाले अवैध आवागमन को पूरी तरह नहीं रोका जा सका.

डेमोग्राफी चेंज की जांच होगी

सरमा ने कहा कि केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलावों यानी डेमोग्राफी चेंज का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की है.असम सरकार केंद्र को सुझाव देगी कि सीमा से लगे इलाकों में रहने वाले प्रत्येक परिवार की नागरिकता की जांच की जाए. उनका मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसंख्या संरचना में आए बदलावों का अध्ययन और नागरिकता संबंधी सत्यापन भविष्य में सीमा सुरक्षा तथा अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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