Gandhi Jayanti 2022 :अंग्रेजों से लोहा लेने वाले महात्मा गांधी को लगता था पत्नी कस्तूरबा और सांपों से डर
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 01 Oct 2022 10:27 PM
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपने विवाह और स्त्री-पुरुष संबंध को लेकर बहुत ही स्पष्टता से बातें की हैं. महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग लिखा है कि उनकी शादी मात्र 13 वर्ष की उम्र में हुई थी.
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में अपने जीवन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी घटनाओं का जिक्र किया है. उन्होंने अपनी आत्मकथा में बहुत ही साफगोई से यह स्वीकार किया है कि उनके अंदर वो तमाम कमजोरियां थीं जो एक आम आदमी के अंदर होती हैं. साथ ही उन्होंने यह भी बताया है कि किस प्रकार उन्होंने उन कमजोरियों से पार पाया.
महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपने विवाह और स्त्री-पुरुष संबंध को लेकर बहुत ही स्पष्टता से बातें की हैं. महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग लिखा है कि उनकी शादी मात्र 13 वर्ष की उम्र में हुई थी. महात्मा गांधी ने अपने विवाह के बारे में लिखा है कि उन्हें बहुत अफसोस होता है कि उनका बाल विवाह हुआ था. गांधी जी ने लिखा है कि उनकी तीन सगाई हुई और तीसरी सगाई के बाद ब्याह हुआ. पहली दो सगाई जिन लड़कियों से हुई वे मर गयीं. तीसरी सगाई करीब सात साल की उम्र में हुई थी.
गांधी जी ने लिखा है कि भारतीय समाज में शादी यानी बेफिजूल के खर्चे. गांधी जी बहुत रोचक अंदाज में लिखा है कि वर-कन्या पक्ष किस तरह शादी में धन लुटाते हैं. कपड़े-गहने खरीदते हैं. गांधी जी ने बताया है कि शादी में उन्हें काफी शर्म आ रही थी और उनके लिए शादी का अर्थ सिर्फ नये कपड़े पहनना. अपनी उम्र की लड़की से विनोद करना मात्र था.
शादी की पहली रात को वे अपनी पत्नी कस्तूरबा से शरमा रहे थे. उनकी भाभी ने उन्हें सिखलाया था कि लड़की से क्या बात करना है. लेकिन वे अपनी पत्नी से शरमा तो रहे थे डर भी रहे थे. गांधी जी ने लिखा है कि धीरे-धीरे हम एक दूसरे को समझने लगे और बात करने लगे. गांधीजी ने अपने विवाह को लेकर बताया है कि किस तरह छोटी उम्र में विवाह होने से कम विकसित बुद्धि आचरण करती है.
गांधी ने अपनी आत्मकथा में बड़ी बेबाकी से लिखा है कि अपनी पत्नी को लेकर मैं ईष्यालु हो गया था. कहीं पढ़ा था कि पत्नी को एक पति व्रत का पालन करना चाहिए. इस व्रत को स्त्री खुद पालन करे तो बेहतर, लेकिन छोटी उम्र के कारण मैं उस पर शक करने लगा, उसकी निगरानी करने लगा.
गांधी जी ने बताया है कि कस्तूरबा निरक्षर थी और वे उन्हें पढ़ाना चाहते थे. लेकिन उनके लिए यह संभव नहीं था क्योंकि उस जमाने में पति-पत्नी बड़ों के सामने एक साथ नहीं रह सकते थे. स्त्री शिक्षा, विवाह से जुड़े नियम -कायदे और स्त्री अधिकारों को लेकर गांधी जी सजग थे और वे चाहते थे कि उनकी पत्नी और समाज की अन्य महिलाएं भी पढ़े-लिखें इसी उद्देश्य से उन्होंने घूंघट का भी विरोध किया था.
गांधी जी बताया है कि उन्हें भूत, चोर और सांपों से बहुत डर लगता था. इसलिए वे ना तो अंधेरे में कहीं जाते थे और ना अकेले कभी सोते थे. उन्हें यह महसूस भी हुआ था कि कस्तूरबा उनसे ज्यादा हिम्मती है. लेकिन वे अपने डर के बारे में उनसे कहना नहीं चाहते थे. उनके दोस्त उन्हें चिढ़ाते थे और यहां तक कहते थे वे सांपों को हाथ से पकड़ते हैं और भूतों को डराते हैं और वे ये सब इसलिए कर पाते हैं कि क्योंकि वे मांसाहार करते हैं. इसी वजह से गांधी जी के मन में भी मांसाहार करने की बात आयी थी, हालांकि वे जल्दी ही सच्चाई से वाकिफ भी हो गये थे.
गांधी की आत्मकथा में ऐसे कई किस्से भरे पड़े हैं, जिसमें गांधी जी ने अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं से बड़ी ही निर्भीकता के साथ परिचय कराया है. चाहे वो मांसाहार की बात हो, शिक्षक का मजाक उड़ाने की बात हो. व्याभिचार की बात हो या कुछ और हो. उन्होंने बेहतरीन तरीके से बताया है कि किस तरह उन्होंने अपनी कमियों से लोहा लिया और अंतत: महात्मा बने.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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