क्या है FCRA बिल? 12 अगस्त हो सकता है संसद में पेश, बदल जाएंगे विदेशी फंडिंग पाने वाले NGO के नियम

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संसद भवन की फाइल फोटो

FCRA बिल संसद में 12 अगस्त को पेश हो सकता है. इसके आने से NGO के नियमों में बड़ा फेरबदल होने की संभावना है. विदेशी फंडिंग पर कड़े नियम, संपत्ति जब्त होने का खतरा और छोटे संगठनों पर गहरा असर पड़ेगा.

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FCRA Bill : विदेशी फंडिंग बिल को लेकर चल रही खींचतान के बीच, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. उन्होंने गृह मंत्री से मुलाकात कर बिल को लेकर सिफारिशें पेश की हैं और क्षेत्रीय चिंताओं को सामने रखा है. न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट में बताया गया कि FCRA (फॉरेन कंट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट) 12 अगस्त को संसद में पेश हो सकता है.

क्या है FCRA बिल?

FCRA विधेयक भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे की निगरानी का कानून है. इसके 2026 के नए संशोधनों का मुख्य उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता लाना और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत करना है. नए नियमों के तहत, यदि किसी NGO का लाइसेंस रद्द या सरेंडर होता है, तो विदेशी फंड से बनी उसकी सभी संपत्तियां सरकार अपने नियंत्रण में ले सकेगी. साथ ही, संस्थाओं के शीर्ष पदों पर विदेशी नागरिकों की नियुक्ति और विदेशी धन से होने वाले धार्मिक धर्मांतरण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है.

FCRA के आने से क्या होगा असर?

इसके कानून बन जाने के बाद विदेशों से फंडिंग प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों और धार्मिक संस्थाओं के नियमों में कई बदलाव कर दिए जाएंगे. रिपोर्ट में बताया गया कि इसके पीछे सरकार का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता लाना, धर्मांतरण पर रोक लगाना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है.

फंड और संपत्ति जब्त होने का जोखिम

अगर किसी NGO का FCRA लाइसेंस रिन्यू नहीं होता या रद्द हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनाई गई उसकी सभी संपत्तियां (जैसे स्कूल, अस्पताल, या इमारतें) सरकार के कब्जे में चली जाएंगी. संस्थाएं अपनी संपत्ति खोने के डर से आसानी से इस फ्रेमवर्क से बाहर नहीं निकल पाएंगी.

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छोटे और जमीनी स्तर के संगठनों का अस्तित्व खतरे में

नए कड़े नियमों के तहत विदेशी फंड को एक NGO से दूसरे NGO में ट्रांसफर करने पर पूरी तरह रोक लगा दी जाएगी. इससे भारत के बड़े NGOs अब ग्रामीण या छोटे संगठनों को पैसा देकर काम नहीं करवा पाएंगे, जिससे छोटे संगठनों का कामकाज ठप हो सकता है.

प्रशासनिक खर्चों पर पाबंदी

प्रशासनिक खर्च (जैसे स्टाफ की सैलरी और ऑफिस का किराया) की सीमा पहले ही घटाकर 20% की जा चुकी है. FCRA के आने के बाद NGOs को अपनी हर छोटी-बड़ी गतिविधि का पल-पल का हिसाब देना होगा.

धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर असर

इसका सीधा असर उन विदेशी-फंडेड धार्मिक संस्थाओं पर पड़ेगा जो समाज सेवा की आड़ में धार्मिक परिवर्तन या प्रचार से जुड़ी रही हैं.

पूजा स्थलों का संरक्षण

यदि सरकार किसी विवादित धार्मिक संस्था की संपत्ति को जब्त करती है, तो कानूनन उसे उस पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बनाए रखना होगा. लेकिन प्रबंधन पूरी तरह सरकारी तंत्र के हाथ में होगा.

आम जनता और सामाजिक विकास पर असर

शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले जेन्युइन NGOs का कानूनी और कागजी काम बढ़ जाएगा. इसके चलते जमीनी स्तर पर जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुंचने में देरी हो सकती है.

पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार

सकारात्मक पक्ष यह है कि इस कानून से उन फर्जी या संदिग्ध संस्थाओं पर पूरी तरह लगाम लगेगी जो विदेशी धन का उपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों, दंगे भड़काने या देश की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने के लिए करती थीं. चंदे का वास्तविक उपयोग सही जगह हो सकेगा.

ईसाई संगठनों ने जताई आपत्ति

अमित शाह से मुलाकात के बाद काउंसिल ऑफ चर्चेज इन मिजोरम (CCM) के महासचिव रेवरेंड लालहमांगाइहा ने कहा कि नए FCRA संशोधन विधेयक के कुछ प्रावधान ईसाई संगठनों के लिए स्वीकार करना मुश्किल हैं.

उनका कहना है कि अगर किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है या वह उसे स्वेच्छा से सरेंडर कर देती है, तो पहले से विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों के जब्त होने की आशंका है. इसी चिंता को लेकर ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री को संयुक्त ज्ञापन सौंपा है.

विपक्ष ने विधेयक को बताया कठोर

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक का विरोध किया है. कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे बेहद कठोर बताते हुए कहा कि ऐसा महत्वपूर्ण विधेयक मौजूदा राजनीतिक माहौल में नहीं लाया जाना चाहिए. वहीं कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने आरोप लगाया कि इस संशोधन से विदेशी फंड पर निर्भर NGO और विशेष रूप से ईसाई व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थाएं प्रभावित होंगी. उन्होंने कहा कि कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने भी इस विधेयक पर अपनी चिंता जताई है.

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आलोक पाठक

लेखक के बारे में

By आलोक पाठक

आलोक पाठक वर्ष 2019 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने पत्रकारिता सफर के दौरान वे खबर मंत्र, गांडीव और नक्षत्र न्यूज़ जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं। वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। हिंदी भाषा और लेखन के प्रति उनका विशेष लगाव है। उन्हें भू-राजनीति (Geopolitics) और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना पसंद है। निजी जीवन में कहानियां और कविताएं लिखना तथा कालजयी साहित्य का अध्ययन उनकी प्रमुख रुचियों में शामिल है। उनका प्रयास तथ्यों पर आधारित, सरल और प्रभावी लेखन के माध्यम से पाठकों तक सार्थक जानकारी पहुंचाना है।

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