नाक में दिया जा सकता है कोरोना का वैक्सीन, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मिलती है मदद

Author : Rajneesh Anand Published by : Prabhat Khabar Updated At : 22 Aug 2020 3:39 PM

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Corona vaccine can be given in the nose helps to increase immunity : वैज्ञानिकों ने कोविड-19 के खिलाफ एक वैक्सीन विकसित किया है जिसकी एक खुराक नाक के जरिए दी जा सकती है और यह चूहे में कोरोना वायरस संक्रमण रोकने में काफी असरदार साबित हुआ है . जर्नल ‘सेल' में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-19 के कई वैक्सीन पर परीक्षण चल रहा है. इस वैक्सीन को संक्रमण की शुरुआती जगह नाक में डाला जाता है इससे प्रतिरोधक क्षमता को भी बेहतर करने में मदद मिली.

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वाशिंगटन : वैज्ञानिकों ने कोविड-19 के खिलाफ एक वैक्सीन विकसित किया है जिसकी एक खुराक नाक के जरिए दी जा सकती है और यह चूहे में कोरोना वायरस संक्रमण रोकने में काफी असरदार साबित हुआ है . जर्नल ‘सेल’ में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि कोविड-19 के कई वैक्सीन पर परीक्षण चल रहा है. इस वैक्सीन को संक्रमण की शुरुआती जगह नाक में डाला जाता है इससे प्रतिरोधक क्षमता को भी बेहतर करने में मदद मिली.

अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक नाक के जरिए वैक्सीन की खुराक प्रदान करने से समूचे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर करने में मदद मिलती है. यह नाक और श्वसन तंत्र में खासा असरदार साबित हुआ है और रास्ता रोककर संक्रमण को समूचे शरीर में फैलने से रोकता है. इस अध्ययन टीम में अमेरिका के वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसीन के अनुसंधानकर्ता भी थे. कुछ और जानवरों तथा इंसानों पर इस वैक्सीन का परीक्षण करने की योजना है कि क्या यह कोविड-19 संक्रमण को रोकने में कारगर और सुरक्षित है .

अमेरिका के वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसीन के अनुसंधानकर्ता माइकल एस डायमंड ने कहा, ‘‘नाक के ऊपरी हिस्से के सेल में मजबूत रोग प्रतिरोधक तंत्र देखकर हमें काफी खुशी हुई .वायरस के संक्रमण को इसने रोकने का काम किया .” डायमंड ने कहा, ‘‘चूहे में संक्रमण को रोकने में यह कारगर रहा.कुछ चूहे में हमें मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता के प्रमाण भी मिले और संक्रमण के निशान भी नहीं मिले.”

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नाक के जरिए दिए जाने वाले वैक्सीन को विकसित करने के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने वायरस के स्पाइक प्रोटीन का इस्तेमाल किया .वैज्ञानिकों ने कहा है कि नाक के जरिए वैक्सीन की खुराक देने से नाक और श्वसन तंत्र में संक्रमण के मार्ग को अवरूद्ध किया जा सकता है और समूचे शरीर में इसे फैलने से रोका जा सकता है. हालांकि, अध्ययनकर्ताओं ने आगाह किया कि अभी सिर्फ चूहा पर वैक्सीन के परीक्षण का अध्ययन किया गया है .आगामी दिनों में इसके परीक्षण का व्यापक अध्ययन हो सकेगा .

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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