गंगा के चिकित्सीय लाभों पर अनुसंधान करवाएगा केंद्र

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने आज आश्वासन दिया है कि वह गंगा नदी के चिकित्सीय लाभों और इसमें डुबकी लगाने वाले करोडों लोगों की सेहत पर पडने वाले इसके प्रभाव को स्थापित करने के लिए एक समग्र अनुसंधान करवाएगी. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे. पी .नड्डा ने ‘गंगा नदी के पानी के कभी […]
नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने आज आश्वासन दिया है कि वह गंगा नदी के चिकित्सीय लाभों और इसमें डुबकी लगाने वाले करोडों लोगों की सेहत पर पडने वाले इसके प्रभाव को स्थापित करने के लिए एक समग्र अनुसंधान करवाएगी. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे. पी .नड्डा ने ‘गंगा नदी के पानी के कभी न सड़ने के गुणों’ के विषय पर आयोजित एक कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘हम छह माह बाद एक सम्मेलन आयोजित करेंगे, जिसमें हम सभी शोधपत्रों पर चर्चा करेंगे और गंगा नदी के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की स्थापना की दिशा में एक समन्वित प्रयास करेंगे.’
नड्डा ने जल संसाधन, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर इस अनुसंधान को करने वाली भारतीय चिकित्सीय अनुसंधान परिषद को वित्तीय मदद देने का आश्वासन दिया. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री ने कहा कि इस अनुसंधान के नतीजों को एक घोषणा के रुप में प्रकाशित किया जाएगा. इस बीच, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा कि यह पहल बहुचर्चित स्वच्छ गंगा के राष्ट्रीय अभियान को एक नई दिशा दे सकती है.
उमा भारती ने कहा, ‘‘गंगा नदी के तीन पहलू हैं- धार्मिक, आर्थिक और इसके चिकित्सीय लाभ. नदी के धार्मिक और आर्थिक पहलुओं के बारे में बहुत कुछ ज्ञात रहा है लेकिन इसके जल के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव पर शोध कभी नहीं किया गया. यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान को एक दिशा प्रदान करेगा. उन्होंने कहा कि गंगा की धार्मिक प्रकृति के कारण सबसे बड़ी चुनौती इसकी सफाई में निरंतरता बनाए रखने की है. उन्होंने कहा, ‘‘गंगा की सफाई हमारे लिए चुनौती नहीं है. ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इसकी सफाई में निरंतरता बनाई रखी जाए क्योंकि एक दिन में हजारों लोग इसमें डुबकी लगाते हैं. इसलिए सिर्फ एक बार सफाई करने से काम नहीं होगा.’ मंत्री ने कहा कि एक साल में लगभग 20 करोड़ से भी ज्यादा लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं.
गंगा की आर्थिक प्रासंगिकता के बारे में उन्होंने कहा कि 50 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी रोजमर्रा की कमाई के लिए इस पवित्र नदी पर निर्भर करते हैं. इस एक दिवसीय कार्यशाला में वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं. ये लोग एनईईआरआई, सीएसआईआर, आईआईटी रुडकी और एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हैं. इस कार्यशाला में नदी में मौजूद रोगाणुओं की मौजूदगी पर भी चर्चा होगी. गंगा के जल के मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले अन्य प्रभावों के साथ-साथ इसमें रोगाणुओं की मौजूदगी चिंता का एक बडा विषय है. गंगा नदी नौ राज्यों में बहती है. पेयजल की आपूर्ति के साथ-साथ कई कार्यों में इसका इस्तेमाल प्रमुख जलस्रोत के रुप में किया जाता है.
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