पुलिस लाइन में मानव कंकाल मामले की जांच टीम ने रिपोर्ट सौंपी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :31 Jan 2015 7:47 PM (IST)
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उन्नाव: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में पुलिस लाइन के एक कमरे से कई मानव कंकाल बरामद होने के सनसनीखेज प्रकरण की जांच कर रही छह सदस्यीय टीम ने आज अपनी जांच रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. पुलिस अधीक्षक एमपी सिंह ने यहां बताया कि उन्नाव पुलिस लाइन में 47 बोरियों में भरी मानव अस्थियां […]
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उन्नाव: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में पुलिस लाइन के एक कमरे से कई मानव कंकाल बरामद होने के सनसनीखेज प्रकरण की जांच कर रही छह सदस्यीय टीम ने आज अपनी जांच रिपोर्ट सरकार को सौंप दी.
पुलिस अधीक्षक एमपी सिंह ने यहां बताया कि उन्नाव पुलिस लाइन में 47 बोरियों में भरी मानव अस्थियां तथा 74 जार में रखे विसरा मिलने के मामले में गठित एक उपजिलाधिकारी, एक मजिस्ट्रेट, एक पुलिस उपाधीक्षक, एक चिकित्सक, एक फोरेंसिक विशेषज्ञ तथा पोस्टमार्टम कक्ष प्रभारी स्तर के अधिकारी की टीम ने अपनी रिपोर्ट दे दी, जिससे जिलाधिकारी सौम्या अग्रवाल और शासन को अवगत करा दिया गया है. सिटी मजिस्ट्रेट हीरालाल यादव ने भी बताया कि टीम ने कल देर रात अपनी रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक को सौंप दी.
गौरतलब है कि गत 28 जनवरी को उन्नाव रिजर्व पुलिस लाइन परिसर में पोताई कर रहे कुछ लोगों ने वहां बने एक कमरे की खुली खिडकी से उत्सुकतावश अंदर झांका तो उसमें मानव हड्डियों और अवशेषों का ढेर दिखायी दिया था. उन्होंने इसकी सूचना पुलिस अधिकारियों को दी थी.
मामले के तूल पकडने पर लखनउ परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक आर. के. चतुर्वेदी ने मौके पर पहुंचकर पडताल की थी और जांच के लिये छह सदस्यीय समिति गठित की गयी थी. वहां कार्यरत रहे तीन पुराने फार्मासिस्टों जी. पी. वर्मा, विमल किशोर वर्मा तथा रामपाल वर्मा से कल रात की गयी पूछताछ में पता चला है कि वर्ष 1993 तक उसी कक्ष में पोस्टमार्टम होता था और वर्ष 2008 तक वहीं पर विसरा सुरक्षित रखे जाते थे.
चतुर्वेदी ने बताया कि 74 विसरा जार में से 58 पर लेबलिंग की गयी है. उनमें सबसे पुराना वर्ष 1980 का है जबकि सबसे आखिरी विसरा साल 2007 का है. इसके अलावा 47 बोरियों पर लेबलिंग की गयी हैं. उपमहानिरीक्षक ने बताया कि इन अवशेषों के बारे में वर्ष 1979 से 2008 तक के दस्तावेज मौजूद हैं. उन्होंने माना कि कहीं ना कहीं कोई गडबडी जरुर हुई है.
चतुर्वेदी ने कहा ‘‘कोई त्रुटि अवश्य हुई है. वर्ष 2009 में अलीगढ, एटा समेत चार-पांच जगहों पर ऐसे अवशेष पोस्टमार्टम हाउस के बाहर मिले थे. इसे लेकर एक नीति बनी थी कि मुकदमे से सम्बनिधत विसरा को अदालत की इजाजत से निस्तारित किया जाएगा लेकिन जिन मामलों में अपराध उजागर नहीं हुआ उनके समयबद्ध निस्तारण के लिये प्रक्रिया तय की गयी थी.’’ उपमहानिरीक्षक ने कहा कि कुछ जिलों में 2010 के बाद के मामलों में तो उस प्रक्रिया का पालन किया है लेकिन उसके पहले के मामलों में ऐसा नहीं किया गया. उन्नाव में भी सम्भवत: यही हुआ.
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