East Singhbhum News : दुर्गा पूजा में ढाक का महत्व, लेकिन ढाकियों की पेशा संकट में

पश्चिम बंगाल में लोक कलाकारों को मिलती है पेंशन, झारखंड के ढाकी अब भी वंचित
गालूडीह. मां दुर्गा की पूजा और आरती में ढाक का बजना विशेष महत्व रखता है. परंपरा है कि दुर्गा पूजा के दौरान आरती और अनुष्ठान में ढाक की ध्वनि शुभ मानी जाती है. हालांकि, ढाक बजाने की यह परंपरागत कला धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो रही है. जमशेदपुर, घाटशिला और गालूडीह क्षेत्र में दुर्गा पूजा के समय ढाकी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, हुगली, मालदा, बांकुड़ा और पुरुलिया जिलों से पहुंचते हैं. ये ढाकी ज्यादातर किसान और मजदूर तबके से आते हैं, जिनके लिए यह कला केवल पूजा के दौरान आजीविका का साधन बनती है.
ढाकियों की स्थिति
बड़ाखुर्शी गांव निवासी ढाकी श्रीकांत कालिंदी, शुभंकर कालिंदी, अनंत कालिंदी, रमेश कालिंदी और शैलेन कालिंदी ने बताया कि ढाक बजाने का काम उन्हें साल भर में सिर्फ दुर्गा पूजा के दौरान ही मिलता है. सुबह की पूजा के समय लगभग तीन घंटे और शाम की आरती में तीन से चार घंटे तक वे ढाक बजाते हैं. दुर्गा पूजा समाप्त होने के बाद शेष साल ये कलाकार मजदूरी या खेती करके परिवार का भरण-पोषण करते हैं. दुर्गा पूजा के दौरान एक ढाकी को 10 से 12 हजार रुपये तक आय होती है.परंपरा बन रही बोझ
ढाकियों का कहना है कि ढाक बजाना उनके पूर्वजों से उन्हें विरासत में मिला है और कभी यह उनकी स्थायी आजीविका थी. लेकिन अब केवल इस कला पर निर्भर रहना बेहद कठिन हो गया है, इसलिए उन्हें खेती और मजदूरी करनी पड़ती है.पेंशन योजना की मांग
लोक कलाकारों के लिए पश्चिम बंगाल सरकार पेंशन योजना चलाती है, लेकिन झारखंड में अभी तक ऐसी कोई योजना लागू नहीं की गयी है. ढाकियों की मांग है कि पश्चिम बंगाल की तर्ज पर यहां भी लोक कलाकारों को पेंशन मिले ताकि इस परंपरा को जीवित रखा जा सके और नयी पीढ़ी इसके प्रति आकर्षित हो सके.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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