किडनी की अनदेखी पड़ेगी भारी

Updated at : 17 Mar 2015 1:00 PM (IST)
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किडनी की अनदेखी पड़ेगी भारी

आज हर 10 में से एक व्यक्ति किडनी संबंधी रोग का शिकार हो रहा है. इसके लिए कहीं-न-कहीं असंतुलित दिनचर्या या गलत आदतें जिम्मेवार हैं. अगर आप स्वस्थ लंबा जीवन जीना चाहते हैं, तो इसकी गंभीरता को समङों और जीवनशैली में सुधार करें. इससे बहुत हद तक किसी गंभीर खतरे से बचा जा सकता है. […]

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आज हर 10 में से एक व्यक्ति किडनी संबंधी रोग का शिकार हो रहा है. इसके लिए कहीं-न-कहीं असंतुलित दिनचर्या या गलत आदतें जिम्मेवार हैं. अगर आप स्वस्थ लंबा जीवन जीना चाहते हैं, तो इसकी गंभीरता को समङों और जीवनशैली में सुधार करें. इससे बहुत हद तक किसी गंभीर खतरे से बचा जा सकता है. ‘वर्ल्‍ड किडनी डे’ पर दिल्ली व बेंग्लुरु के नेफ्रोलॉजिस्ट दे रहे हैं विशेष जानकारी.

किडनी के डैमेज होने के लिए हम सिर्फ बड़े कारणों को ही जिम्मेवार मानते हैं. लेकिन वास्तव में हमारी जीवनशैली में ही कई ऐसी गलत आदतें होती हैं, जिनसे किडनी डैमेज हो जाते हैं. इन छोटी बातों का ध्यान रख कर भी किडनी को स्वस्थ रखा जा सकता है.

नमक : अक्सर देखा जाता है कि लोग भोजन करने में अलग से कच्च नमक का प्रयोग करते हैं. हमें यह बात सामान्य लगती है. लेकिन इस छोटी-सी आदत से किडनी पर बुरा प्रभाव पड़ता है. नमक में सोडियम होता है. यह ब्लड प्रेशर के बढ़ने का बड़ा कारण है, जो समय के साथ किडनी को डैमेज करता है.

पेन किलर : चाहे सिर में दर्द हो या फिर कोई और दर्द, अक्सर लोग बिना सोचे समङो पेन किलर का प्रयोग करते हैं. लेकिन पेन किलर का प्रयोग बिना डॉक्टर की सलाह के करने से शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचता है. चूंकि किडनी शरीर का फिल्टर है, इसलिए दवाइयां इसमें पहुंच कर उसे भी डैमेज करती हैं.

स्मोकिंग : स्मोकिंग से हाइ बीपी की समस्या बढ़ती है. बीपी बढ़ने के कारण अन्य अंगों के साथ-साथ किडनी पर भी दबाव पड़ता है. इससे किडनी फेल्योर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, साथ ही किडनी के कैंसर का खतरा भी बढ़ता है.

पानी की कमी : कुछ लोग काम करने के चक्कर में पानी बहुत कम पीते हैं. इसके कारण शरीर की सफाई ठीक से नहीं हो पाती और किडनी डैमेज हो जाता है. कभी-कभी इससे किडनी में स्टोन भी बन जाते हैं. इन समस्याओं से बचने के लिए तीन-चार लीटर पानी रोज पीना जरूरी है.

हेपेटाइटिस बी और सी : इस रोग में भी लापरवाही बरतने पर कई अंगों पर प्रभाव पड़ता है. इसके कारण भी किडनी के नेफ्रॉन डैमेज होते हैं. अत: यदि किडनी की समस्याएं होती हैं, तो डॉक्टर हेपेटाइटिस की जांच की भी सलाह देते हैं. ताकि अधिक डैमेज से बचाया जा सके.

डायबिटिक नेफ्रोपैथी : डायबिटीज में शरीर में ब्लड शूगर लेवल बढ़ जाता है. इस कारण ब्लड वेसेल्स पर बुरा प्रभाव पड़ता है. किडनी शरीर का फिल्टर है.

इसमें फिल्टर करने के लिए असंख्य यूनिट होते हैं. इन्हें नेफ्रॉन कहते हैं. उनमें भी सूक्ष्म ब्लड वेसेल्स होते हैं. ब्लड शूगर बढ़ जाने के कारण ये वेसेल्स भी डैमेज हो जाते हैं. इससे एक -एक करके नेफ्रॉन डैमेज हो जाते हैं. इसे ही डायबिटिक नेफ्रोपैथी कहते हैं. अत्यधिक डैमेज होने की स्थिति में प्रोटीन फिल्टर नहीं हो पाता है. इस कारण पेशाब में एल्ब्यूमिन आने लगता है. इसका पता पेशाब की जांच से चलता है. एक बार किडनी के डैमेज हो जाने की स्थिति में इसके फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है. यदि समय पर इसका पता चल जाये, तो समय पर किडनी को बचाया जा सकता है अन्यथा किडनी फेल्योर का खतरा बढ़ जाता है.

पेशाब को रोकना : कई बार लोग पेशाब आने पर भी नहीं जाते. ऐसा या तो मजबूरी में करते हैं या फिर जानबूझ कर. मगर यह किडनी पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. ऐसा करने से किडनी पर दबाव पड़ता है. ऐसा बार-बार किया जाये, तो किडनी की कार्यक्षमता पर असर पड़ता है.

डॉ अहसान अहमद

डिपार्टमेंट ऑफ यूरोलॉजी

आइजीआइएमएस, पटना

किडनी खराब तब मानी जाती है जब वह अपना कार्य ठीक प्रकार न कर पाये. ऐसे में प्रारंभिक दौर में शरीर में कई प्रकार के लक्षण देखने को मिलते हैं, जिनमें से मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं –

सुबह के समय चेहरे पर ज्यादा सूजन होना. सूजन दिन भर रहती है, लेकिन सुबह में अधिक होती है.

कमजोरी और थकान महसूस होना. त्नभूख न लगना और उल्टी, जी-मिचलाने जैसी समस्या होना.

घुटनों में सूजन.

शरीर में खून की कमी होना.

कमर के नीचे दर्द रहना. त्नदवा खाने के बाद भी बीपी का कंट्रोल न होना.

डॉ एलके झा

सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट, पुष्पांजलि क्रॉसले हॉस्पिटल, दिल्ली

पांच प्रकार का होता है किडनी फेल्योर

एक्यूट प्री-रीनल किडनी फेल्योर : यह किडनी में खून की पर्याप्त मात्र नहीं जाने से होता है. पर्याप्त मात्र में खून न मिलने से किडनी खून से विषैले तत्वों को बाहर नहीं निकाल पाता है. इसे दवाइयों से ठीक किया जा सकता है.

एक्यूट इंट्रिन्सिक किडनी फेल्योर : यह एक्सीडेंट या किसी अन्य वजह से किडनी के क्षतिग्रस्त होने से होता है. शरीर से अत्यधिक खून बह जाने से भी होता है. इसके होने का मुख्य कारण किडनी में ऑक्सीजन की कमी होती है.

क्रॉनिक प्री-रीनल किडनी फेल्योर : एक्यूट प्री-रीनल किडनी फेल्योर के ट्रीटमेंट के बाद भी समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और ठीक नहीं होती. तब इसे क्रॉनिक प्री-रीनल किडनी फेल्योर कहते हैं. इसमें किडनी पूरी तरह खराब हो जाता है.

क्रॉनिक इंट्रिन्सिक किडनी फेल्योर : लंबे समय तक एक्यूट इंट्रिन्सिक किडनी फेल्योर ठीक न होने पर क्रॉनिक इट्रिन्सिक किडनी फेल्योर हो जाता है.

क्रॉनिक पोस्ट-रीनल किडनी फेल्योर : यह पेशाब को रोकने के कारण होता है. ऐसा करने से यूरिनरी ट्रेक्ट किडनी पर प्रेशर डालता है, जिससे किडनी डैमेज होने की आशंका होती है.

कब आती है किडनी ट्रांसप्लांट की नौबत

किडनी जब दवाइयों या अन्य तरीके से ठीक नहीं हो पाता है, तब अंतिम उपचार किडनी ट्रांसप्लांट है. इसके लिए किडनी डोनर की जरूरत होती है. ट्रांसप्लांट के 90} मामले सफल रहते हैं और 4-5 वर्ष तक सही तरीके से कार्य करते हैं. ट्रांसप्लांट के साइड इफेक्ट भी हैं. इसमें सर्जरी के बाद मरीज को इम्यूनोस्प्रेसिव ड्रग दिया जाता है, ताकि नये किडनी को शरीर रिजेक्ट न करे. लेकिन इससे शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कोई भी व्यक्ति जिसका ब्लड ग्रुप मरीज से मिलता हो, किडनी डोनर हो सकता है. डोनर की आयु 18 से 55 साल के बीच होनी चाहिए. डोनर को भी एक महीने तक डॉक्टर की देख-रेख में रहना पड़ता है.

ट्रांसप्लाट के बाद रखें ध्यान

सर्जरी के बाद इन्फेक्शन होने की आशंका बढ़ जाती है, ऐसे में सावधानी बरतने की जरूरत है. अत: हाइजीन का ख्याल रखें.

सर्जरी के बाद पेट दर्द, बुखार, जुकाम आदि होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. सेल्फ मेडिकेशन न करें.

भोजन भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार लें.

क्या है डायलिसिस :

डायलिसिस ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किडनी का कार्य मशीन करती है. मरीज की किडनी फेल हो जाये और तुरंत ट्रांसप्लांट संभव नहीं हो, तो कुछ समय के लिए मरीज को डायलिसिस पर रखा जाता है. डायलिसिस के दौरान मरीज को काफी परहेज रखना होता है. डायलिसिस किडनी फेल्योर का ट्रीटमेंट नहीं होता, बल्कि अस्थायी किडनी का कार्य करता है.

ऐसे रखें किडनी को स्वस्थ :

ब्लड प्रेशर की नियमित जांच कराएं.

नियमित रूप से एक्सरसाइज करें.

डायबिटीज है तो शूगर नियंत्रित रखें.

धूम्रपान और शराब का सेवन न करें.

बातचीत व आलेख : कुलदीप तोमर

डॉ विनीत बंसल

सीनियर नेफ्रोलॉजिस्ट, सर्वोदय नेफ्रो सेंटर, दिल्ली

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