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Mimi Movie Review: हंसी के साथ-साथ आंखों में नमी की भी डिलीवरी करती है 'मिमी', पढ़ें पूरा रिव्यू

30 जुलाई को स्ट्रीम होने वाली फ़िल्म मिमी ऑनलाइन लीक हो गयी. जिसके बाद फ़िल्म को आनन फानन में रिलीज करना पड़ा. यह फ़िल्म 2011 में रिलीज राष्टीय पुरस्कार प्राप्त मराठी फिल्म मला आई वहायच का हिंदी रिमेक है.

By उर्मिला कोरी
Updated Date
Mimi Review
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फ़िल्म मिमी

निर्देशक- लक्ष्मण उतेकर

कलाकार- कृति शेनॉन,पंकज त्रिपाठी, सई ताम्हनकर, मनोज पाहवा,सुप्रिया पाठक और अन्य

प्लेटफार्म- जियो फिल्म्स और नेटफ्लिक्स

रेटिंग -तीन

Mimi Movie Review: फ़िल्म पायरेसी को रोकने और इंडस्ट्री को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए सूचना प्रसारण मंत्रालय ने कई सख्त नियम बनाए हैं लेकिन इसके बावजूद फिल्मों की पायरेसी रुकने का नाम नहीं ले रही है. इसका ताजा उदाहरण फ़िल्म मिमी बनी है. 30 जुलाई को स्ट्रीम होने वाली ये फ़िल्म ऑनलाइन लीक हो गयी. जिसके बाद फ़िल्म को आनन फानन में रिलीज करना पड़ा. यह फ़िल्म 2011 में रिलीज राष्टीय पुरस्कार प्राप्त मराठी फिल्म मला आई वहायच का हिंदी रिमेक है.

फ़िल्म की कहानी राजस्थान की रहने वाली मिमी (कृति सेनन) की है. जो पेशे से एक डांसर है. जिसका सपना बॉलीवुड में अभिनेत्री बनने का है. वो मुम्बई जाने के लिए पैसे जमा कर रही है. इसी बीच ड्राइवर भानु ( पंकज त्रिपाठी) मिमी को एक अमेरिकन दंपति के बच्चे की सरोगेट मां बनने का आफर देता है और ये भी बताता है कि उसे इसके लिए 20 लाख रुपए मिलेंगे.

अपने सपनों को पूरा करने के लिए मिमी तैयार हो जाती है. मिमी प्रेग्नेंट भी हो जाती है. सबकुछ ठीक चल रहा होता है अचानक डॉक्टर अमेरिकी दंपति को बताती है कि बच्चा गर्भ में ही डाउन सिंड्रोम की बीमारी से ग्रसित हो गया है. अमेरिकी दंपति बच्चा लेने से इंकार कर देते हैं और बच्चे को एबॉर्शन करने को कह बिना मिमी से मिले ही अमेरिका चले जाते हैं और यही से असल कहानी शुरू होती है.

मिमी बच्चे को जन्म देने का फैसला करती है. जिसमें उसकी सहेली शमा (सईं) और ड्राइवर भानु उसका साथ देते हैं. मिमी एक एकदम स्वस्थ और गोरे बच्चे को जन्म देती है. मिमी अपने सपनों को भूलकर अपने बेटे के लिए जीने का फैसला करती है. सबकुछ ठीक चल रहा होता है कि चार सालों बाद अमेरिकी दंपति अपने बेटे को वापस लेने के लिए आ जाते हैं. अपने बेटे को पाने के लिए वो मिमी को कोर्ट में जाने की धमकी देते हैं. मिमी क्या अपने बेटे को अमेरिकी दंपति को दे देगी. आगे की कहानी वही है.

फ़िल्म का आधार सरोगेसी है. कई विदेशी दंपति सरोगेसी के बाद भारत से अपने बच्चे को नहीं लेकर गए ऐसे ही भाग गए. फ़िल्म में इस बात का जिक्र ज़रूर है, लेकिन स्क्रीनप्ले सरोगेसी की इस बहस में नहीं उलझती है बल्कि मानवीय पक्ष को सामने लेकर आती है. मां बाप बनने के लिए बच्चा पैदा करना ज़रूरी नहीं है और मां बाप होने के लिए बच्चा आपका ही हो ये भी ज़रूरी नहीं है.

फ़िल्म की कहानी इमोशनल है लेकिन कहानी का ट्रीटमेंट हल्का फुल्का रखा गया है. जिससे यह फ़िल्म आपको पूरे समय हंसती गुदगुदाती रहती है लेकिन यही बात इस फ़िल्म को कमज़ोर भी कर गयी है. जेहन में ये सवाल आता है कि मिमी की कहानी राजस्थान के छोटे से शहर से है ऐसे में एक कुंवारी लड़की के मां बनने पर परिवार और समाज का विरोध क्यों नहीं शामिल किया गया है.

सभी मां बच्चे को सिर आंखों पर बिठा लेते हैं, जो हकीकत से कोसों दूर लगता है. बेटे राज के साथ मिमी की बॉन्डिंग को थोड़ा कहानी में थोड़े ठहराव के साथ दिखाने की ज़रूरत थी. जो जल्दीबाजी में समेट दिया गया है. फ़िल्म के इन पहलुओं पर थोड़ा ध्यान दिया जाता तो मिमी एक सशक्त फ़िल्म बन सकती थी. स्क्रीनप्ले की इन खामियों के बावजूद फ़िल्म पूरे समय आपको खुद से जोड़े रखती है. इसका श्रेय फ़िल्म के संवाद को ही जाता है.

अभिनय की बात करें तो यह अभिनेत्री कृति के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण किरदार था. जिसे उन्होंने परदे पर पूरी शिद्दत के साथ उकेरा है फिर चाहे अपने किरदार के लिए 15 किलो वजन बढ़ाना हो या परदे पर एक लड़की से मां बनने की पूरी जर्नी के दर्द,खुशी हर इमोशन को जीना रहा हो. यह कृति के अब तक के करियर की लैंडमार्क फ़िल्म कही जा सकती है.

पंकज त्रिपाठी किसी भी फ़िल्म में हो. रोल चाहे कोई भी हो वो अपने शानदार अभिनय और संवाद अदायगी से ध्यान खींचते ही है. इस फ़िल्म में भी वो एक बार फिर से छा गए हैं. सई भी अपनी भूमिका में जमी हैं तो मनोज पाहवा और सुप्रिया पाठक सहित हर छोटा बड़ा किरदार फ़िल्म को अपने अभिनय से मजबूती देता है. फ़िल्म की कास्टिंग इसकी एक अहम यूएसपी है.

फ़िल्म का गीत संगीत ज़रूर औसत रह गया है. ए आर रहमान का नाम जुड़ा होने की वजह से उम्मीदें ज़्यादा थी लेकिन वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं. परम सुंदरी और सोन चिरैया गाने थोड़े ठीक बनें हैं. फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी उम्दा है. राजस्थान के एक छोटे शहर को स्क्रीन पर अच्छे से कैद किया गया है.

कुलमिलाकर स्क्रीनप्ले की कुछ खामियों के बावजूद यह फैमिली एंटरटेनर मनोरंजन करने के साथ साथ दिल को भी छू जाती है. यह फ़िल्म सभी को देखनी चाहिए.

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