कोटा में फंसी बंगाल की छात्रा की आपबीती : लॉकडाउन में खाने के पड़ गये थे लाले, अब लौटने की बात सुन मिला सुकून

Author : AmleshNandan Sinha Published by : Prabhat Khabar Updated At : 30 Apr 2020 4:54 PM

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कोरोना के कहर के बाद शुरू हुए लॉकडाउन में राजस्थान के कोटा में बिहार, झारखंड व अन्य राज्यों की तरह ही बंगाल के भी हजारों स्टूडेंट्स फंस गये थे. ज्यादातर मेडिकल व इंजीनियरिंग की कोचिंग करने गये थे. लॉकडाउन से ऐसे स्टूडेंट्स की मुश्किलें काफी बढ़ गयीं. कोटा में फंसे केवल विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि उनके अभिभावक व परिजन भी वैसी ही मुश्किलों और मजबूरी का सामना कर रहे थे. इसी बीच राज्य सरकार की पहल पर कोटा में फंसे विद्यार्थियों को वापस बंगाल लाया जा रहा है. इससे स्टूडेंट्स में काफी खुशी है. इन्हीं में से कोलकाता की इशिता जायसवाल भी एक हैं.

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कोलकाता : कोरोना के कहर के बाद शुरू हुए लॉकडाउन में राजस्थान के कोटा में बिहार, झारखंड व अन्य राज्यों की तरह ही बंगाल के भी हजारों स्टूडेंट्स फंस गये थे. ज्यादातर मेडिकल व इंजीनियरिंग की कोचिंग करने गये थे. लॉकडाउन से ऐसे स्टूडेंट्स की मुश्किलें काफी बढ़ गयीं. कोटा में फंसे केवल विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि उनके अभिभावक व परिजन भी वैसी ही मुश्किलों और मजबूरी का सामना कर रहे थे. इसी बीच राज्य सरकार की पहल पर कोटा में फंसे विद्यार्थियों को वापस बंगाल लाया जा रहा है. इससे स्टूडेंट्स में काफी खुशी है. इन्हीं में से कोलकाता की इशिता जायसवाल भी एक हैं.

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लॉकडाउन के दौरान के हालात के बारे में प्रभात खबर के प्रतिनिधि अमित शर्मा से बातचीत करते हुए इशिता और उसके पिता जितेंद्र जायसवाल ने कई जानकारियां दीं. इशिता कोलकाता के मानिकतला के चलता बागान की है. निशा पिछले वर्ष जुलाई में नीट की तैयारी के लिए कोटा गयी थी. उसने अपना दाखिला कोटा के एलेन इंस्टीट्यूट में कराया. शुरुआती तीन महीने वह इंस्टीट्यूट के हॉस्टल में रह रही थी, लेकिन खानपान में परेशानी हुई तो वह अपनी मां के साथ वहीं एक फ्लैट में रहने लगी थी.

इशिता ने बताया कि दाखिले के बाद सब ठीक चल रहा था, लेकिन कोरोना का प्रकोप बढ़ने के बाद लॉकडाउन ने मुश्किलें बढ़ा दीं. कुछ दिनों तक तो स्टोर की हुई भोजन सामग्री से काम चला, लेकिन कमी होने के बाद परेशानी बढ़ने लगी. खाद्य सामग्री खरीदने के लिए बाहर निकल नहीं पा रहे थे. पुलिस लौटा देती थी. महिलाओं को बाजार जाने में ज्यादा समस्या होने लगी. ड्यूटी पर तैनात पुलिसवाले महिलाओं को देखते ही कुछ सुने बगैर ही घर वापस भेज देते थे. ऐसे में रुपये होने के बावजूद रोटियां जुटाना मुश्किल हो गया था. जीने के लिए खाने की मजबूरी और भोजन जुटाने की दिक्कत नहीं होती, तो कोटा में कोई परेशानी नहीं होती.

वहां स्थानीय प्रशासन से भी मदद नहीं मिल रही थी. घरों और हॉस्टल में ही बैठे रहने से समस्या जानेवाली नहीं थी. यही वजह है कि दूसरे राज्यों से कोटा आये विद्यार्थी अपने-अपने कोचिंग इंस्टीट्यूट से घर वापसी का प्रबंध कराने की मांग करने लगे. कई ने तो हॉस्टल में विरोध भी शुरू कर दिया. इंस्टीट्यूट प्रबंधन बार-बार यह कहता कि जब तक प्रशासन नहीं चाहेगा, वे उनकी घर वापसी के लिए कुछ नहीं कर सकते. इशिता को पता था कि कोलकाता में उनके परिजन भी उसकी दिक्कतों से परेशान थे. वे एक अलग ही लड़ाई लड़ रहे थे. वैसे इशिता यह भी बताती हैं कि भोजन की समस्या से जूझ रहे विद्यार्थियों को इंस्टीट्यूट प्रबंधन की ओर से बाद में थोड़ी मदद अवश्य मिली.

सीएम को ट्वीट कर मदद की लगायी गुहार

कोटा में फंसे विद्यार्थी जहां कई तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे थे, वहीं बंगाल में रह रहे उनके अभिभावक व परिजन अपने बच्चों की वापसी के लिए लगातार कोशिश कर रहे थे. इशिता के पिता जितेंद्र बताते हैं कि कोटा में फंसीं बेटी और पत्नी को खाने के लाले भी पड़ गये थे. कोलकाता में रह रहा उनका परिवार भी बेटी-पत्नी की कठिनाइयों से परेशान था. उनकी घर वापसी के लिए उन्होंने 20 अप्रैल और उसके बाद भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ट्वीट कर मदद की गुहार लगायी. उनके मुताबिक 24 अप्रैल को ट्वीटर पर उन्हें मदद का आश्वासन मिला. इशिता जिस इंस्टीट्यूट में कोचिंग ले रही है, वहां के प्रबंधन की ओर से भी काफी मदद मिली.

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राज्य को तीन जोन में बांट कर भेजे जा रहे स्टूडेंट्स

राज्य सरकार की कोशिश के बाद कोटा में फंसे विद्यार्थियों की घर वापसी के मार्ग खुल गये. इंस्टीट्यूट प्रबंधन की ओर से बताया गया कि प्रशासन सड़क मार्ग से उन्हें उनके राज्य को भेजेगा. बुधवार की सुबह इंस्टीट्यूट का ही एक वाहन कोटा स्थित उस फ्लैट तक पहुंचा, जहां श्री जायसवाल की पत्नी और बेटी रह रही थीं. फिर दोनों को जांच के लिए ले जाया गया. मेडिकल जांच के बाद स्टूडेंट्स व उनके अभिभावकों को बंगाल भेजने के लिए कोलकाता, सिलीगुड़ी व आसनसोल जोन में बांट दिया गया. कोलकाता के लिए बुधवार को अपराह्न दो बजे कोटा से रवाना हुई है. आसनसोल जोन के लिए उसी दिन दोपहर बाद तीन बजे और सिलीगुड़ी जोन के लिए शाम चार बजे बसें रवाना होने की बात कही गयी. हालांकि बस चलने के कई घंटों बाद भी खाने को कुछ नहीं मिला, जिससे सभी परेशान रहे.

रास्ते में भी हो रही खाने की समस्या

लॉकडाउन के बाद कोटा में फंसे विद्यार्थियों की घर वापसी तो जरूरी है, लेकिन यात्रा के दौरान भी समस्या विद्यार्थियों का पीछा नहीं छोड़ रही है. सफर के दौरान विद्यार्थी खाने को तरस रहे हैं. आरोप है कि कई घंटों बाद भी खाने-पीने का प्रबंध नहीं किया गया है, हालांकि अभी कई घंटे का सफर बाकी है.

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AmleshNandan Sinha

लेखक के बारे में

By AmleshNandan Sinha

अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.

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