दुनिया के शेयर बाजार भाग रहे हैं, अच्छी जीडीपी के बावजूद भारत का बाजार क्यों नहीं भाग रहा है?
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वैश्विक तेजी के बीच भारतीय बाजार पिछड़ रहा है. महंगे वैल्यूएशन और रुपये की गिरावट का क्या असर पड़ा है? जानिए विस्तार से.
लेखक - शिवपूजन सिंह
शेयर बाजार का जिक्र जब भी आता है तो आम आदमी की नजर में यह पैसे गंवाने की सबसे मुफीद जगह मानी जाती है. दूसरी तरफ जो इसे जानता और समझता है, उनकी दृष्टि में बेशुमार दौलत बनाने की इससे बेहतर जगह हो ही नहीं सकती. सच्चाई भी यही है, अगर किसी ने अच्छी और सही जगह निवेश कर दिया और समय तथा धैर्य को साथी बना लिया, तो फिर दौलतमंद बनने से भी कोई नहीं रोक सकता.
भारतीय शेयर बाजार ने निवेशकों को बेपनाह धन दिया है. ऐसे कई निवेशक हैं जिन्होंने दौलत और शोहरत बेशुमार बनाई है. लिहाजा शेयर बाजार ऐसी जगह है, जहाँ इसे जानने वाले लोग आबाद और न जानने वाले बर्बाद होते हैं.
मौजूदा वक्त में भारतीय शेयर बाजार की दास्तान उतनी बेहतर नहीं है. पिछले दो साल से हमारा 50 शेयर्स का सूचकांक निफ्टी 26000 और 23000 अंक के बीच ही झूल रहा है. यहां पैसा नहीं बना है बल्कि नुकसान हुआ है. हालात इस कदर हो गए हैं कि निवेशक परेशान और हैरान हैं कि भला भारतीय बाजार को किसकी नजर लग गई. अच्छी बात यह है कि 2026-27 की पहली तिमाही की जीडीपी भी 7.8% के साथ बेहतर आई है. इसके बावजूद बाजार आखिर बेबस और बेजार क्यों है? आखिर असली वजह क्या है? भारत के बाजार की तुलना में दक्षिण कोरिया, ताइवान और अमेरिकी बाजार का माहौल मुफीद और बेहतरीन भाग रहा है और निवेशकों को मुनाफा दिलवा रहा है.
लाजमी है कि सवाल उठेंगे कि भला क्या बात हो गई जो ऐसी काली छाया भारतीय बाजार पर ही मंडराने लगी है. चलिए समझते हैं कि इसके क्या कारण और कमियां हैं.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमत ने बिगाड़ा खेल
मिडिल ईस्ट की जंग की काली कथा ने कच्चे तेल में ऐसी आग लगाई, जिससे भारत झुलस गया. तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. ईरान का इजराइल और अमेरिका से युद्ध के बाद इसका अच्छा खासा दबाव पड़ा. होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के बंद होने से तेल का आयात प्रभावित हुआ, जिसके चलते महंगा तेल लाना पड़ा. कच्चे तेल की खपत भारत में ज्यादा है, इसके चलते अन्य देशों की तुलना में इसका असर भारत पर ज्यादा पड़ता है. सच्चाई यह भी है कि यहां बहुत कुछ तेल पर ही निर्भर है.
विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी बनी बड़ी वजह
यह सच्चाई है कि भारतीय बाजार की दिशा तय करने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का अहम किरदार रहता है. उनके पैसे वापस निकालने से बाजार पर बड़ा फर्क पड़ा. लाजमी है कि अगर वे पैसा निकालेंगे तो बाजार मंदा पड़ेगा और गिरेगा. अगस्त में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में लगभग 3.1 अरब डॉलर का निवेश किया था, लेकिन सितंबर के पहले सप्ताह में उन्होंने करीब ₹7,443 करोड़ की निकासी की, यानी शेयर्स बेच दिए. विदेशी निवेशकों की बेरुखी की वजह महंगा कच्चा तेल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और मजबूत डॉलर जैसे बड़े कारण हैं. जब अमेरिका में बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न लुभावना और आकर्षक होता है, तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर अपेक्षाकृत सुरक्षित अमेरिकी परिसंपत्तियों की तरफ जाते हैं, क्योंकि उन्हें किसी भी सूरत में अपने पैसे का मुनाफा चाहिए.
पहले से ही महंगा था भारतीय बाजार
भारतीय शेयर बाजार के लिए एक बात गौर करने वाली यह भी है कि यह हाई वैल्यूएशन पर है, यानी यहां कई अच्छे शेयर लंबे समय से ऊंचे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं. दरअसल, हालिया विश्लेषणों में भारतीय शेयरों के मूल्यांकन को कई दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में महंगा बताया गया है. लाजमी है कि ऐसी सूरत में जब बाजार महंगा हो और उसके सामने तेल, ब्याज दर, रुपये तथा वैश्विक तनाव जैसी चुनौतियां खड़ी हों, तो निवेशक मुनाफावसूली करना पसंद करते हैं.
कमजोर रुपया बना बाजार के लिए चुनौती
भारतीय रुपया हाल ही में 95 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के पार चला गया. दरअसल, बढ़ते तेल आयात और डॉलर की मांग ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है. कमजोर रुपया एक तरफ निर्यातकों के लिए कुछ फायदे ला सकता है, लेकिन दूसरी तरफ महंगे आयात, विशेषकर तेल से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है. अगर महंगाई बढ़ती है, तो ब्याज दरों में नरमी की गुंजाइश भी कम हो सकती है. इसका असर शेयर बाजार के मूल्यांकन पर पड़ता है.
एआई (AI) के आगमन ने बदली बाजार की सूरत
एआई के आगमन ने बहुत कुछ बदल दिया है. इससे दुनिया के शेयर बाजार भी अछूते नहीं रहे. दरअसल, पिछले कुछ समय में विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी कंपनियों से जुड़े बाजारों की ओर गया है. भारत में आईटी कंपनियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वैश्विक एआई निवेश की दौड़ में अमेरिका और कुछ एशियाई बाजारों को ज्यादा सीधा फायदा मिला है. इस कारण से भी वैश्विक निवेशक भारत की तुलना में अमेरिका, ताइवान या दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों को ज्यादा आकर्षक मान रहे हैं.
भारत का बाजार कमजोर नहीं है
बेशक अभी वक्त और माहौल भारतीय बाजार के लिए माकूल और साजगार न हो, लेकिन यह कहना कि हिंदुस्तान का बाजार कमजोर और कमतर है, यह बिल्कुल बेमानी, बेतुका और बकवास होगा. ऐसे हालात दुनिया के हर बाजार में आते रहते हैं और आते रहेंगे.
अगस्त में विदेशी निवेशकों की अच्छी खरीदारी के बावजूद निफ्टी और सेंसेक्स में खास तेजी नहीं आई, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप में बेहतर प्रदर्शन देखने को मिला. इसका मतलब है कि बाजार के अंदर पूरी तरह से निराशा नहीं बल्कि भरपूर जान है, क्योंकि पैसा अलग-अलग क्षेत्रों और कंपनियों में घूम रहा है.
दुनिया के शेयर बाजारों की तुलना में भारत का बाजार इस समय एक साथ कई मोर्चों पर दबाव का सामना कर रहा है. लिहाजा ऐसे हालात में धैर्य बनाए रखना जरूरी है। हकीकत यह है कि शेयर बाजार भविष्य की उम्मीदों, जोखिमों और कीमतों का मिश्रण होता है. यदि तेल की कीमतें सामान्य होती हैं, वैश्विक तनाव कम होता है, विदेशी निवेश लौटता है और भारतीय कंपनियों की कमाई उम्मीद के मुताबिक बढ़ती है, तो भारतीय बाजार फिर से तेज दौड़ने लगेगा. लिहाजा निराशा की बजाय आशा का दामन पकड़ना ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि समय एक जैसा नहीं रहता और परिवर्तन ही इसका नियम है.
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