Coin Making Cost: आधा भारत नहीं जानता 1 रुपये का सिक्का कितने में बनता है, कीमत जानकर पकड़ लेंगे माथा
नोटों और सिक्कों का ढेर (Photo: Freepik)
Coin Making Cost: 1 रुपये के सिक्के की असली लागत जानकर आप हैरान रह जाएंगे. जानिए सरकार को सिक्के बनाने में कितना खर्च आता है और नोटों की छपाई कितनी सस्ती है.
Coin Making Cost: क्या आपने कभी सोचा है कि जेब में रखे जिस 1 रुपये के सिक्के से आप टॉफी या चॉकलेट खरीदते हैं, उसे बनाने में सरकार की जेब से कितना पैसा खर्च होता है? पहली नजर में लगता है कि एक रुपये की चीज को बनाने में कुछ पैसे ही लगते होंगे, लेकिन सच यह नहीं है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा एक RTI के जवाब में दी गई जानकारी के मुताबिक, 1 रुपये का एक सिक्का तैयार करने में सरकार को 1.11 रुपये का खर्च उठाना पड़ता है. यानी हर सिक्के की ढलाई पर सरकार को सीधे 11 पैसे का घाटा होता है.
आइए समझते हैं कि भारत की टकसालों (Mints) में सिक्के और नोट कैसे तैयार होते हैं और घाटे के बावजूद सरकार सिक्के क्यों बनाती रहती है.
सिक्कों को बनाने में कितना खर्च आता है?
सिक्कों के निर्माण का जिम्मा भारत सरकार का होता है, जिन्हें मुख्य रूप से मुंबई और हैदराबाद जैसी सरकारी टकसालों में ढाला जाता है. सिर्फ 1 रुपये का ही नहीं, बल्कि अन्य सिक्कों की लागत का गणित भी दिलचस्प है:
- 1 रुपये का सिक्का: लागत 1.11 रुपये (मुनाफा/घाटा: -11 पैसे)
- 2 रुपये का सिक्का: लागत 1.28 रुपये
- 5 रुपये का सिक्का: लागत 3.69 रुपये
- 10 रुपये का सिक्का: लागत 5.54 रुपये
1 रुपये का सिक्का स्टेनलेस स्टील से बनाया जाता है. इसका वजन 3.76 ग्राम, व्यास 21.93 मिमी और मोटाई 1.45 मिमी होती है.
नोटों की छपाई में सरकार को कितना फायदा होता है?
सिक्कों के मुकाबले कागजी नोटों की छपाई सरकार और RBI के लिए बेहद फायदे का सौदा साबित होती है. जहां 1 रुपये के नोट और सिक्कों का नियंत्रण सरकार के पास है, वहीं 2 रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोट छापने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक (RBI) संभालता है.
नोटों की छपाई की लागत का हिसाब इस प्रकार है:
| नोट का मूल्य | 1000 नोट छापने की लागत | प्रति नोट लागत |
| 100 रुपये | 1,770 रुपये | 1.77 रुपये |
| 200 रुपये | 2,370 रुपये | 2.37 रुपये |
| 500 रुपये | 2,290 रुपये | 2.29 रुपये |
इसका सीधा मतलब यह है कि बाजार में चलने वाले 500 रुपये के एक नोट को छापने में महज 2.29 रुपये का खर्च आता है, जबकि उसकी असली वैल्यू पूरे 500 रुपये होती है.
नुकसान के बावजूद सरकार सिक्के क्यों बनाती है?
अब सवाल उठता है कि जब 1 रुपये का सिक्का बनाने में नुकसान हो रहा है, तो सरकार इसे बनाना बंद क्यों नहीं कर देती?
इसके पीछे एक दूरदर्शी और रणनीतिक सोच काम करती है:
- लंबी उम्र और मजबूती: कागजी नोट कुछ ही सालों में गल-फट जाते हैं और उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है. इसके विपरीत, स्टेनलेस स्टील से बने सिक्के दशकों तक खराब नहीं होते और सालों-साल चलन में बने रहते हैं.
- स्थिरता: सिक्के सालों-साल चलते हैं, जिससे देश का कैश (पैसा) सिस्टम मजबूत और स्थिर बना रहता है.
ये भी पढ़ें: Bank Strike September 2026: 11 सितंबर से बैंक बंद, आज ही निपटा लें चेक, कैश और पासबुक का काम
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए