Tribalpedia Ecuador: जंगल को अगर अदालत में आवाज मिल जाए तो क्या होगा?
जंगल की भी एक आवाज़ होती है, बस उसे सुनने वाला कानून चाहिए
Ecuador ने प्रकृति को संवैधानिक अधिकार देकर दुनिया को नई दिशा दिखाई. यह बदलाव किसी अदालत में नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन-दर्शन से निकला. क्या भारत भी इस सोच से पर्यावरण संरक्षण का नया मॉडल विकसित कर सकता है?
जोहार. आज है 7 अगस्त.
दुनिया में जंगलों को बचाने के लिए आज तक कानून बनते रहे.
लेकिन क्या कभी किसी जंगल, नदी या पहाड़ को भी इंसानों की तरह अधिकार मिल सकते हैं?
यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन दक्षिण अमेरिकी देश Ecuador ने 2008 में यही किया.
उसने अपने संविधान में प्रकृति को भी अधिकार दे दिए.
यह केवल कानून का बदलाव नहीं था.
यह उस indigenous सोच की जीत थी, जो सदियों से कहती रही है कि मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं, उसका हिस्सा है.
आदिवासी समाज के लिए जंगल 'संपत्ति' नहीं, परिवार है
एक आदिवासी बुजुर्ग से अगर पूछा जाए कि जंगल किसका है, तो वह शायद जवाब देगा-
जंगल हमारा नहीं, हम जंगल के हैं.
यही सोच आधुनिक कानून से बिल्कुल अलग है.
आधुनिक व्यवस्था जंगल को संसाधन मानती है, जबकि आदिवासी समाज उसे जीवित अस्तित्व समझता है.
इसी सोच को पहली बार संवैधानिक भाषा मिली, जब इक्वाडोर ने प्रकृति के अधिकारों को स्वीकार किया.
तीन सोच, एक संविधान
Ecuador में यह बदलाव आसानी से नहीं आया. इसके पीछे तीन अलग-अलग विचारधाराएं थीं
- आदिवासी समुदाय, जो प्रकृति को जीवन मानते हैं.
- पर्यावरणविद, जो जलवायु परिवर्तन और संरक्षण की बात करते हैं.
- पश्चिमी विकास मॉडल, जो प्रकृति को संसाधन मानता है.
इन तीनों के बीच लंबी बातचीत हुई. आखिरकार आदिवासी संगठनों और पर्यावरण समूहों की साझेदारी ने इतिहास रच दिया.

जंगल की भाषा को कानून की भाषा में बदलना
इस पूरी प्रक्रिया को विशेषज्ञ अनुवाद कहते हैं.
लेकिन यह केवल शब्दों का अनुवाद नहीं था.
यह उस जीवन-दर्शन का अनुवाद था, जिसमें पेड़, नदी, पहाड़ और जानवर केवल प्राकृतिक वस्तुएं नहीं, बल्कि जीवन के साथी हैं.
संविधान ने पहली बार माना कि प्रकृति को भी जीने, पुनर्जीवित होने और अपने प्राकृतिक चक्र बनाए रखने का अधिकार है.
ईगल और कोंडोर की कहानी
अमेजन के आदिवासी समाज में एक पुरानी कथा सुनाई जाती है.
एक समय था जब ईगल और कोंडोर साथ उड़ते थे.
फिर दोनों अलग हो गए.
ईगल ताकत, नियंत्रण और औद्योगिक दुनिया का प्रतीक बन गया
कोंडोर प्रकृति, संतुलन और सामूहिक जीवन का.
कहानी कहती है कि 500 वर्षों बाद दोनों फिर मिलेंगे और दुनिया नया रास्ता चुनेगी.
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रकृति के अधिकार उसी मिलन की शुरुआत हैं.
पर्यावरण कानून और प्रकृति के अधिकार में फर्क
मान लीजिए किसी पहाड़ी को खनन कंपनी तोड़ना चाहती है.
वहां कोई इंसान नहीं रहता.
नदी भी नहीं है.
पारंपरिक पर्यावरण कानून कह सकता है कि नुकसान सीमित है.
लेकिन अगर वही पहाड़ी किसी दुर्लभ जीव का आखिरी घर हो?
प्रकृति के अधिकार कहते हैं कि उस जीव और उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी जीने का अधिकार है.
यहीं से दोनों सोच अलग हो जाती हैं.

आदिवासियों से पूछना काफी नहीं, उन्हें समझाना भी जरूरी
खनन जैसी परियोजनाओं से पहले आदिवासी समुदायों से सलाह लेना अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा है.
लेकिन अक्सर यह केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है.
बैठक होती है.
कागज पर हस्ताक्षर हो जाते हैं.
लेकिन समुदाय को तकनीकी भाषा समझ ही नहीं आती.
कई लोग स्थानीय भाषा बोलते हैं, जबकि दस्तावेज स्पेनिश या कानूनी भाषा में होते हैं.
यानी संवाद होता है, लेकिन समझ नहीं बनती.
विकास की कहानी कौन लिखता है?
आज खनन कंपनियां कहती हैं कि विकास का रास्ता खनन से होकर गुजरता है.
रोजगार मिलेगा.
गरीबी घटेगी.
लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सवाल है-
क्या विकास का मतलब केवल ज्यादा खनन है?
या ऐसा विकास भी संभव है जिसमें जंगल, नदी और आदिवासी समाज साथ-साथ आगे बढ़ें?
Ecuador में यह बहस केवल खदानों की नहीं, बल्कि विकास की परिभाषा की बन चुकी है.
भारत के लिए क्या सीख?
भारत में भी सैकड़ों आदिवासी समुदाय सदियों से प्रकृति के साथ सहजीवन की परंपरा निभाते आए हैं.
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पूर्वोत्तर और मध्य भारत के अनेक समुदाय जंगल को केवल आर्थिक संपत्ति नहीं मानते.
जल, जंगल और जमीन उनके लिए पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार हैं.
ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया की चुनौती बन चुका है, आदिवासी ज्ञान केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की नीति भी बन सकता है.
प्रकृति को बचाना है तो उसकी भाषा भी समझनी होगी
इक्वाडोर का अनुभव बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल नए कानून बनाने से नहीं होगा.
इसके लिए उन समाजों को भी सुनना होगा, जिन्होंने हजारों वर्षों तक जंगलों के साथ संतुलित जीवन जिया है.
हो सकता है कि आने वाले समय में दुनिया के सबसे आधुनिक पर्यावरण कानून किसी बड़े विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि किसी छोटे आदिवासी गांव की लोक परंपरा से जन्म लें.
क्योंकि कभी-कभी भविष्य का रास्ता, अतीत की स्मृतियों से होकर गुजरता है.
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