पाकिस्तान ने सऊदी अरब से 'मक्का समझौते' किया, लेकिन जैसे ही बात यमन में लड़ने की आई, इस्लामाबाद पीछे हट गया!

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पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ, फोटो एक्स

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सऊदी पर हूती हमले के बाद ख्वाजा आसिफ ने मक्का पैक्ट का हवाला देते हुए कहा—'एक पर हमला, तीनों पर हमला.' लेकिन यमन में सैन्य कार्रवाई से पाकिस्तान की दूरी ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या इस्लामाबाद सिर्फ सऊदी को सुरक्षा का भरोसा दे रहा है, या वाकई युद्ध में उतरने की तैयारी है?

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यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने नए मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट की पहली बड़ी परीक्षा सामने ला दी है.

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8 सितंबर को हूतियों ने सऊदी अरब के अबहा, खमिस मुशैत, जिजान और नजरान जैसे इलाकों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाया. हमलों में 70 से ज्यादा लोग घायल हुए और तेल प्रतिष्ठानों को भी नुकसान पहुंचा.

इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बेहद कड़ा संदेश दिया. लेकिन अब सवाल यह है कि क्या इस बयान का मतलब पाकिस्तानी लड़ाकू विमान यमन में उतरना है? फिलहाल जवाब है- नहीं.

ख्वाजा आसिफ का सख्त संदेश, विदेश मंत्रालय की नरम लाइन

आसिफ ने कहा कि मक्का डिफेंस पैक्ट के तहत किसी एक सदस्य पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि 7 अगस्त 2026 को मक्का में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने यह समझौता किया था. इसमें किसी एक देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में सामूहिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता जताई गई है.

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है.

सामूहिक सुरक्षा का मतलब यह जरूरी नहीं कि हर हमले के जवाब में दूसरे देश की जमीन पर तुरंत सैन्य हमला शुरू कर दिया जाए.

10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि मक्का समझौते के तहत फिलहाल किसी सैन्य कार्रवाई पर चर्चा नहीं हुई है. विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब की संप्रभुता और सुरक्षा के समर्थन में है, लेकिन यमन में शांति और कूटनीति को प्राथमिकता दी जा रही है.

अगले दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने और स्पष्ट किया कि यमन के अंदर हूती ठिकानों पर पाकिस्तानी हमले फिलहाल सिर्फ एक 'hypothetical situation' हैं.

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (Photo/X)
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (Photo/X)

2015 का यमन युद्ध: पाकिस्तान फिर उसी मोड़ पर

आज की कहानी समझने के लिए 2015 को याद करना जरूरी है.

जब सऊदी अरब ने हूतियों के खिलाफ यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था, तब रियाद ने पाकिस्तान से फाइटर जेट, युद्धपोत और सैनिक मांगे थे. ख्वाजा आसिफ तब भी रक्षा मंत्री थे. उन्होंने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा का आश्वासन दिया, लेकिन पाकिस्तान को किसी ऐसे युद्ध में शामिल करने से इनकार किया जो मुस्लिम दुनिया के भीतर सांप्रदायिक संघर्ष को बढ़ा सकता था.

इसके बाद पाकिस्तान की संसद ने यमन युद्ध में सैन्य रूप से शामिल नहीं होने का फैसला किया.

यानी आसिफ की भाषा नई नहीं है- सऊदी सुरक्षा के लिए समर्थन, लेकिन यमन की जमीन पर सीधे युद्ध से दूरी.

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पाकिस्तान ईरान को क्यों नहीं नाराज करना चाहता?

इस रणनीति के पीछे सिर्फ सैन्य गणित नहीं, भूगोल भी है.

पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है. दूसरी ओर, सऊदी अरब उसके लिए महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है. ऐसे में इस्लामाबाद के लिए दोनों पक्षों के बीच पूरी तरह किसी एक खेमे में जाना महंगा पड़ सकता है.

इसके अलावा पाकिस्तान पहले से ही भारत, अफगान सीमा, TTP और बलूचिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है. किसी नए विदेशी युद्ध में बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधन लगाना उसके लिए आसान विकल्प नहीं है.

और सबसे महत्वपूर्ण- यमन युद्ध पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव को भी बढ़ा सकता है. 2015 में खुद आसिफ ने इस खतरे का उल्लेख किया था.

तो फिर मक्का पैक्ट का मतलब क्या है?

यहीं इस पूरे घटनाक्रम का असली रणनीतिक संदेश छिपा है.

मक्का समझौता पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच साझा deterrence यानी संभावित हमलावर की लागत बढ़ाने की कोशिश है. समझौते को आधिकारिक तौर पर किसी देश के खिलाफ नहीं बताया गया है और पाकिस्तान ने इसे क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता के लिए रक्षात्मक समझौता कहा है.

इसलिए पाकिस्तान के लिए फिलहाल सबसे उपयोगी रणनीति है- सऊदी को सुरक्षा का भरोसा देना, लेकिन यमन के अंदर युद्ध का हिस्सा न बनना.

Yemen Crisis Saudi Arabia UAE Backed Forces

यही वजह है कि ख्वाजा आसिफ का सख्त बयान और विदेश मंत्रालय की सावधानी- दोनों एक साथ दिखाई दे रहे हैं.

असल परीक्षा: बयान नहीं, PAF के विमान होंगे

आखिरकार इस पूरे विवाद की असली कसौटी किसी मंत्री का बयान नहीं होगी.

सवाल यह होगा कि क्या पाकिस्तान यमनी हवाई क्षेत्र में अपने लड़ाकू विमान भेजता है? क्या पाकिस्तानी सेना यमन में हूती ठिकानों पर कार्रवाई करती है? या फिर उसकी भूमिका सऊदी सीमा की सुरक्षा, प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक सहयोग तक सीमित रहती है?

फिलहाल उपलब्ध संकेत दूसरे विकल्प की ओर इशारा करते हैं. पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ खड़ा दिखना चाहता है, लेकिन यमन की जमीन पर युद्ध लड़कर ईरान, घरेलू सांप्रदायिक समीकरण और अपनी सीमित सैन्य क्षमता को एक साथ जोखिम में डालना नहीं चाहता.

यानी मक्का पैक्ट की आवाज तेज है, लेकिन पाकिस्तान के जेट अभी रनवे पर ही हैं.

यह लेख प्रियांशी त्रिपाठी (डायरेक्टर, Geostate.Org) ने लिखा है.

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