न China का camp, न America का: BRICS में क्या हासिल करेगा दिल्ली?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पीटीआई
Xi Jinping और Vladimir Putin एक मंच पर होंगे, लेकिन असली सवाल BRICS का नहीं, भारत की कूटनीति का है. बदलती वैश्विक राजनीति, China के बढ़ते प्रभाव और पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत के सामने BRICS को ठोस परिणाम देने वाले मंच में बदलने की बड़ी चुनौती है.
12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है. पश्चिम एशिया में युद्ध, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, वैश्विक व्यापार में अस्थिरता और विकासशील देशों की बढ़ती वित्तीय जरूरतों के बीच BRICS का विस्तार भी हो चुका है.
ऐसे में भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सम्मेलन कितना सफल रहता है, बल्कि यह है कि क्या भारत BRICS को एक प्रभावशाली राजनीतिक मंच से आगे ले जाकर व्यावहारिक सहयोग का संस्थान बना सकता है?
Xi-Putin एक मंच पर, भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक क्षण
इस सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी है.
जिनपिंग करीब सात वर्षों बाद भारत की यात्रा कर रहे हैं.
पुतिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ही मंच पर होंगे.
यह तस्वीर भारत की विदेश नीति की एक अहम विशेषता दिखाती है. भारत एक तरफ QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है, तो दूसरी तरफ BRICS में चीन और रूस के साथ भी बैठता है. रूस के साथ ऊर्जा संबंध बनाए रखते हुए भारत पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है.
यानी भारत किसी एक शक्ति-गुट में खुद को सीमित करने के बजाय strategic autonomy और multi-alignment की नीति पर आगे बढ़ रहा है.
BRICS एकजुट मंच है या अलग-अलग हितों का समूह?
BRICS का विस्तार इसकी ताकत भी है और चुनौती भी. इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और आर्थिक हितों वाले देश शामिल हैं. पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष ने इन देशों के बीच मौजूद मतभेदों को और स्पष्ट किया है.
ऐसे में हर बड़े वैश्विक मुद्दे पर साझा राजनीतिक रुख बनाना आसान नहीं होगा. भारत के लिए ज्यादा व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि BRICS को उन क्षेत्रों में आगे बढ़ाया जाए, जहां राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सहयोग संभव है- जैसे विकास वित्त, व्यापार, तकनीक, जलवायु और भुगतान व्यवस्था.
यहीं भारत की अध्यक्षता की असली परीक्षा शुरू होती है.
China के साथ व्यापार: अवसर भी, चुनौती भी
BRICS भारत के लिए आर्थिक अवसर लेकर आया है, लेकिन इसके साथ एक विरोधाभास भी है. समूह के साथ भारत का व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन व्यापार घाटा भी बढ़ा है. इसका सबसे बड़ा पहलू चीन के साथ आर्थिक संबंधों में दिखाई देता है.
भारतीय उद्योग कई विनिर्माण क्षेत्रों में चीन से आने वाले कलपुर्जों और intermediate goods पर निर्भर है. इसलिए BRICS के भीतर आर्थिक सहयोग बढ़ाना भारत के लिए उपयोगी है, लेकिन यह सहयोग ऐसी निर्भरता को और गहरा न करे- यह भी महत्वपूर्ण है.
इस अर्थ में BRICS भारत के लिए सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि आर्थिक निर्भरता का आईना भी है.
क्या BRICS डॉलर को चुनौती देगा?
BRICS की चर्चा अक्सर एक साझा मुद्रा या डॉलर के विकल्प के रूप में की जाती है. लेकिन दोनों को एक ही चीज मानना ठीक नहीं होगा.
साझा BRICS currency और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, या डिजिटल भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की कोशिशें अलग-अलग अवधारणाएं हैं. भारत के लिए फिलहाल अधिक व्यावहारिक लक्ष्य ऐसी भुगतान व्यवस्था विकसित करना हो सकता है, जो सीमा-पार लेनदेन को आसान बनाए और डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कुछ हद तक कम करे.
लेकिन इसका अर्थ डॉलर को अचानक खत्म करना नहीं है.

भारत की अपनी ताकत क्या है?
भारत BRICS में केवल एक सदस्य नहीं, बल्कि अपनी कुछ विशिष्ट क्षमताओं के साथ मौजूद है. Digital Public Infrastructure, तेज डिजिटल भुगतान और बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाओं का भारतीय अनुभव विकासशील देशों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है.
भारत न्यू डेवलपमेंट बैंक और स्थानीय मुद्रा में विकास वित्त जैसे मुद्दों को भी आगे बढ़ा सकता है. खासकर जलवायु परिवर्तन और बुनियादी ढांचे के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध कराना Global South के लिए महत्वपूर्ण है.
असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी
भारत की BRICS अध्यक्षता की सफलता का आकलन केवल शिखर सम्मेलन में जारी घोषणापत्र से नहीं किया जाना चाहिए. असली सवाल यह होगा कि सम्मेलन के बाद क्या ठोस संस्थागत व्यवस्था आगे बढ़ती है.
क्या विकास वित्त में वास्तविक लाभ मिलता है? क्या भुगतान और तकनीकी सहयोग जमीन पर उतरता है? क्या सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सहयोग की निरंतरता बनी रहती है?
BRICS में भारत की बड़ी परीक्षा यही है, क्या वह अलग-अलग हितों वाले देशों के इस बड़े समूह को केवल एक मंच बनाए रखेगा या उसे परिणाम देने वाली साझेदारी में बदल पाएगा?
नई दिल्ली में Xi और Putin की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन जरूर होगी. लेकिन भारत की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब इस मंच से निकली बातें आने वाले वर्षों में ठोस परिणामों में दिखाई दें.
Read More: Geopolitics अब सिर्फ UPSC का विषय नहीं! जानिए 9 Career Options
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए