उत्तर प्रदेश की चुनावी कहानी: 1951 से 2022 तक कैसे बदली सियासत, कौन-कौन बना मुख्यमंत्री

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1951 से 2022 तक कैसे बदली सियासत

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति देश की दिशा तय करती आई है। 1951-52 से 2022 तक कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर क्षेत्रीय दलों के उभार और BJP की मजबूत स्थिति तक, जानिए सत्ता समीकरणों में आए बड़े बदलाव।

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UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति देश की सियासत की दिशा तय करने में हमेशा अहम रही है. आजादी के बाद प्रदेश में पहला विधानसभा चुनाव 1951-52 में हुआ था. उस दौर में कांग्रेस का मजबूत प्रभाव था और गोविंद बल्लभ पंत ने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की कमान संभाली. इसके बाद कई दशकों तक कांग्रेस राज्य की राजनीति के केंद्र में रही. हालांकि, समय के साथ नए राजनीतिक दलों और सामाजिक समीकरणों के उभरने से यूपी की सियासत का स्वरूप तेजी से बदलता गया.

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कांग्रेस के दबदबे से गैर-कांग्रेसी राजनीति तक

1957 और 1962 के चुनावों में भी कांग्रेस का प्रभाव कायम रहा. लेकिन 1967 का विधानसभा चुनाव यूपी की राजनीति के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ. कांग्रेस बहुमत से दूर हुई और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. इसके बाद प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, दल-बदल और सत्ता परिवर्तन का दौर शुरू हुआ. 1967 के बाद कुछ ही वर्षों में कई मुख्यमंत्री बदले और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता भी देखने को मिली.

1977 में बदली सत्ता की तस्वीर

आपातकाल के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी को बड़ी सफलता मिली और राम नरेश यादव मुख्यमंत्री बने. इसके बाद कांग्रेस ने 1980 में सत्ता में वापसी की. इस दौर में वीपी सिंह, श्रीपति मिश्र, नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह जैसे नेता मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे. 1980 का दशक खत्म होते-होते यूपी की राजनीति में कांग्रेस का पुराना वर्चस्व कमजोर होने लगा और समाजवादी तथा अन्य क्षेत्रीय ताकतों के लिए जमीन तैयार होने लगी.

1989 के बाद समाजवादी और मंडल राजनीति का दौर

1989 का चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और निर्णायक मोड़ लेकर आया. मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 1991 में BJP ने बड़ी जीत दर्ज की और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. 1993 में SP-BSP गठबंधन के बाद मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने. इसी दशक में मायावती का राजनीतिक उभार हुआ और वह पहली बार 1995 में मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद यूपी की राजनीति में BJP, SP और BSP तीन प्रमुख शक्तियों के रूप में उभरीं.

मायावती और अखिलेश यादव के दौर ने बदली तस्वीर

2007 का विधानसभा चुनाव मायावती और BSP के लिए ऐतिहासिक रहा. BSP ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और मायावती ने पूरे पांच साल सरकार चलाई. इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. मायावती ने जहां दलित राजनीति के साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों को जोड़कर BSP का मजबूत आधार तैयार किया, वहीं अखिलेश यादव ने युवा नेतृत्व के साथ समाजवादी पार्टी को नई राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की. इस तरह दोनों नेताओं के दौर ने यूपी की राजनीति में BSP और SP की महत्वपूर्ण भूमिका को और मजबूत किया.

2017 में BJP की प्रचंड वापसी

2017 का विधानसभा चुनाव यूपी की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. BJP ने भारी बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया. पांच साल बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP ने एक बार फिर बहुमत हासिल किया और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने. इस जीत के साथ वह उत्तर प्रदेश में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने वाले प्रमुख मुख्यमंत्रियों में शामिल हुए और BJP ने राज्य में अपनी मजबूत राजनीतिक स्थिति बरकरार रखी.

पंत से योगी तक, बदलता रहा मुख्यमंत्री का चेहरा

1951-52 से 2022 तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में गोविंद बल्लभ पंत, सम्पूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, सुचेता कृपलानी, चौधरी चरण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, मायावती, राजनाथ सिंह, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ समेत कई नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाला. सुचेता कृपलानी यूपी की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, जबकि मायावती ने चार अलग-अलग कार्यकाल में प्रदेश की कमान संभाली. इस लंबे राजनीतिक सफर में कांग्रेस के वर्चस्व से लेकर क्षेत्रीय दलों के उभार और BJP के मजबूत प्रभुत्व तक सत्ता के समीकरण लगातार बदलते रहे.

1951-52 से 2022 तक का चुनावी सफर बताता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से निकलकर गठबंधन, मंडल-कमंडल, क्षेत्रीय दलों और फिर BJP के मजबूत प्रभुत्व तक पहुंची है. चुनाव दर चुनाव सामाजिक समीकरण, नेतृत्व और राजनीतिक मुद्दे बदलते रहे हैं. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव सिर्फ राज्य की सत्ता तय नहीं करता, बल्कि अक्सर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा पर भी इसका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है.

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