अखिलेश यादव के मंच पर माइक संभालते ही छा गईं 18 साल की प्रतीक्षा! कौन हैं बुंदेलखंड की ये लड़की, आवाज सुनकर गूंज उठीं तालियां

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अखिलेश यादव के मंच पर छाईं 18 साल की प्रतीक्षा यादव

UP News: 18 साल की प्रतीक्षा यादव बुंदेलखंड की पारंपरिक आल्हा गायन विधा को नई पहचान दिला रही हैं. लखनऊ में अखिलेश यादव के सामने उनकी प्रस्तुति ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया. जानिए इस युवा प्रतिभा के बारे में.

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UP News: उत्तर प्रदेश के महोबा की 18 वर्षीय प्रतीक्षा यादव अपनी बुलंद आवाज और बुंदेलखंड की पारंपरिक लोक विधा ‘आल्हा’ गायन को लेकर चर्चा में हैं. अपनी छोटी बहन दीक्षा यादव के साथ वह इस लोक परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं. लखनऊ में समाजवादी पार्टी के एक कार्यक्रम में प्रतीक्षा ने महाराजा खेत सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से जुड़े प्रसंगों पर आल्हा प्रस्तुत किया. उनकी प्रस्तुति से प्रभावित होकर अखिलेश यादव ने उन्हें दोबारा बुलाकर नेताजी पर कविता सुनने को कहा.

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बचपन से आल्हा गायन से जुड़ी हैं दोनों बहनें

प्रतीक्षा यादव और उनकी छोटी बहन दीक्षा बचपन से ही लोक गायन कर रही हैं. दोनों बहनों ने उस सोच को चुनौती दी है, जिसमें आल्हा गायन को पारंपरिक रूप से पुरुषों की विधा माना जाता रहा है. प्रतीक्षा के मुताबिक, उनके पिता और आल्हा सम्राट बच्चों सिंह ने उन्हें इस लोक विधा को अपनाने के लिए प्रेरित किया. वह बताती हैं कि बचपन में आल्हा सम्राट बच्चों सिंह ने उनका नृत्य देखा था. इसके बाद उन्होंने उनके पिता से कहा कि अगर वह नृत्य कर सकती हैं तो आल्हा भी गा सकती हैं. यहीं से उनके आल्हा गायन के सफर की शुरुआत हुई.

अखिलेश यादव ने दोबारा बुलाकर सुनी नेताजी पर कविता

लखनऊ में आयोजित समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम में प्रतीक्षा को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला. कार्यक्रम के दौरान उन्होंने महाराजा खेत सिंह खंगार से जुड़े इतिहास के साथ-साथ स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव पर केंद्रित आल्हा की कड़ियां प्रस्तुत कीं. प्रतीक्षा के अनुसार, प्रस्तुति के दौरान अखिलेश यादव ने तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया. जब वह कार्यक्रम से जाने लगीं तो उन्हें दोबारा बुलाया गया और नेताजी पर कविता सुनाने के लिए कहा गया. प्रतीक्षा के लिए यह अनुभव खास रहा.

आल्हा में वीरता, संघर्ष और भावनाओं की कहानी

आल्हा बुंदेलखंड की पारंपरिक लोक विधा है, जिसमें वीरता, संघर्ष और ऐतिहासिक प्रसंगों का गायन किया जाता है. प्रतीक्षा के मुताबिक, महोबा पर आए संकट और पृथ्वीराज चौहान की घेराबंदी जैसे प्रसंगों का गायन करते समय माहौल भावुक हो जाता है. वह बताती हैं कि जब रानी मल्हना द्वारा वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल को याद करने का प्रसंग प्रस्तुत करती हैं तो कई बार उनकी अपनी आंखें भी नम हो जाती हैं. उनके लिए आल्हा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के इतिहास और लोक संस्कृति से जुड़ी विरासत है.

लोक संस्कृति को देशभर में पहचान दिलाना है सपना

प्रतीक्षा का कहना है कि आज के दौर में युवा पॉप और रैप संगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं, ऐसे में पारंपरिक लोक विधाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. वह चाहती हैं कि आल्हा गायन जैसी लोक विधाओं को स्कूलों और कॉलेजों में भी सिखाया जाए. प्रतीक्षा का सपना आल्हा गायन और बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को देशभर में पहचान दिलाना है. उनका मानना है कि यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पूर्वजों और वीरों के इतिहास से जुड़ी विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है.

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