नोट छापना तो बहुत देखा, अब सिक्का-कांड देखिए! सहारनपुर में पकड़ी गई 20 रुपये के जाली सिक्कों की इंटरनेशनल फैक्ट्री

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सहारनपुर में पकड़ी गई 20 रुपये के जाली सिक्कों की इंटरनेशनल फैक्ट्री

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Saharanpur Fake Coin Factory Busted: सहारनपुर में नकली नोटों के बाद अब नकली सिक्कों के बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है. एक फैक्ट्री से 70 करोड़ रुपये से अधिक के जाली सिक्कों के कारोबार का खुलासा हुआ है. गिरोह के पांच सदस्य गिरफ्तार किए गए हैं.

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Saharanpur Fake Coin Factory Busted: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में नकली नोटों के बाद अब नकली सिक्कों के बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ है. तीतरों क्षेत्र में चल रही फैक्ट्री का पुलिस ने भंडाफोड़ कर अंतरराज्यीय गिरोह के पांच सदस्यों को गिरफ्तार किया है. पुलिस के मुताबिक, आरोपी करीब पांच से छह रुपये की लागत में 20 रुपये का नकली सिक्का तैयार करते थे और उसे एजेंटों को 12 से 15 रुपये में बेच देते थे. इसके बाद इन सिक्कों को बाजार में असली मुद्रा के तौर पर चलाया जाता था. इस नेटवर्क से 70 करोड़ रुपये से अधिक के नकली सिक्कों के खेल की बात सामने आई है.

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छह मशीनों से रोज बनते थे 10 से 12 हजार नकली सिक्के

सहारनपुर के तीतरों में पकड़ी गई फैक्ट्री में बड़े पैमाने पर नकली सिक्कों के उत्पादन की पूरी व्यवस्था तैयार की गई थी. छह मशीनों की मदद से रोजाना 10 से 12 हजार सिक्के तैयार करने की क्षमता विकसित की गई थी. पुलिस ने मौके से 6,400 तैयार सिक्के, करीब पांच लाख रुपये के अधबने सिक्के और 59 डाई बरामद की हैं. बताया गया कि नेपाल और थाईलैंड से लेकर भारत के कई राज्यों तक फैले पुराने नेटवर्क ने उत्तर प्रदेश में अपना पहला मैन्यूफैक्चरिंग सेंटर तैयार किया था.

2017 में भी सामने आया था मुख्य आरोपी का नाम

पुलिस के अनुसार, इस नेटवर्क का कनेक्शन कई साल पुराना है. मुख्य आरोपी उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह का नाम वर्ष 2017 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की जांच में भी सामने आया था. उस समय उसके संपर्क नेपाल और थाईलैंड तक पाए गए थे. पुलिस से बचने के लिए नेपाल में छिपे उपकार ने वहां भी नकली सिक्के बनाने का ठिकाना खड़ा करने की कोशिश की थी. पुलिस के मुताबिक, उपकार वर्ष 2001 से नकली सिक्के बनाने के धंधे में सक्रिय है.

आठ लोग अलग-अलग जिम्मेदारी संभाल रहे थे

पुलिस के मुताबिक, नकली सिक्कों के इस नेटवर्क में करीब आठ लोग अलग-अलग काम संभाल रहे थे. कुछ लोग मशीन और उत्पादन से जुड़े थे, जबकि कुछ की जिम्मेदारी तैयार सिक्कों को एजेंटों तक पहुंचाने की थी. वहीं, कुछ लोग बाजार में नकली सिक्कों को खपाने का काम देखते थे. काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था, ताकि किसी एक व्यक्ति के पकड़े जाने पर पूरा नेटवर्क सामने न आ सके. पुलिस को आठ मोबाइल और सात रजिस्टर भी मिले हैं. इनके जरिए लेनदेन और नेटवर्क से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाई जा रही है.

पांच-छह रुपये में तैयार, 12-15 रुपये में एजेंटों को बिक्री

पूछताछ में नकली सिक्कों के कारोबार में होने वाले मुनाफे का भी खुलासा हुआ है. पुलिस के मुताबिक, 20 रुपये का एक नकली सिक्का तैयार करने में करीब पांच से छह रुपये खर्च होते थे. इसके बाद इन्हें एजेंटों को 12 से 15 रुपये में बेच दिया जाता था. एजेंट इन सिक्कों को बाजार में वास्तविक मुद्रा के तौर पर चलाते थे. पांच आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब गिरोह के बाकी सदस्यों की भूमिका की जांच कर रही है.नोट: आपके दिए स्रोत में शुरुआती हिस्से में एक जगह लागत “छह रुपये” और बाद में पूछताछ के आधार पर “पांच से छह रुपये” बताई गई है. मैंने दोनों को स्रोत के अनुसार ही रखा है.

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