पांच महीने में फांसी के 23 फैसले, फिर मिली माफिया की धमकी, जज बोले- न्याय के साथ समझौता नहीं करूंगा
जज रवि कुमार दिवाकर
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चर्चित मामलों में 23 दोषियों को फांसी सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर ने माफिया की धमकियों का सामना करने की बात कही है. उन्होंने कहा है कि वे डर के कारण अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटेंगे.
Muzaffarnagar News : पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चर्चित मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाने वाले अपर जिला एवं सत्र न्यायालय के जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा है कि वह किसी दबाव से डरने वाले नहीं हैं. उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में रहते हुए किसी माफिया, गैंगस्टर या अपराधी के दबाव में काम करना उनके लिए संभव नहीं है.
पांच महीने में 10 चर्चित मामलों में 23 को सुनाई फांसी
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच महीनों में जज रवि कुमार दिवाकर ने 10 चर्चित मामलों में कुल 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है. इनमें बागपत की शहजादी को जिंदा जलाने वाले आरोपी शौहर नदीम का मामला भी शामिल है. जज ने कहा कि पश्चिमी यूपी के माफिया और गैंगस्टरों की ओर से उनके पीछे पड़ने की धमकी दी गई है. उन्हें संदेश भेजकर कहा गया कि यदि वे पीछे नहीं हटे तो उनका कोर्ट बदलवा दिया जाएगा या जिले से बाहर ट्रांसफर करा दिया जाएगा.
मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलाना नहीं
जज रवि कुमार दिवाकर ने इन कथित धमकियों पर जवाब दिया. उन्होंने कहा कि वह डर के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय मरना पसंद करेंगे, लेकिन डरपोक जज कहलाना मंजूर नहीं है. उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का काम निष्पक्ष होकर कानून के मुताबिक फैसला देना है. किसी के दबाव में आकर न्याय करना न्याय व्यवस्था के साथ समझौता होगा.
शहजादी को जिंदा जलाने के मामले में शौहर को फांसी
बागपत की शहजादी को जिंदा जलाने के मामले में उसके शौहर नदीम को फांसी की सजा सुनाई गई है. फैसले में जज ने कहा कि आरोपी के पिता समेत अन्य गवाहों के मुकर जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए मृत्यु पूर्व बयान को पर्याप्त आधार माना गया. जज ने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि गवाहों के मुकरने के बावजूद उपलब्ध साक्ष्यों और बयान के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया गया.
माता-पिता ने किसी से न डरने की सीख दी
जज दिवाकर ने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें भगवान के अलावा किसी अन्य से नहीं डरने की शिक्षा दी है. उन्होंने कहा कि न्यायाधीश को बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों के दबाव में काम नहीं करना चाहिए. उनका कहना है कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी ऐसे दबाव से भयभीत होकर काम करने लगे तो इससे न्यायपालिका पर जनता का भरोसा कमजोर होगा.
दबाव बढ़ा तो इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे
जज ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में उन पर किसी तरह का दबाव बनाया गया और वह उससे प्रभावित हुए, तो उनके लिए न्यायिक संस्था से इस्तीफा देना उचित होगा. उन्होंने फैसले में लिखा कि उन्हें संदेश भेजा गया है कि उनके पास से केवल कुछ पत्रावलियां हटा दी गई हैं. यदि वह उन लोगों के खिलाफ कोई टिप्पणी करते हैं तो उनका कोर्ट बदलवाया जा सकता है या जिले से बाहर ट्रांसफर किया जा सकता है. जज के इन बयानों ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और अदालतों पर बाहरी दबाव के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.
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